Font by Mehr Nastaliq Web

बदलीं जा देसवा के खाका, बलमु लेइ ललका पताका हो

badlin ja desva ke khaka, balamu lei lalka pataka ho

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

बदलीं जा देसवा के खाका, बलमु लेइ ललका पताका हो

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    बदलीं जा देसवा के खाका, बलमु लेइ ललका पताका हो।

    खुरपी हँसुआ से कइनीं इआरी

    जिनगी सुनलीं मलिकवा के गारी

    कबले बने के मुँह ताका, बलमु लेइ ललका पताका हो।

    ना चाहीं हमरा के कोठा-अंटारी

    ना चाहीं मखमल सिलिक के साड़ी

    बन करऽ दिल्ली के नाका, बलमु लेइ ललका पताका हो।

    राजा रानी के उड़े जहजिया

    हमनीं के केहू सुने अरजिया

    जाम करऽ सासन के चाका, बलमु लेइ ललका पताका हो।

    तू बनिजा सूरज, हम बनि जाइब लाली

    तू बनिजा झरना, हम बनबि हरियाली

    पंजा फेंकी जा छाका, बलमु लेइ ललका पताका हो।

    बदली जा देसवा के खाका, बलमु लेइ ललका पताका हो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    हिन्दवी उत्सव 2026

    रजिस्टर कीजिए