बा खड़ा बारूद पर अब गाँव।
धन अरजइले ना अरजाइल
दुश्मन अरजे लागल,
लोग-बाग के गला रून्हाइल
गोली गरजे लागल;
जहर समेटले जीयत बडुए
अब पीपर के छाँव।
राजनीति त बेमौसम के
लुकवारी भाँजत बाटे,
रंगदारन के चलती देखीं
भलमनुसन के पाँजत बाटे;
जइसे प्रेत चहेटले बाटे
बाकिर थथमल पाँव।
- पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 96)
- रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
- प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
- संस्करण : 2015
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