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भीतर एक नदी बहती है

bhitar ek nadi bahti hai

ओम निश्चल

ओम निश्चल

भीतर एक नदी बहती है

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    चंचल हिरनी बनी डोलती

    मन के वन में बाट जोहती,

    वैसे तो वह चुप रहती है

    भीतर एक नदी बहती है।

    सन्‍नाटे का मौन समझती

    इच्‍छाओं का मौन परखती

    सॉंसों के सरगम से निकले

    प्राणों का संगीत समझती

    तन्‍वंगी, कोकिलकंठी है

    पीड़ाओं की चिरसंगी है

    अपने निपट अकेलेपन के

    वैभव में वह ख़ुश रहती है

    अभी कहाँ उसने जग देखा

    किया पुण्‍य का लेखा-जोखा

    अभी सामने सारा जीवन

    उम्‍मीदों का खुला झरोखा

    कुछ सपने उसके अपने हैं

    महाकाव्‍य उसको रचने हैं

    मन ही मन गुनती बुनती है

    पर अपने धुन में रहती है

    शब्‍द-शब्‍द हैं उसकी थाती

    जिनसे लिखती है वह पाती

    वह कविता के अतल हृदय में

    बाल रही है स्‍नेहिल बाती

    लता-वल्‍लरी-सी शोभन वह

    इक रहस्‍य-सी है गोपन वह

    किंतु हुलस कर बतियाती वह

    कभी-कभी सुख-दुख कहती है

    भीतर एक नदी बहती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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