Font by Mehr Nastaliq Web

जातियों का अनूठापन

jatiyon ka anuthapan

बालकृष्ण भट्ट

बालकृष्ण भट्ट

जातियों का अनूठापन

बालकृष्ण भट्ट

और अधिकबालकृष्ण भट्ट

    मनुष्य व्यक्ति के चरित्र का विचार कई एक रीति से हो सकता है। और जिस रीति पर आरूढ़ हो इसकी मीमांसा कीजिए उस ढंग के वैसे विचार होंगे। चाहे मनुष्य के धर्म अथवा सच्चरित्र संबंधी गुणों का विचार कीजिए या चाहे इसी के निकट का कोई प्रश्न उठाकर उस पर कुछ शंका समाधान कीजिए अर्थात् सच्चरित्र से सामाजिक क्या लाभ हैं इन सब बातों के विचार से हमको इस लेख में कुछ प्रयोजन नहीं है किंतु हमको यहाँ उस मुख्य बात से प्रयोजन है जो इस प्रकार की मीमांसा के भी पूर्व विचार में आनी चाहिए और वह यह बात है कि जातीयों का अनूठापन इस देश के इतिहास का फल है।

    जब हम किसी एक जाति पर ध्यान देते हैं तो निश्चय उस जाति के आचरणों से कुछ ऐसी बातें लक्षित होती हैं जो ख़ास उसी जाति में पाई जाएँगी और वे बातें ऐसी होंगी जो मनुष्य मात्र में साधारण रीति पर पाई जाएँ क्योंकि तो कोई जाति इतनी भली है कि उसमें कोई बुरे होंगे ही नहीं। देश का देश इतना बुरा हो सकता है कि उस जाति में एक भी भला हो। इसलिए उन बातों को खोजना चाहिए जो किसी जाति का एक विशेष धर्म है और इसकी मीमांसा हम दार्शनिक रीति पर करते हैं। अर्थात् जब कार्य समझ में नहीं आता तब यह चिंता मन में होती है कि इसका कारण ढूँढ़ें और इस संबंध में कारण की खोज करने पर उस जाति या देश के पूर्व इतिहास से बढ़कर और क्या सहारा हो सकता है। अब पहले इस बात का ज्ञान स्पष्ट रीति पर होना चाहिए कि किसी एक काल में जो हम किसी जाति का कुछ अनूठापन पाते हैं वह निरा आकस्मिक नहीं है क्योंकि यदि आकस्मिक मान लिया जाए तो बस विचार का अंत हो गया और कारण का समझना तो दूर रहा तज्जनित जो कार्य है वह भी स्पष्ट रीति से मन में आवेगा सुतराम ऐसी बातों का कोई आकस्मिक परिणाम भी हो सकता है यह कदापि मानना चाहिए। इससे बस निश्चित हुआ कि जातीयों का अनूठापन तैयार करने में थोड़े से प्रधान कारक की अत्यंत आवश्यकता है। तो अब खोज इसी बात की है कि विशेष जाति में किसी विशेष प्रकार का अनूठापन जाने के लिए कारक क्या है और उनका क्या और कैसे असर होता है।

