Font by Mehr Nastaliq Web

घर

ghar

मनोज जैन

और अधिकमनोज जैन

    छोटा हो या बड़ा

    मगर घर हो अपना

    जहाँ दिलों में प्रीत

    सभी के पलती हो

    देहरी हो

    चाहे दरवाज़ा

    सब ख़ुश रहते हों

    तन की पीड़ा

    मन के सुख-दुख

    मिलकर सहते हों

    छोटा हो या बड़ा

    आँख में हो सपना

    पूरा करने दिल में

    कसक मचलती हो

    दरवाज़े पर

    शगुन झूमकर

    हँसता गाता हो।

    स्वागत में झर

    हरसिंगार

    पल-पल मुस्काता हो

    छोटा हो या बड़ा

    पाहुना हो अपना

    जहाँ मंगल भाव

    भावना फलती हो

    पूरे घर में

    अगरू गंध-सी

    ख़ुशबू फैली हो

    आँगन में

    किलकारी हो

    ख़ुशियों की रैली हो

    छोटा हो या बड़ा

    शिवाला हो घर में

    जहाँ प्रेम की ज्योति

    निरंतर जलती हो।

    शयनकक्ष या

    राम रसोई

    बैठक अंदर की

    आगंतुक की

    थकन मिटा दें

    पल में अंतर की

    छोटा हों या बड़ा

    लाभ-शुभ हो घर में

    जहाँ बल्लियों हर-पल

    ख़ुशी उछलती हो।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मनोज जैन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY