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आईने हैं बोलने को

aine hain bolne ko

विभूति तिवारी

विभूति तिवारी

आईने हैं बोलने को

विभूति तिवारी

और अधिकविभूति तिवारी

    जब चलेंगी सत्यपोशी

    निष्कलुष-निर्मल हवाएँ

    साँच के साँचे में ढलकर

    न्याय पाएँगी व्यथाएँ

    आईने हैं बोलने को

    भीत पर अकुला रहे

    ख़ौफ़ में किरदार सारे

    सिर पटक खिसिया रहे

    रूप के पाए हिलें या

    रूह अंतस कँपकँपाएँ

    साँच के साँचे में ढलकर

    न्याय पाएँगी व्यथाएँ

    क़ैद हैं अनगिनत रातें

    थरथराते अक्स में

    रोज़ चोटिल हो रही जो

    शख़्सियत हर शख़्स में

    लोकचर्चित भावरंजित

    चलन में होंगी कथाएँ

    साँच के साँचे में ढलकर

    न्याय पाएँगी व्यथाएँ

    स्रोत :
    • रचनाकार : विभूति तिवारी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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