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अपने बचपन से आप क्या बदलना चाहेंगी?

apne bachpan se aap kya badalna chahengi?

रेखा सेठी

रेखा सेठी

अपने बचपन से आप क्या बदलना चाहेंगी?

रेखा सेठी

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    ड्यूक यूनिवर्सिटी, अमेरिका की एक हिंदी कक्षा में हूँ। विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने वाले इंटरमीडिएट के विद्यार्थियों को मुझसे बातचीत करने को कहा गया है। भारत से आई हिंदी की प्रोफ़ेसर से वे कुछ भी सवाल पूछ सकते हैं। मुझसे हिंदी में बातचीत करने से उनके भाषायी कौशल को बल मिलेगा। एक-एक कर छोटे-छोटे सवाल वे छात्र, मेरी ओर सरका रहे हैं। आपको क्या अच्छा लगता है, आपकी पसंदीदा फ़िल्म कौन-सी है? मैं जवाब देती हूँ ‘उमराव जान’। शायद कोई भी इस फ़िल्म से परिचित नहीं है। उनकी टीचर, कुसुम नैपसिक, जो अपने छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं, जल्दी से स्क्रीन पर ‘उमराव जान’ का एक पोस्टर दिखाती हैं और बताती हैं कि यह पुरानी ‘उमराव जान’ है, जिसमें हिंदी सिनेमा की मशहूर अदाकारा रेखा ने मुख्य भूमिका निभाई थी, जो अपने संगीत और अभिनय के लिए विशेष लोकप्रिय हुई। कोई पूछता है कि क्या आपको ‘मसान’ अच्छी लगी? उस छात्र ने अभी-अभी साहित्य की अपनी एक कक्षा में दलित साहित्य का अध्ययन करते हुए यह फ़िल्म देखी है। मैं ‘हाँ’ कहने को ही हूँ कि अचानक कोई बहुत तेज़ी से पूछता है ‘उमराव जान’ ही क्यों और मैं कहती हूँ,

    “उसमें घनी उदासी है, जो मेरे मन के बहुत क़रीब है। आज भी इस फ़िल्म को देखते हुए मैं रो देती हूँ।”

    तभी तपाक से एक और सवाल आता है जिसके बारे में मैंने ख़ुद भी कभी नहीं सोचा था।

    “यदि आपको अपने बचपन का कुछ बदलना हो तो आप क्या बदलना चाहेंगी?”

    इस सवाल के लिए मैं तैयार थी क्योंकि कभी ऐसा नहीं सोचा कि जिसे जिया, उसे नहीं भी जीना था, उसे यूँ नहीं भी होना था, उसे बदला भी जा सकता है! मैं बहुत सोच कर जवाब देता हूँ कि शायद लड़की होने की वजह से आने-जाने पर जो पाबंदियाँ थीं अगर हो सकता तो उन्हें बदल देती। उन वर्जनाओं ने मेरे सपने जैसे बचपन में मेरे आत्मविश्वास को बौना किया। आज भी कहीं आने-जाने में मुझे लगता है कि सड़क पर कहीं खो जाऊँ!

    नॉर्थ कैरोलिना का डरम शहर, सड़कें एकदम साफ़-शफ़ाक़। किनारे-किनारे, कम ऊँचाई का फुटपाथ और उसके आसपास घने पेड़ों की पंक्ति। सड़क एकदम सपाट नहीं, दूर से देखो तो ऐसा लगता है कि सड़क की लहरें हों, कहीं उठती हुई, कहीं गिरती हुई दूर-दूर तक।

    विद्यार्थियों से बातें छिड़ गई हैं। भारत में, या कहीं भी लड़की होने का मतलब क्या है? दो विद्यार्थियों ने बहुत ख़ूबसूरत कविताएँ लिखी हैं। एक बताती है कि कैसे उसकी माँ किसी की बेटी, किसी की पत्नी और किसी की माँ होकर जीवन जी रही है और अब उसकी बेटी कविता में पूछ रही है—क्या बेटी, माँ या पत्नी होने के अलावा वह और कुछ नहीं है? और अगर वह अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी या अच्छी माँ हुई तो उसका कोई जीवन नहीं है? अमेरिका में रहने वाली उन्नीस-बीस बरस की भारतीय मूल की लड़की अपनी माँ के जीवन को देखकर अपनी कक्षा में यह कविता लिखती है, मेरा मन सीधे उससे जुड़ जाता है। मैं कहती हूँ—