    ऊपर हमने ‘किसी एक काल में’ ऐसे वाक्य का प्रयोग किया है। अब यह प्रश्न उठ सकता है कि अंत को इस रीति पर तय करने की अवधि क्या और कैसे होगी। काल तो इतिहास की सुगमता के लिए सर्वथा एक कल्पित पदार्थ है। किसी एक काल में कोई जाति का अनूठापन उस प्रकार का क्यों है यदि इसका लगाव आप उसी काल के पूर्व के इतिहास से रखते हैं तो हम पूर्व-काल के इतिहास जा दूसरे पूर्व काल के इतिहास से रखना पड़ेगा और इसी तरह यह शृंखला कभी टूटेगी ही नहीं इसलिए इस अनवस्था दोष का निराकरण होगा ही नहीं जब तक कहीं एक स्थल पर ठहर और इसी शृंखला में कहीं खंड कल्पित कर अपने प्रयोजनीय विषय के विचार पर आरूढ़ हो जाएँगे अर्थात् किसी जाति के इतिहास में कोई ख़ास वख़्त से विचार चलावैं और इस उत्तम रीति को जब हम अपने मतलब पर लगाते हैं तो यह देखते हैं कि जब हमारा प्रश्न ही मनुष्य व्यक्ति का अनूठापन नितांत ऐतिहासिक है तो इसलिए जहाँ इतिहास हमको सहारा देगा वहाँ निश्चय हम को ठहर जाना पड़ेगा और इसी बात को और स्पष्टतर रीति पर यों कह सकते हैं कि किसी एक जाति को जब से हम इतिहास में देखते हैं तब से हम उसमें वही विभेदक गुण पाते हैं जो मानों उसी जाति का लक्षण है। ऐसी बातों पर ध्यान देने से यह समझ में आता है कि किसी जाति के चरित्र के संबंध में अनूठापन का बीज कोई वस्तु है अर्थात् वे दो चार बातें किसी जाति के बिगड़ी या बनी दशा में आदि से पाई जाती हैं उन्हें आप एक जाति से दूसरी जाति को भिन्न रखने का बीज कहें तो अनुचित होगा और उस देश के उपरांत के इतिहास का असर इसी बीज को पुष्ट करने में देखा जाता है। अथवा ज्यों-ज्यों वह जाति उन्नति करती जाए कालांतर में यही बात विविध पुष्ट रूपों में देखी जाएगी और कुछ काल के उपरांत प्राकृतिक और ऐतिहासिक कारणों से जब इन्हीं बीज गुणों में एक प्रकार की पुष्टि गई और वह जाति वैसे ही बराबर उन्नति करती गई तो उसी प्रकार की और पुष्टि दिखाई देगी। पर यह भी देखा जाता है कि किसी संयोग से ऐसी विपरीत ऐतिहासिक घटनाएँ हुई हैं जिनसे उन्नति के बदले उस जाति में अवनति और हास की सूरत बँधी तो स्पष्ट है कि उस जाति के गुणों में भी अवनति और हानि की शक्ल दिखाई दे और तब से वहाँ वह जाति अपने उत्कर्ष से ढल जाएगी और अच्छी बातों का होना उसमें बंद हो जाएगा। यहाँ तक हमने सामान्य रीति पर जातीय उन्नति और अवनति के नियम कहे पर ख़ूबी इन नियमों की किसी एक मुख्य जाति पर लगाने से और उनका पूरा-पूरा असर उस जाति पर दिखलाने में है। हम समझते हैं सबसे उत्तम उदाहरण हमको अपनी ही जाति पर लगाने के अतिरिक्त और कहाँ मिलेगा। बहुत आदिकाल से आरंभ कर हम जब से इस जाति को लक्ष्य करते हैं तो उस विभेदक गुण का बीज पाते हैं और इसका नाम मननशीलता रखेंगे। यद्यपि संसार में बहुत से मज़हब हैं जिनमें बड़ा-बड़ा उत्कर्ष किया गया है पर 'मुनि' और 'आश्रम' के जोड़ की कोई बात हम संसार के किसी मज़हब में नहीं पाते। यह बीज गुण जो हमारी जाति को औरों से अलग करता है क्यों ऐसा है इसका उत्तर चाहे हम दे सकें पर यह तो अवश्य कहेंगे कि जब से इतिहास का लेश भी इस जाति में पाया जाता है तभी से प्राकृतिक कारणों ने इस मननशीलता की जड़ डाल रखी थी। इन प्राकृतिक कारणों से हमारा प्रयोजन यहाँ के ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों, बड़े लंबे चौड़े मैदानों से है। अथवा आबहवा जो अफ़्रीका देश के समान अत्यंत उष्ण या तीव्र लापलैंड सरीखे शीत प्रधान देश के सदृश अत्यंत शीतल वर्ष में बराबर से छः ऋतु का होना, पैदावारी भी थोड़ी मेहनत में बहुत सा पैदा होना इत्यादि से है। और ये ही सब प्राकृतिक गुण ऐसे हैं जिनसे इस जाति के अनूठेपन (National Character) का बीज बोया गया है।

