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बाजू, अछि जनतंत्र कतय?

baju, achhi jantantr katay?

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

बाजू, अछि जनतंत्र कतय?

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    गनिते-गनिते नाम अहाँक, बहुत थाकल छी, ठमकल छी,

    हे सहस्रनामिनि जनसत्ता—

    बाजू, अछि जनतंत्र कतय?

    चोरी, ठगी, अपहरण, डाका

    वैध भेल-सन लगैए

    आसन हड़पि-हड़पि अपराधी—

    माननीय जन कहबैए

    राजनीति व्यवसाय बनल अछि, सगरो घपला भऽ रहल,

    हे गणतंत्रक स्वामिनि जनता—

    बाजू, अछि जनतंत्र कतय?

    कतय गेल आदर्श,

    रामराजक सपना चलि गेल कतय?

    कतय गेल कृष्णत्व-चेतना,

    पाण्डवत्व गुम भेल कतय?

    कोनो निर्वाचित प्रतिनिधि नहि, गणदेवता-जकाँ लगइछ,

    गणता बिसरि गेल अछि जन-गण-

    बाजू, अछि जनतंत्र कतय?

    झूठक खेती खूब भऽ रहल,

    संस्कृतिपर आक्रमण भऽ रहल,

    अछि चरित्रकेँ धकिया—

    नित्य चरित्रहीनता राजकऽ रहल

    सामाजिक अन्याय भऽ रहल, न्याय-धर्मकेर नामपर,

    संविधान निःशब्द रहि रहल—

    बाजू, अछि जनतंत्र कतय?

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 24)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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