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धार के विपरीत

dhaar ke viprit

मनोज जैन

मनोज जैन

धार के विपरीत

मनोज जैन

और अधिकमनोज जैन

    तुम्हारी झिड़कियों से,

    चुप्पियों से, टूट जाएँ,

    नहीं ऐसा नहीं है।

    तुम्हारे ढीठपन कुत्सित,

    इरादों को बहुत,

    नज़दीक से पहचानते हैं हम।

    कि सच मानों तुम्हें,

    औक़ात से,

    ज़्याद तुम्हारी जानते हैं हम।

    तुम्हारी ज़्यादती सह,

    काँच-घट से, फूट जाएँ।

    नहीं ऐसा नही है।

    तुम्हें भ्रम हो गया यह क्यों,

    कि हम हैं काठ की पुतली,

    तुम्हारे हाथ की।

    रखीं परिदृश्य पर नज़रें हमेशा,

    ज़रूरत है नहीं,

    हमको तुम्हारे साथ की?

    विरोधी आन हमको,

    धान जैसा, कूट जाएँ।

    नहीं ऐसा नहीं हैं।

    समय का फेर ही तो है,

    कि हम इस दौर में,

    रहकर बहुत कुछ सह रहे हैं।

    हवा जो बह रही प्रतिकूल है!

    मगर हम धार के,

    विपरीत डटकर बह रहे हैं?

    संजोए स्वप्न हमने,

    आप आकर, लूट जाएँ,

    नहीं ऐसा नही है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मनोज जैन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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