रमेशचंद्र शाह की संपूर्ण रचनाएँ
कविता 5
उद्धरण 12
जीवंत, आँख के सामने घटित होने वाले इतिहास को भी, कैसे हमारे अपने लोग एक पुराण की रूपावली-शब्दावली में ही देखते-परखते-महसूस करते रहे है—यह तो शायद हम सभी जानते होंगे। किंतु हमारे उस 'जानने' को इतने तीव्र, सघन और संश्लिष्ट रूप में रचकर; उसे हमारे अंत:चक्षुओं के सामने प्रत्यक्ष करा देने की क्षमता, उपन्यासकार में ही होती है।
विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।