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वन कटान

van katan

हरियर बनवा कटाला हो किछु कहलो जाला।

देखि-देखि जिव घबड़ाला हो किछु कहलो जाला।

केकरा के छहियाँ बटोहिया छँहाई। कहाँ पर खोंतवा चिरइया लगाई।

हाड़ हाड़ देहियाँ पहाड़ देखाई। कहाँ मिली जड़ी बूटी सेत के दवाई।

दिनवा अगम समुझाला हो किछु कहलो जाला।

मोरवा मोरनियाँ नाच कहाँ होई। बनरा गोल कवने पेड़वा पर सोई।

बघवा भलुन्दरा कहीं रहि पइहैं। लमहे लोमड़िया बेचारा बिलखइहै।

परि जाई कठियो के ठाला हो किछु कहलो जाला।

बासल बयरिया सपन होई जाइ। फरवा रही वन बसिया भुखाई।

नदी नार झरना परद बिनु होइहैं। वन चर घूमि घूमि चारों ओरी रोइहैं।

सुन होइ जाई हाथी नाला हो किछु कहलो जाला।

नभचर कहाँ थकहरिया मेटइहैं। हरिना हरिनियाँ कवन बन जइहैं।

केहि बन सिव बाबा बुइयवाँ रमइहैं। जोग जोग बावला जगह नाहीं पइहैं।

केहू के कही चनराला हो किछु कहलो जाला॥

स्रोत :
  • पुस्तक : गीतलोक (पृष्ठ 182)
  • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
  • प्रकाशन : सेवक प्रकाशन, वाराणसी
  • संस्करण : 1997

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