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अप्पन मिथिला

appan mithila

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

अप्पन मिथिला

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    ज्ञान विचार भक्ति भावक भंडार अप्पन मिथिला।

    भोग बीच योगक निरमल संसार अप्पन मिथिला।

    एहनोटा बेटा पौलनि,

    जे त्रिभुवन मे पिता कहौलनि।

    अंग्मेदिनी अपरा माया,

    कोर आबि कऽ बनली जाया।

    ब्रह्माण्डक अद्भुत चमत्कार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    शुकदेवो महिमा जनलनि,

    परमगुरु जनक केँ मनलनि।

    भोगी केँ देहोक मोह नहि,

    योगी तमकथि तुम्मा रहि रहि।

    धरती की आकाशे केर घर-द्वार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    जे सदैव सभ केँ नचवै छथि,

    आदि शक्ति माया कहवै छथि।

    सुक्खे से बनली तिरहुतनी,

    भूमि लोटि कऽ भेली भुतनी।

    तिनके कयलनि रचि-रचि कऽ श्रृंगार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    गौतम-कपिल-कणदि-अयाची,

    उदयन सन आचार्य भेल छथि।

    मंडित हमरा कर्मशक्ति लग

    ज्ञानक पंडित हारि गेल छथि।

    न्याय दर्शनक सभसँ पैघ टघार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    शास्त्र वैह’ हम जे सुनवै छी,

    काव्य वैह—हम जैह गवै छी।

    परम सोहनगर मैथिल अंगना,

    सभ सँ मिठगर देसिल बयना।

    कवि कोकिल विद्यापति कंठक हार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    आइ गरीब-मुदा फकने छी,

    पथिया भरल मखानक लावा।

    बासमती चूडा सानल—

    मिट्ठूर अमौट गलि औलनि बाबा।

    भरल चङेरा, चूड़ा दहीक भार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    गंगो दीदी चाह बनावथि,

    कमला बेटी पान लगावथि।

    कोसी बहिना धान कुटै छथि,

    बागमती सिदहा फटकै छथि।

    घऽरक लक्ष्मी विहुंसथि माँझ ओसार अप्पन मिथिला।

    भोग...

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 66)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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