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बिटिया

bitiya

अशोक अज्ञानी

और अधिकअशोक अज्ञानी

    बिटिया घूरे कै माटी समझौ

    बिटिया तो सोने कै चिरइया हो राम।

    बिटिया तो वइसेन अँगना कै तुलसी

    तुलसी के जइसे रघुरइया हो राम।

    बिटिया तौ मटकी कै कबहूँ मथानी।

    बिटिया तौ कबहूँ कबीर कै बानी।

    बिटिया तौ कबहूँ है दुरगा भवानी।

    बिटिया तौ कबहूँ है गंगा पानी।

    बिटिया तो बन मा चन्दन केर बिरवा

    बिटिया तो घर कै जोंधइया हो राम।

    बेटवा मान्यो कमल केर फुलवा

    पानी के उपरै ऊपर मुसकाय।

    बिटिया मानो तो पुरइन पाती

    पानी परै तुरतै बहि जाय।

    बेटवा जो मानो दोनइया दियना

    बिटिया मानो दोनइया हो राम।

    बेटवा समझौ जो सीढ़ी बँसवा

    बिटिया बनै सिढ़िया केर डंडा।

    डंडा कै महिमा तो तबही अज्ञानी

    डंडा लगै जो सनेह झंडा।

    बेटवा बनै जो बिसवास धागा

    बिटिया बनै कनकइया हो राम।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अशोक अज्ञानी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित।

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