गंगा जउना माझें रे बहइ नाइ

ganga jauna majhen re bahai nai

डोंभिपा

डोंभिपा

गंगा जउना माझें रे बहइ नाइ

डोंभिपा

और अधिकडोंभिपा

    गंगा जउना माझें रे बहइ नाइ।

    तहिं बुड़िली मातङ्गीपोइआ लीले पार करेइ॥

    बाहतु डोम्बी बाहलो डोम्बी बाटत भइल उछारा।

    सदगुरु पाअपसाएँ जाइब पुणु जिनउरा॥

    पाञ्च केड़ुआल पड़न्ते माङ्गे पिठत काच्छी बान्धि।

    गअण हुखोलें सिञ्चहु पाणी पइसइ सान्धि॥

    चन्दसूज्ज दुइ चका सिठिसंहार पुलिन्दा।

    वामदाहिण दुइ माग चेवइ बाहतु छन्दा॥

    कवड़ी लेइ बोड़ी लेइ सुच्छड़े पार करइ।

    जो रथे चड़िला बाहवा जाइ कुलेँ कुलेँ बुड़इ॥

    गंगा और यमुना यानी चंद्राभास और सूर्याभास के बीच इन दोनों की शुक्रनाड़ी रूपी एक नौका चलती रहती है, मातंगी योगिनी उसमें विराजित है, इसलिए वह अपने समस्त पुत्रों को लीला-क्रम में पार लगा देती है।

    डोम्बी! तुम इसे खेती चलो। रास्ते में ही बहुत देर हो गई। तुम लगातार नौका खेती रहो। गुरु कृपा से मैं पुनः जिनपुर जाऊँगा।

    गुरु के उपदेश रूपी पाँच पीठ इस मार्ग में पड़ते हैं। पीठ में शून्य रूपी रस्सा बाँधकर रखा गया है। तुम उस शून्य सेचनी द्वारा विषयरूपी जल उलीचती रहो, ताकि वह शरीर में प्रविष्ट हो जाय।

    चन्द्र रूपी प्रज्ञाज्ञान और सूर्य रूपी अद्वयज्ञान के दो चक्रों को हाथों में ले पुलिंद सृष्टि और संहार करते हैं। डोम्बी! सर्वधर्म के समुद्र में नौका खेती हुई तुम वाम एवं दक्षिण, इन दो पथों पर सचेत भाव से आगे बढ़ना।

    पार उतारने के लिए मल्लाह मूल्य ग्रहण करता है, किंतु योगिनी कौड़ी तक नहीं लेतीं। वह तो निःशुल्क ही पार उतार देती है। जिसका नैरात्म्य धर्म के साथ परिचय नहीं है, वे साधना शक्ति के अभाव में किनारे (काया में) ही डूब जाते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सहज सिद्ध : चर्यागीति विमर्श (पृष्ठ 78)
    • संपादक : रणजीत साहा
    • रचनाकार : डोम्बीपा
    • प्रकाशन : यश पब्लिकेशन्स
    • संस्करण : 2010

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