    “ज़रा रुको, देखो, बहुत कुछ बदल भी रहा है। हमें उन सबकी तरफ़ भी देखना चाहिए”

    पर उस लड़की की पीड़ा को भी महसूस कर पाती हूँ। वह भारतीय मूल के माता-पिता की संतान है जो अमेरिका में पैदा हुई। घर और बाहर की दुनिया के बीच का अंतराल उसके भीतर यह कौन-सी खोखल पैदा कर रहा! उसकी बगल में एक दूसरी लड़की है जो अमेरिकी मूल की है, वह भी कविता लिख रही है। कैसे एक उम्र के बाद अफ़ग़ानिस्तान में बड़ी होती एक लड़की को भाइयों की तरह क़मीज़-पैंट पहनने से मना कर दिया गया है। अब वह अपने भाइयों के साथ बॉल के खेल नहीं खेल सकती। पिता ने आदेश दिया है, उसे हिजाब पहनना होगा। अफ़ग़ानिस्तान में बड़ी होती इस लड़की की जीवन यात्रा को अमेरिका में बैठी एक लड़की किस गहराई से महसूस करती है और यह अनुभव उसके लिए एक विदेशी भाषा में कैसे उतर आता है, कोई कोई बहनापा तो ज़रूर रहा होगा!

    यह यात्राएँ अलग-अलग बिंदुओं के बीच एक कड़ी बुन देती हैं फिर लौट आई हूँ अपने बचपन और उमराव जान के बचपन पर। उमराव जान बेहद ख़ूबसूरत थी इसलिए उन लोगों द्वारा ख़रीद ली गई जो उसे कोठे पर बेच सकते थे। मासूम बचपन कोठे पर नीलाम हो गया! उसकी उदासी आज भी मुझ तक पहुँचती है। मेरी आँखें नम हो आती हैं। अपने बचपन का एक पन्ना भी उसी उदासी से जुड़ता है। भारतीय परिवारों में हम लगातार बच्चों को यही सिखाते हुए बड़ा करते हैं कि वे कुछ नहीं जानते। हमारे बच्चों का मनोबल इस रोक-टोक और वर्जनों में कमज़ोर होता जाता है। बड़े-बड़े मुक़ाम पर पहुँच कर भी मन कमज़ोर ही रहता है। इधर चलो या उधर, कौन-सा रास्ता कहाँ ले जाएगा, कहाँ रुकना होगा, कहाँ बैठ जाना होगा और कहाँ हर बंधन को तोड़कर अपने मन की साँकल से छूट हिम्मत से अपना रास्ता ख़ुद बनाना होगा।

    हर रोज़ भारत और विश्व की अनेक लड़कियाँ इन्हीं सवालों से जद्दोजहद करती हुई अपना रास्ता बनाती हैं। क्लास की खिड़की से बाहर देखती हूँ तो ख़ुश और जवान चेहरे दिखाई पड़ते हैं। ड्यूक विश्वविद्यालय दुनिया के महानतम विश्वविद्यालयों में से एक है। वहाँ अलग-अलग देशों से अलग-अलग नस्लों के लोग एक साथ पूरे उत्साह से एकजुट होकर अपना भविष्य निर्माण कर रहे हैं। भारत के उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाके से भी एक लड़की वहाँ बायो-टेक्नॉलजी में पीएच.डी. करने पहुँची है। मेरे एक विशेष व्याख्यान में शामिल होने आई थी। वह अपने जीवन के सकारात्मक बदलाव के विषय में बताती है। इन सबको देख मन आश्वस्त होता है। दुनिया बदल रही है, लड़कियों के लिए भी।