    इसी मननशीलता के कारण हम देखते हैं कि केवल मनन करने के जो विषय हैं उनमें यह जाति इतनी उत्कर्ष प्राप्ति किए है कि जिसके जोड़ का गुण संसार भर की किसी जाति में नहीं देखा जाता और यही कारण है कि हम लोगों के यहाँ धर्म बहुत जल्द और बहुत अधिक चमका। जब और- और जाति असभ्यता के अंधकार में पड़ी टटोल रही थीं हमारे वहाँ ऐसे-ऐसे सूक्ष्मानुसूक्ष्म सिद्धांत निकाले गए जिसकी बारीकियाँ यूरोप की समझ में अब आने लगी हैं। पर जहाँ इस मननशीलता में सब गुण हैं वहाँ बहुत से अवगुण भी इससे पैदा हुए। इस सुक्ष्मानुसंधान के पीछे दौड़ने से बहुत सी महोपकारी पदार्थ विद्या संबंधी स्थूल बातें रह गईं। इसी मननशीलता के कारण अकर्मण्यता इनकी नस-नस में घुस गई और कितने प्रकार के विज्ञान और 'साइंस' जिनमें भरपूर उद्यम और प्रागलभ्य (Activity) का काम पड़ता है उन्हें शांति सहयोगिनी इनकी मननशीलता ने होने ही दिया। धर्म संबंधी उत्कर्षता निस्संदेह अति उत्तम है किंतु इसके साथ ही यह भी हुआ कि इस धर्म की उत्कर्षता और पारलौकिक चिंतन समाज और देश के हित की स्थूल बातों को इतना दबा दिया और उन सब हितकारी उपायों के स्थान में ऐसी टाँग अड़ाया कि उनका लेश भी आने पाया। 'मोरालिटी' जिसके लिए कोई उचित शब्द हमारी भाषा में मिलता ही नहीं बिल्कुल मज़हब हो गई। मज़हब से कुछ सरोकार रख स्वच्छंद 'मोरालिटी' की बुनियाद पाना असंभव सा हो गया। वैद्यक में मज़हब जा घुसा, ज्योतिष में मज़हब जा पैठा, नीतिशास्त्र उसी मज़हब का एक अंग ही है।

    यूरोप की सी स्वच्छंद पालिटिक्स क्या है? सो हम जानते ही नहीं। इसका तो मानों बीज ही मारा पड़ा। कामंदक और चाणक्य का नीतिशास्त्र अथवा मनु और महाभारत में जो राजधर्म लिखा गया है वह सब उससे बिल्कुल निराला है। जिसे हम पालिटिक्स के द्वारा यूरोप के क्रम पर स्वत्वरक्षा 'इंडि-विडुअल राइट' और 'प्रिविलेज' की बुनियाद कहेंगे। यहाँ तक कि इन बातों का ध्यान भी कभी उनको हुआ। एक मनुष्य या जाति केवल एक तरफ़ तरक़्क़ी कर सकती है जिन बातों को आप अच्छा समझते हैं और जो आपके आइडियल्स हैं उन्हीं से आपके जीवन के सब काम नियमित होंगे। इसलिए इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है कि पारलौकिक बातों के अनुसंधान में लगे हुए हमारे पूर्वजों का चित्त क्षणभर के वास्ते भी राजनैतिक तत्त्वों की ओर झुका हो। अब इसी के तारतम्य में अँग्रेज़ों की दशा पर ध्यान दीजिए तो यह बात देखी जाती है कि जैसा हमारे यहाँ धर्म और मज़हब नस-नस में घुसा है वैसा ही आदि ही अँग्रेज़ों का बीज विभेदक गुण हम स्वच्छंदता पाते हैं। यही कारण है कि बहुत जल्द उनका इतिहास राजनैतिक स्वच्छंदता की लड़ाइयों के लिए प्रसिद्ध हो गया। जो लड़ाइयाँ किसी शक्ल में वें बराबर चलाते ही गए जब तक उन्होंने मनमानी राजनैतिक स्वच्छंदता पा लिया। इसी स्वच्छंदता की इच्छा को यदि हम बीज मान लें तो अँग्रेज़ों का इतिहास समझने में हमको केवल सुगमता ही होगी वरन् एक-एक कल-पुरजा इस इतिहास का हमको स्पष्ट हो जाएगा जिस समय से कि इंगलैंड के साक्सन लोग वहशियों की तरह रहते थे उसी समय से इस स्वच्छंदता की इच्छा को हम इस अँग्रेज़ी जाति में पाते हैं और उसी का परिणाम उनकी राजनैतिक स्वच्छता और उत्कर्ष है।

