एके गो मटिया के दूइ गो खेलवना
eke go matiya ke dui go khelavna
(निर्गुण)
एके गो मटिया के दूइ गो खेलवना
मोर सँवरिया रे,
गढ़ेवाला एके गो कोंहार।
कवनो खेलवना के रंग गोरे-गोरे
मोर सँवरिया रे,
कवनो खेलवना लहरदार।
केवनो खेलवना के अटपट गढ़नियाँ
मोर सँवरिया रे,
कवनो खेलवना जिउआ-मार।
माटी के खेलवना एक दिन माटी मिलि जइहें
मोर सँवरिया रे,
आखिर माटी हो जइहें बेकार।
कहत महेन्दर, पिया अबहीं से चेतऽ
मोर सँवरिया रे,
मानुस-तन ना मिली बारम्बार।
- पुस्तक : महेन्द्र मिसिर के चुनिंदा भोजपुरी गीत (पृष्ठ 31)
- संपादक : भगवती प्रसाद द्विवेदी
- रचनाकार : महेन्द्र मिसिर
- प्रकाशन : सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
- संस्करण : 2021
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