    ड्यूक में कई प्रोफ़ेसरान से भी मुलाक़ात हुई। प्रोफ़ेसर सत्ती खन्ना से मिलना भी मन को बदलने वाला अनुभव रहा। चार दिन की कक्षाओं में लगभग हर रोज़ उनसे मिलना हुआ। प्रोफ़ेसर खन्ना ने विनोद कुमार शुक्ल की अनेक पुस्तकों का हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। जब हम पहली बार मिले, तब हिंदी में स्त्री लेखन, दलित लेखन, विमर्शों की सैद्धांतिकी पर उनका एक ही सवाल रहा कि साहित्य और आलोचना की यह सारी पद्धतियाँ क्या हमारे भीतर कुछ परिवर्तन लाने की कोशिश करती हैं? क्या इनके साथ हम (थोड़ा या बहुत) बदलते हैं? पहले-पहल तो लगा कि स्व पर उनका आग्रह ज़रूरत से कुछ ज़्यादा है। साहित्य का काम समाज को समझने की, सामाजिक भेदभाव, असमानताओं को विश्लेषित करने, समानता के लिए संघर्ष और मुक्ति के रास्ते सुझाने की ज़रूरी दृष्टि देना भी है लेकिन प्रोफ़ेसर खन्ना जिस तरह धीमे-धीमे अपने स्व की बात कर रहे थे इसका एक आभास उनकी कक्षा में जाकर हुआ। वे हिंदी साहित्य का एक एडवांस्ड कोर्स पढ़ाते हैं और उन्होंने इस कोर्स के लिए कुछ यात्रा वृत्तांतों को चुना है क्योंकि उनकी नज़र में यात्राएँ हमें बहुत हद तक बदलती हैं। वे जहाँ हमें बदलती हैं, वहीं पाठकों के लिए एक नई दुनिया भी खोलती हैं।

    उन दिनों उनकी कक्षा में कृष्णा सोबती का यात्रा वृत्तान्त ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ चल रहा था। उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं उनके विद्यार्थियों के लिए लगभग डेढ़ पृष्ठ के एक अंश पर टिप्पणी करूँ। उनकी इच्छा थी कि विद्यार्थियों को अपने शिक्षक के अतिरिक्त विश्व के एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक का पर्सपेक्टिव मिले। उनकी इस पहल से मुझे ख़ुशी हुई। मैंने अपनी बात कृष्णा जी के परिचय से शुरू की ताकि विद्यार्थियों के मन में एक छवि बने, वे उस लेखक को जान पाएँ जिसकी यात्राओं के वे सहभागी बन रहे हैं। मेरी कृष्णा जी से जो दो तीन मुलाक़ातें हुईं थीं, उनके हवाले से मैंने कुछ चर्चा की। कुछ बात उनकी वेशभूषा की हुई, जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी पुस्तक ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान तक’ में किया है। फिर, कृष्णा जी के लिए लेखन किस तरह से एक रजिस्टेंस या प्रतिरोध रहा। उन्होंने राजनीतिक घटनाओं पर लिखा।

    भारत की बहुलतावादी संस्कृति में विश्वास जताते हुए हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ के मुखपृष्ठ पर उनका लेख आया ‘देश जो अयोध्या है और फैज़ाबाद भी’। मैंने उन्हें कृष्णा जी की भाषा में प्रयोगधर्मिता के विषय में बताया और फिर साहित्यिक विधा के रूप में यात्रा वृत्तांत पर कुछ बातचीत हुई। कैसे जीवन में विवरणात्मक कुछ घटनाएँ साहित्य का रूप ले लेती हैं। यात्रा वृत्तांत यात्राओं का लेखा-जोखा भर नहीं है, वह विशिष्ट है क्योंकि एक मानवीय अनुभव उसे एक व्यक्ति की यात्रा से बदलकर एक संस्कृति की पहचान में बदल देता है।