    चाहे धर्म संबंधी आदि एकता से आप और-और तरह का लाभ मानें पर देश की उन्नति और वास्तविक भलाई करने का द्वार हम राजनैतिक एकता ही को मानेंगे। जब तक कोई जाति एक राजनैतिक समूह होगी जिसका एक ही राजनैतिक उद्देश्य है और जिस जाति के लोग एक ही राजनैतिक ख़याल से प्रोत्साहित नहीं हैं तब तक आप उस जाति की संपत्ति और वृद्धि की बुनियाद किस चीज़ पर क़ायम रखेंगे? हम देखते हैं अँग्रेज़ों के इतिहास में बहुत जल्द राजनैतिक एक जातित्व गया जिसके कारण उनके जाति की उन्नति चरम सीमा को पहुँचने लगी और उसी के विपरीत हम देखते हैं कि राजनैतिक बंधन होने से बहुत जल्द हमारी जाति तीन तेरह हो गई। मनुष्यों के संबंध में 'प्रारब्ध' कुछ है ऐसा आप मानते हैं, अस्तु, जाति के संबंध में तो आपको यह अवश्य मानना पड़ेगा कि अपना इतिहास कोई जाति आप स्वयं बना लेती है। हम ऊपर कह आए हैं कि अँग्रेज़ों में राजनैतिक एकता के कारण उनके देश की वास्तविक उन्नति हुई उसी के विपरीत राजनैतिक एकता होने से हमारा ह्रास हुआ और आगे चलकर इसका यह परिणाम हुआ कि अँग्रेज़ जाति ने अपना इतिहास अपने अनुकूल कर लिया। वही हमारे जाति का इतिहास झक मार के हमारे प्रतिकूल हो गया और आपस की फूट से बची-खुची जो कुछ ताक़त रह भी गई थी उसे विदेशीय विजेताओं ने आकर चूर-चूर कर डाला। इसी कारण यह बात यहीं देखी गई कि वह देश जहाँ की संपत्ति इतनी अधिक थी जिसे लूट-लूट और और मुल्क वाले बन गए और बनते जाते हैं सदा विदेशीय नेताओं का शिकार बना उनके पंजे में पड़ा रहा और कभी अपनी दशा को सोचा तक नहीं तब उससे निवृत्त होने की सामर्थ्य पाना तो बड़ा दूर रहा। जहाज़ चलाने की विद्या में तरक़्क़ी करना और जहाओं में चढ़कर अपने देश का वाणिज्य दूसरे दूर देश में ले जाना और वहाँ का अपने देश में लाना इत्यादि बातों में उद्यम और प्रागलभ्य (Activity) की दरकार थी इसलिए ये बातें हमारे यहाँ सपने की सी हो गईं। दूसरे, एक कारण यह भी है कि जब पेट भर खाने को होगा तो सब ओर ख़यालात दौड़ेंगे। इसी कारण अँग्रेज़ों के इतिहास में हम बराबर देखते हैं कि किसी समय अँग्रेज़ों ने किसी का कोई ख़याल मँगनी माँग अपनी उन्नति नहीं किया जैसे हम उनसे उन्नति करने वाले ख़यालत माँगने को ललचा रहे हैं वरन् उनके इतिहास में एक से एक नवीन सोचने वाले हर एक काल में हो गए हैं। हिंदू और अँग्रेज़ इन दो जातीयों का पूरा इतिहास दर्शाना इस लेख में हमारा उद्देश्य नहीं है पर बीज विभेदक गुणों की पुष्टि हम समझते हैं कि हम अच्छी तरह दिखा चुके और यह भी दिखा चुके कि प्रत्येक जाति किस तरह अपने अनुकूल या प्रतिकूल अपना इतिहास बना कर उन्नति अथवा अवनति करती है।

    इस सब लेख का सारांश हम यों कह सकते हैं कि यदि भारत का उद्धार अब किसी तरह हो सकता है तो शांति संपादक अकर्मण्यता वाले गुणों से नहीं जिनके लिए हम अब तक प्रसिद्ध थे और जिसने हमको इस दिशा तक गिरा दिया बरन् अँग्रेज़ी जाति के साथ टक्कर खाने से और उनसे प्रगल्भता (Activity) संपादक उद्यमशीलता वाले गुणों के सीखने से। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक इस लेख से जातीयों में अनूठापन क्या है भरपूर समझ गए होंगे, और यह लेख किंचित क्लिष्ट हो जाने के लिए हमारा अपमान करेंगे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बालकृष्ण भट्ट रचनावली, प्रथम भाग (पृष्ठ 154)
    • रचनाकार : बालकृष्ण भट्ट
    • प्रकाशन : नागरीप्रचारिणी सभा
    • संस्करण : 2015

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY