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डगरिया कइसे-कइसे कटिहें

Dagariya kaise kaise katihen

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

डगरिया कइसे-कइसे कटिहें

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    डगरिया कइसे-कइसे कटिहें पंछी, नाहीं बूझे राम।

    उड़त उड़त तोर, पाँख थकेला,

    सूना अकसवा में तूँ-ह-ई अकेला,

    भर-भर दुःख बयरिया बहेला,

    बिपतिया कइसे केहू बँटिहें पंछी, नाहीं बूझे राम।

    डगरिया कइसे…

    पाँख निहारत दिन बिति गइलें,

    अंत समय किछु काम अइलें,

    आपन, पर-उपकार कइलें,

    दुरदिन, कइसे केहू अँटिहें पंछी, नाहीं बूझे राम।

    डगरिया कइसे…

    भोर पहर सुख लागत नीके,

    ढुरकल दिनवाँ परि गइलें फीके,

    कबहूँ ना बोलेल, बोलिया तूँ 'पी' के,

    उमिरिया दिन-दिन घटिहें पंछी, नाहीं बूझे राम।

    डगरिया कइसे…

    ऊँचे बिरिछिया ऊँची पुलुंइयाँ,

    कबहूँ ना पंछी रे उतरत भुइयाँ,

    छोड़ि गरूर अब जोरि लेहु नेहियाँ,

    नगरिया एक दिन छुटिहें पंछी, नाहीं बूझे राम।

    डगरिया कइसे…

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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