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अबना करबि हम गुलमिया तोहार

abna karabi hum gulamiya tohar

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

अबना करबि हम गुलमिया तोहार

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    अबना करबि हम गुलमिया तोहार—

    भले भेजऽ जेहलिया हो

    सगरे छिंटाइल वा हमरे कमीनी,

    हमहीं कमाई, हमहीं अब कीनी,

    उड़ल हवा में झोपड़िया हमार—

    हँसे तोहरो महलिया हो

    हमहीं निकालीला सोना चानी,

    हमरे पसेनवा टिकल रजघानी,

    हम भइनी गंगा के ढहल कगार—

    करत तोहरो टहलिया हो

    तोहरा लइकवा के मोटर गाड़ी

    हमरा लइकवा के खांची-कुदारी,

    अबना सहबि हम जुलुमवा तोहार—

    सुनऽ हमरो कहलिया हो

    पुलिस मलेटरी के गांवे बोलाके

    दागेलऽ गोली तु सभके पोल्हा के,

    कबले चली बनूकिया तोहार—

    लहके लागल गलिया हो

    देखऽ सिवान के फेंड़ सुगबुगाइल

    पुरुब में सूरूज के लाली छितराइल

    गंगा अस उमड़ल बा जनता के धार—

    डूबि जाई महलिया हो

    अबना करबि हम गुलमिया तोहार—

    भले भेजऽ जेहलिया हो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम कबीर के बानी (चयन : अरविन्द कुमार) (पृष्ठ 50)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 2009

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