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देह वनवास को सौंपकर वो चला

deh vanvas ko saumpkar wo chala

अमन अक्षर

अमन अक्षर

देह वनवास को सौंपकर वो चला

अमन अक्षर

और अधिकअमन अक्षर

    देह वनवास को सौंपकर वो चला

    चित्त घर की दिशा

    शेष जाने किधर

    एक पराजय अगर उम्र भर साथ हो

    हर घड़ी हर्ष ये निभा पाएगा

    अपना जीवन है मंचन के जैसा अगर

    हमको जीने का अभिनय नहीं आएगा

    जब स्वयं का ही अधिकार कर सके

    प्राण सीमित हुए

    साँस विन्यास पर

    मंत्रणा कोई भी सफल हो सकी

    प्रीत को तो समर में उतरना ही था

    हारना प्रेम में सब अमर कर गया

    जीत जाता प्रणय फिर तो मरना ही था

    हार को साँस हरदम सँभाले हुए

    साथ रहता नहीं

    यूँ कोई जीतकर

    कुछ वचन यूँ अधूरे सँजोए रहें

    अश्रुपूरित समापन हो संसार का

    एक इकाई है मन बस यही मानकर

    हम भी सतिया बने दर्द के द्वार का

    प्रार्थना बस यही स्वर अबोले रहें

    गीत कोई

    कभी नहीं हो मुखर

    उन अभागे क्षणों की समीक्षा हो

    आँख जब एक उदासी का घर हो गईं

    चुप रहे हम सदा कुछ बोले कभी

    चुप्पियाँ फिर गुनाहों का स्वर हो गईं

    न्याय का कब कोई एक आधार है

    यातना हर घड़ी

    याचना जन्मभर

    स्रोत :
    • पुस्तक : एक लड़की (पृष्ठ 133)
    • रचनाकार : अमन अक्षर
    • प्रकाशन : हिन्द युग्म
    • संस्करण : 2024

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