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चिरइया बसेर रे

chiraiya baser re

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

चिरइया बसेर रे

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    हमरे दुअरवा रे निमियाँ के गंछिया

    डारिन चिरइया बसेर रे,

    ताही तरे बाबा हो सोवें करनिनियाँ

    बिटिया बिअहवा के फेर रे।

    संझिया के होते सब उड़ली चिरइया

    सुति गइलें गँउवाँ के लोग रे,

    एगो नाहीं सूतेलनि भइया वीरन भइया

    बहिनी बिअहवा फेर रे।

    घिरि अइली सगरों रयन अन्हियरिया

    रतिया भइलि घनघोर रे,

    चाचा के कतहीं ना सूझेला रहिया

    लगलें दहेजवा के फेर रे।

    माई बइठि सोचे घर के ओसरिया

    कवनों ना लागे उतजोग रे,

    कवन सुन्नर वर सेनुरा बहोरिहे

    कवने नक्षत्र लागे देर रे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : लोक रागिनी (पृष्ठ 190)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : रागिनी प्रकाशन, गाजीपुर
    • संस्करण : 1995

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