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एखनो मिथिलामे बाँकी छै जान

ekhno mithilame banki chhai jaan

अमित पाठक

अमित पाठक

एखनो मिथिलामे बाँकी छै जान

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    कहब की हम कहैए जहान

    एखनो मिथिलामे बाँकी छै जान

    बिसरि गेलहुँ पान-माछ-मखान

    एखनो मिथिलामे बाँकी छै जान

    एखनो मिथिलामे...

    गौरब हम्मर जुग-जुगसँ जे कतेकेँ से

    देखि फाटै छै मालि

    तखनो देखू हमहीं-अहाँ बदलए चाही अपन चालि-ढालि

    बूझि दूसै छी जे भेलै पुरान

    एखनो पुरनेमे बाँकी छै जान

    एखनो मिथिलामे...

    स्वर्गक परतर सगरो जक्कर देव-पितर केर धाम अपन

    एखनो निर्मल पोखरि-झाँखरि भरल-पुरल अछि गाम अपन

    करब किए ने अपनहि पर गुमान

    एखनो अपनहिमे बाँकी छै जान

    एखनो मिथिलामे...

    हम-अहाँ जँ लागब-भीरब बढ़ि जेतै फेर मान एकर

    बैसि रहब जँ एहिना चुप भऽ सुधि लेतै के आन एकर

    जागू-जागू हे मैथिल जवान

    एखनो मैथिलमे बाँकी छै जान

    एखनो मिथिलामे...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत-गगन (पृष्ठ 122)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2024

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