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सगरे ब्याल बिलइया चुप है

sagre byaal bilaiya chup hai

रत्नेश अवस्थी

रत्नेश अवस्थी

सगरे ब्याल बिलइया चुप है

रत्नेश अवस्थी

और अधिकरत्नेश अवस्थी

    सगरे ब्याल बिलइया चुप है, चुप्पी पहरेदारन मा,

    जुतहन की सब भीड़ जमा है, सरकारी दरबारन मा,

    तुम्हरी कुरिया जलती रइ हैं,

    कोठिया बनी अमीरन की,

    तुम घर फूंकि तमाशा द्याखो,

    गरिया भरै फ़क़ीरन की,

    रागु सबै दरबारी गइहै, कउन बचा बेचारन का,

    जुतहन की सब भीड़ जमा है, सरकारी दरबारन मा,

    अंधरे गूँगे बने रहौ तुम,

    बहिरेन की परधानी मा,

    अइसे मछरी मरती रइहैं,

    डूबि-डूबि कै पानी मा,

    रोजु मछरिया डूबि मरै तौ, बगुला है मछुवारन मा,

    जुतहन की सब भीड़ जमा है, सरकारी दरबारन मा,

    जेहि पर ज़िम्मा दीन धरम का,

    बइठे दिए मिटाए सब,

    मैय्या बहिनी सेंकि रहे हैं,

    उजरे पढ़े पढ़ाए सब,

    लाज शरम सब तौलि-तौलि के लागि बिकाए बजारन मा,

    जुतहन की सब भीड़ जमा है, सरकारी दरबारन मा,

    कल्पनाओं की नदी के पार जाना है मुझे,

    है भरम तुम हो मेरी ये ख़ुद मिटाना है मुझे,

    साथ हमने जो लिए थे वो वचन सब भूल जाना,

    तुमसे मिलने को हुए थे वो जतन सब भूल जाना,

    भूल जाना वो सभी उपवास जो हमने किए थे,

    भूल जाना तुम सभी एहसास जो हमने जिए थे,

    अब स्वयं का आज से ही दिल दुखाना है मुझे,

    है भरम तुम हो मेरी ये ख़ुद मिटाना है मुझे,

    मंदिरों से मन्नतों के सारे धागे खोल कर हम,

    अब नही आएँगे फिर से गए ये बोल कर हम,

    बोल कर आए हैं ये हम अब नही हमको मिलाना,

    जो हमें कुछ वर दिए थे वो सभी तुम भूल जाना,

    भूल का एहसास भी अब ख़ुद कराना है मुझे,

    है भरम तुम हो मेरी ये ख़ुद मिटाना है मुझे,

    रेत पर इक दिल बनाकर नाम भी हमने लिखा था,

    साथ में था इक घरौंदा जिसको हमने घर कहा था,

    घर कहा था जिसको हमने अब उसे हम तोड़ आए,

    और वो जो दिल बना था वो वहीं पर छोड़ आए,

    छोड़कर ये दर तुम्हारा दूर जाना है मुझे,

    है भरम तुम हो मेरी ये ख़ुद मिटाना है मुझे,

    कविता कहते हो तुम कवि जी क्यों कहते हो भाई,

    इनसे कह दो चुप हो जाओ रोको कलम घिसाई,

    क्यों शब्दों को जोड़ जाड़ के,

    इनके उनके तोड़ ताड़ के,

    तुकबंदी कर रख देते हो,

    सारी कविता फोड़ फाड़ के,

    एक हज़ारी क्रैश कोर्स में कविता सीखी जाई,

    इनसे कह दो चुप हो जाओ रोको कलम घिसाई,

    जाने किससे लिखवाते हो,

    कहाँ-कहाँ तुम छपवाते हो,

    कविता के 'क' से झगड़ा है,

    बड़े कवी जी कहलाते हो,

    काहे का जिगरा रखते हो करते छप्पन छाई,

    इनसे कह दो चुप हो जाओ रोको कलम घिसाई,

    कोने वाली फुलझड़िया भी,

    और बगल वाली चिड़िया भी,

    पट जाएँगी सब की सब वो,

    बिरजू की काली पड़िया भी,

    रोज़ नए शृंगार लिखो औ' ढूँढो नई लुगाई,

    इनसे कह दो चुप हो जाओ रोको कलम घिसाई,

    स्रोत :
    • रचनाकार : रत्नेश अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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