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बेटी बनलि पहाड़

beti banali pahaD

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

बेटी बनलि पहाड़

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    गेलै कतऽ विवेक विचार

    भेलै केहेन लोकाचार

    हाथक फुलडाली सन बेटी बनलै

    माथे परक पहाड़।

    प्राणो सँ जे अधिक पियरगरि,

    पोसलि गेली अंक मे भरि-भरि।

    काल्हुक दुलरैतिन बेटी,

    आइ घैल बनि लागलि घेंटी।

    आगाँ भोगक पोरवरि पाछाँ अपमानेक इनार।

    बेटी अहाँ बेटोँ सँ बढ़िकऽ,

    अयलहुँ उड़नखटोला चढ़िकऽ

    अपने तोँ लक्षमिनियाँ देवी,

    बापक मुँदा सुत्र छह जेवी।

    हे देखू हरि गरूड़ त्यागि कऽ मांगि रहै छथि कार।

    कम्मे दामे भीठ बुड़यलहुँ

    सोना पैंतीस ग्राम पुड़यलहुँ।

    ब्याह रातिक खर्चा चाही,

    बरियाती औता दस गाही।

    बाहर भीतर बल्ब जड़ै अछि माँझे ठाम अन्हार।

    मंगलनि दशरथ एक पाइ नहि,

    बजला किछु रामो जमाइ नहि।

    श्री कृष्णक तऽ लव मैरेज छल,

    हिस्ट्री हमर केहेन सुन्नर भल।

    मुँदा आइ वृष भानु जनक कऽ रहला हाहाकार।

    बेटा बनलै बेबस बकरा,

    बापे कंठ पकड़लनि तकरा।

    जीवन जब्बह भेल मनुक्खक,

    मानवता रहतै ककरा लग।

    घऽर घऽर मे बूचरखाना गामे गाम बजार।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 61)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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