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बंदर और मगरमच्छ

bandar aur magarmachchh

गंगा के किनारे जामुन के पेड़ पर एक बंदर रहता था। उस पेड़ के जामुन बहुत मीठे थे और लगते भी बहुत थे। एक दिन बंदर बड़े मज़े से स्वादिष्ट जामुन खा रहा था कि एक मगरमच्छ गंगा से निकलकर तट पर आया। बंदर ने उसकी तरफ़ कुछ जामुन उछालते हुए कहा, “ये दुनिया के सबसे मीठे जामुन हैं। वाह, क्या स्वाद है! अमृत हैं अमृत!” मगरमच्छ ने चखकर देखे। वाक़ई जामुन कमाल के थे! बंदर और मगरमच्छ में दोस्ती हो गई। जामुन खाने और पेड़ की छाया में बंदर से बातें करने के लिए मगरमच्छ हर रोज़ आने लगा।

एक दिन घर लौटते हुए मगरमच्छ कुछ जामुन अपनी पत्नी के लिए भी ले गया। जामुन खाते हुए पत्नी ने कहा, “बहुत मीठे हैं। शहद भी इनके सामने फीका है। मज़ा गया। कहाँ से लाए?”

मगरमच्छ ने कहा, “गंगा के किनारे के पेड़ से।”

“तुम पेड़ पर तो चढ़ नहीं सकते। क्या तुम्हें यह ज़मीन पर पड़े मिले ?”

“नहीं, एक बंदर मेरा दोस्त है। वह उसी पेड़ पर रहता है। वह मुझे जामुन देता है और हम गपशप करते हैं।”

“अच्छा, अच्छा! तो इसीलिए आजकल तुम घर देर से आते हो! जो बंदर रोज़ इतने मीठे फल खाता है उसका माँस कितना मीठा होगा! उसके कलेजे का तो कहना ही क्या! उसे खाते हुए मुझे कितना मज़ा आएगा!”

मगरमच्छ को यह अच्छा नहीं लगा, “यह तुम कैसी बातें कर रही हो? वह मेरा दोस्त है और तुम्हारे देवर जैसा है।”

पत्नी ने रुखाई से कहा, “मुझे उसका कलेजा चाहिए। तुम्हें उसकी इतनी चिंता क्यों है? वह बंदर है या बंदरिया? जो हो, मेरी बला से, मुझे उसका कलेजा लाकर दो। नहीं तो मैं मरते मर जाऊँगी, पर मुँह जूठा नहीं करूँगी।”

मगरमच्छ ने पत्नी को ईर्ष्या और बुरी भावना से बाहर निकालने की बहुत कोशिश की, पर अकारथ। मगरमच्छ को मानना पड़ा कि वह बंदर या बंदरिया जो भी हो उसे अपनी पीठ पर बिठाकर पत्नी के खाने के लिए लाएगा।

अगले दिन मगरमच्छ ने बंदर को अपने घर चलने का न्यौता दिया, “मेरी बीवी तुमसे मिलने को बहुत उत्सुक है। तुम्हारे बारे में उसने बहुत बातें सुनी हैं। उसे जामुन बहुत पसंद है। उसने तुम्हें घर बुलाया है। तुम बस पेड़ से उतरकर मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें वहाँ ले चलूँगा।”

बंदर ने कहा, “तुम पानी में रहते हो, पर मुझे तो तैरना भी नहीं आता। मैं डूब जाऊँगा।”

“तुम बिलकुल चिंता मत करो। मैं तुम्हें पीठ पर बिठाकर ले जाऊँगा। तुम्हें कोई दिक़्क़त नहीं होगी। हम पानी में नहीं रहते। हम नदी के बीच सूखे और खुले द्वीप पर रहते हैं। चलकर तो देखो, तुम्हें अच्छा लगेगा।”

बंदर मान गया। पेड़ से उतरते हुए भाभी के लिए कुछ जामुन लेना भी वह नहीं भूला। नदी में तैरते समय मगरमच्छ आत्मग्लानि से भर गया। उसकी आत्मा उसे धिक्कारने लगी कि वह अपने दोस्त को इसलिए घर ले जा रहा है कि उसकी पत्नी इसे खा सके। और कुछ नहीं तो कम से कम इसे पता तो होना चाहिए कि वह उसे क्यों ले जा रहा है। यह सोचकर मगरमच्छ ने कहा, “मैंने तुम्हें पूरी बात नहीं बताई। मेरी बीवी ने तुम्हें इसलिए बुलाया है ताकि वह तुम्हारा कलेजा खा सके। हाँ, वह तुम्हारा कलेजा खाना चाहती है और मैं उसका कहा नहीं टाल सकता।”

“बस, इतनी-सी बात है! यह बात तुमने पहले बताई होती तो मैं कलेजा साथ ले आता और ख़ुशी-ख़ुशी भाभी को दे देता।”

“क्या मतलब?” मगरमच्छ ने पूछा।

“मैं हर वक़्त कलेजा साथ लिए थोड़े ही घूमता हूँ! जब भी मैं कहीं जाता हूँ उसे पेड़ पर ही छोड़ देता हूँ। चलो, वापस चलें! मैं तुम्हें अपना कलेजा दे दूँगा।”

मगरमच्छ वापस मुड़ा और किनारे की ओर तैरने लगा। किनारा पास आते ही बंदर कूदा और तेज़ी से पेड़ पर चढ़ गया।

स्रोत :
  • पुस्तक : भारत की लोक कथाएँ (पृष्ठ 54)
  • संपादक : ए. के. रामानुजन
  • प्रकाशन : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास भारत
  • संस्करण : 2001

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