    ड्यूक यूनिवर्सिटी में एडवांस्ड कोर्स पढ़ने वाले दो ही विद्यार्थी हैं लेकिन उस विदेशी विश्वविद्यालय में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ने वाले दो विद्यार्थियों के लिए भी हिंदी शिक्षण की व्यवस्था की गई है। एक छात्रा ने कक्षा के बाद अपने प्रोफ़ेसर से कहा कि उसका मन हुआ कि वह मुझसे गले मिल लेती। किसी भी शिक्षक के लिए यह बहुत सुकून देने वाली बात है कि जिस तरह वह साहित्य को डिकोड करता है, जिस तरह वह अर्थ की परतें खोल पाया उससे एक बहुत सीनियर प्राध्यापक और एक युवा विद्यार्थी समान रूप से प्रभावित हुए।

    कक्षा का यह अनुभव अत्यंत तरलता पूर्ण अनुभव है। सत्ती जी के व्यक्तित्व में अपनी विद्वता और अध्यापन को लेकर जरा भी दंभ नहीं। उस कमरे में बैठे हम पाँच लोग प्रोफ़ेसर सत्ती खन्ना, प्रोफ़ेसर कुसुम नैपसिक, मैं और वे दो युवा विद्यार्थी मानो एक ही अनुभव में पूरी तरह डूबे हुए है। यह अपने आप में सबसे बड़ा टेस्टिमोनियल है, आश्वस्त करने वाला! बचपन की घबराहट पीछे छूट गई। बरसों से पढ़ने-पढ़ाने का जो सिलसिला है, उसने दृष्टि को जिस तरह विस्तृत किया, नया आत्मविश्वास दिया पूरा कमरा उस मद्धिम आलोक से दीप्त लग रहा है।

    सड़क पर खो जाने का डर शायद अभी शेष है। ड्यूक की पूरी यात्रा में प्रोफेसर कुसुम नैपसिक मेरी संरक्षिका बनी रहीं। वे मुझे साथ ले जातीं और साथ ही वापस लातीं। यूनिवर्सिटी की बस एच-11 की दस मिनटीय यात्रा में हम एक जगह से दूसरी जगह जाते। ड्यूक यूनिवर्सिटी, अमेरिका की तेज़ दौड़ती दुनिया में एक धुला-पुंछा प्रांगण हो जैसे, तेज़ रफ़्तार यहाँ भी थी, छात्रों और शिक्षकों को एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग में कक्षा के लिए जाना पड़ता है। कुछ छात्र स्केट बोर्ड या फिर साइकिल-सी स्कूटी से एक जगह से दूसरी जगह जल्दी-जल्दी आते-जाते दिख जाते लेकिन अगर सड़कों, उनके किनारे बनी बिल्डिंगों, घरों और स्टूडेंट रेजिडेंस की तरफ़ देखा जाए तो उनकी अपनी एक गति है, अपने में डूबे होने की मंद मुस्कान हो जैसे!

    विश्वविद्यालय का एक आकर्षण ड्यूक गार्डन है। अत्यंत विस्तृत, पूरा देख पाना संभव नहीं। हम एक हिस्सा देखते हैं जिसे जापानी कहा जाता है। बीच में पानी है, उस पर लाल रंग का पुल, फॉल के रंग चारों ओर छाए हैं। अभी पेड़ों से पत्ते झड़ने शुरू नहीं हुए, बस रंग बदल गए हैं। हरे से पीला, केसरी, लाल।। लाल की भी कई छटाएँ हैं। गहरा गुलाबी, सिंदूरी, ख़ूब गहरा लाल, अँग्रेज़ी के मैरून जैसा। एक व्हाइट गार्डन भी है। सफेद फूल, सफ़ेद कद्दुओं की सजावट, चारों ओर हरा और सफ़ेद, मैनीक्युर्ड! फॉल के रंगों में थोड़ा फीका लग रहा है। इधर से उधर मेरे साथ प्रोफ़ेसर कुसुम नैपसिक हैं। मेरी ड्यूक यात्रा का सारा श्रेय उन्हीं को है। इससे पहले कुछ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उनसे मिलना हुआ लेकिन इस बार का अनुभव बिल्कुल अलग रहा। उनकी अपनी कहानी लड़कियों की हिम्मत की मिसाल है। सरल हृदया, बहुत मेहनत करने वाली।। शिक्षण को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। छात्रों के बीच उनकी लोकप्रियता देखकर अचंभित रह गई।

