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आओ श्याम सामने

aao shyaam samne

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

आओ श्याम सामने

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    आओ श्याम

    सामने बैठो

    दृग दर्शन के मुँदने को हैं

    जिन श्वासों में

    लय थी गति थी

    वे ही श्वासें रुकने को हैं

    नेह नहाई

    हुई देह को

    काल निचोड़ गया कपड़े-सा

    सारा ही व्यक्तित्व

    कि जैसे

    सहमा हिरन सिंह जकड़े-सा

    दीख रही है

    रेत नदी में

    नाव उपेक्षित घाट पड़ी है

    मंद हुआ

    लहरों का गति-क्रम

    गिने-चुने पल लुटने को हैं

    मेरी स्नेह

    सुरभि से प्रायः

    भँवरे भ्रमित हुआ करते थे

    शायद सुमन—

    पाँखुरी हैं ये

    अधर ललाम छुआ करते थे

    तुम मुझमें थे

    या मैं तुममें

    यह तो निर्णय कर सकी मैं

    रजनी-गंधा थी

    या चंदन

    सब संदर्भ सिमटने को हैं

    अनब्याही के

    व्यंग-वाण कल

    छंद बद्ध हो मुक्तक होंगे

    रंच-मात्र भी

    अंश लिखेंगे

    वे पूजा की पुस्तक होंगे

    राधा-कृष्ण

    युगल-छवि निर्मित

    करने से शुभ ही शुभ होगा

    अमर-प्रीत के

    दृश्य रहेंगे

    व्यंग-रेख सब छुटने को हैं

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 47)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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