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जीतकर संसार सारा द्वार पर हारा तुम्हारे

jitkar sansar sara dvaar par hara tumhare

विशाल समर्पित

विशाल समर्पित

जीतकर संसार सारा द्वार पर हारा तुम्हारे

विशाल समर्पित

और अधिकविशाल समर्पित

    मैं तुम्हे कितना मनाऊँ और कितना टूट जाऊँ

    किस तरह तुमसे बिछड़कर मैं प्रणय के गीत गाऊँ

    आँसुओं को भी बहाकर कुछ नहीं निकला नतीजा

    रात-दिन मैं ख़ूब रोया उर नहीं लेकिन पसीजा

    हो सके तो रोक लो तुम मैं तुम्हे आगाह करता

    आँसुओं संग बह रहे हैं आँख के सपने कुँवारे

    जीतकर संसार सारा द्वार पर हारा तुम्हारे

    अब विरह की वेदना को झेलना संभव नहीं है

    दर्द से हर मोड़ पर प्रिय खेलना संभव नहीं है

    टूटने का भय, निरंतर तार इतने कस चुका हूँ

    सब असंभव लग रहा है मैं भँवर मे फँस चुका हूँ

    मैं तुम्हारे द्वार पर प्रिय इस तरह नज़रें टिकाए

    जिस तरह कोई भिखारी एकटक चौखट निहारे

    जीतकर संसार सारा द्वार पर हारा तुम्हारे

    इस जन्म मिलना कठिन है मन नहीं यह मानता है

    मन मिलन की आस बाँधे जबकि यह सब जानता है

    शैल-निर्मित मूर्ति कोई क्या कभी भी गल सकी है

    काल की दुर्दम्य इच्छा क्या कभी भी टल सकी है

    वक़्त की हर चाल मे भी हाँ बुरे इस हाल मे भी

    मौन हैं मेरे अधर पर मन सदा तुमको पुकारे

    जीतकर संसार सारा द्वार पर हारा तुम्हारे

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल समर्पित
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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