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गुरूदेव कौ अंग

gurudev kau ang

कबीर

कबीर

गुरूदेव कौ अंग

कबीर

और अधिककबीर

    सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सईं दाति।

    हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं जाति॥1॥

    बलिहारी गुर आपणैं, द्यौं हाड़ी कै बार।

    जिनि मानिष तैं देवता, करत लागी बार॥2॥

    सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपकार।

    लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार॥3॥

    राम नाम कै पटंतरै, देबै कौं कुछ नांहि।

    क्या ले गुरु संतोषिए, हौंस रही मन मांहि॥4॥

    सतगुर के सदकै करूं, दिल अपणीं का साछ।

    कलियुग हम स्यूं लड़ि पड़या, मुहकम मेरा बाछ॥5॥

    सतगुर लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥

    एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या सरीर॥6॥

    सतगुर साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक।

    लागत ही मैं मिल गया, पड़या कलेजै छेक॥7॥

    सतगुर मारया बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि।

    अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूटि॥8॥

    हँसै बोलै उन्मनीं, चंचल मेलह्या मारि।

    कहै कबीर भीतरि भिद्य, सतगुर कै हथियारि॥9॥

    गूंगा हूवा बावला, बहरा हूआ कान।

    पाऊं थैं पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥10॥

    पीछैं लागा जाइ था, लोक वेद के साथि।

    आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥11॥

    दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट।

    पूरा किया विसाहुणां, बहुरि आँवौं हट्ट॥12॥

    ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या, सो जिनि बोसरि जाइ।

    जब गोबिंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥13॥

    कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूंण।

    जाति पाँति कुल सब मिटे, नाँव धरौगे कौंण॥14॥

    जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।

    अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पड़ंत॥15॥

    नां गुर मिल्या सिष भया, लालच खेल्या डाव।

    दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥16॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : कबीर ग्रंथावली (पृष्ठ 1)
    • संपादक : श्यामसुंदर दास
    • रचनाकार : कबीर
    • प्रकाशन : नागरीप्रचारणी सभा

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