    विदेश से अक्सर यह समाचार आते हैं कि हिंदी की कक्षा में छात्रों की संख्या कम होती जा रही है। पढ़ने वालों की कोई ख़ास रुचि है, पढ़ाने वालों को नया कुछ करने का उतना उत्साह ही है। देखा जाए तो विदेशों में हिंदी शिक्षण की अपनी दिशा है। भाषा, साहित्य, लेखन विधाएँ, सिनेमा और विज्ञापन-सब, हिंदी सीखने-सिखाने में झरोखे का काम करते हैं। हिंदी भाषा की इंटरमीडीएट कक्षा में एक दिन हमने विज्ञापन की भाषा पर बात की। विज्ञापन की संरचना पर किए अपने शोध के आधार पर मैंने विद्यार्थियों से यह चर्चा की कि विज्ञापन भाषा का विचलन किस प्रकार करता है, वे कौन से तत्त्व हैं जो विज्ञापन की भाषा को रचनात्मक बनाते हैं आदि। बाज़ार को लक्ष्य बनाकर चलने वाले विज्ञापनों में अंतरराष्ट्रीय उत्पादों की पंचलाइन में कैसी समानताएँ होती हैं इनका विश्लेषण करने में छात्रों को बहुत आनंद आया। फिर उन सबने अपनी कल्पना से सजाकर एक-एक स्लोगन लिखा।

    साहित्य की कक्षाओं में हमने भारतीय स्त्री लेखन पढ़ते हुए अनामिका, कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम के साहित्य के कुछ अंश पढ़े। मैंने जो व्याख्याएँ कीं उनसे छात्रों के मन में एक नया उत्साह दिखा। उन्होंने बताया कि उनमें से कुछ भारतीय साहित्य पढ़ते रहे हैं लेकिन मैंने जो संदर्भ उठाए वैसा पहले उन्होंने नहीं सोचा था। कक्षा के अंत में कुछ छात्रों ने आभार व्यक्त किया। उनकी आँखों की चमक, पूरी भाव-भंगिमा मुझ तक पहुँच रही थी लेकिन दो दिन पहले उनका लिखा फीडबैक मिला जिसे पढ़कर मन आह्लादित है और अपने शिक्षक होने की सार्थकता पर थोड़ा मान हो आया है। इस सबके बीच यह सुनकर अच्छा लगा कि छात्र पूछ रहे हैं “कुसुम जी, आप अगले सेमेस्टर में क्या पढ़ाएँगी?” कुसुम जी की शिक्षण पद्धति ऐसी है कि उनकी क्लास के लिए वेटिंग लिस्ट है। विद्यार्थियों का कहना है उनकी कक्षाओं में सीखने के साथ आनंद आता है। कुसुम ड्यूक गार्डन में मुझे बता रही हैं कि वे एक मैप तैयार कर छात्रों को ‘ट्रेशर हंट’ के लिए भेजती हैं जिसमें दायें मुड़ें या बाएँ के साथ-साथ फूलों, वृक्षों, रंगों, सब्जियों के नामों की पहचान हँसते-हँसते हो जाती है। अनुभव और शिक्षा का भाषाई ताल-मेल। कोई अचंभा नहीं कि कुसुम जी को ड्यूक में ‘बेस्ट टीचर’ का सम्मान प्राप्त हुआ।

    ड्यूक की यह चार दिन की यात्रा सघन अनुभवों से भरी रही। पहले दिन होटल के बाहर सड़क पर जब झुटपुटा गहराने लगा तो अपनी थकान में डूबे हुए ख़ुद से ही पूछा कि इस उम्र में घर की सुरक्षा से इतनी दूर मैं क्या कर रही हूँ? सात समंदर पार क्या पाने आई हूँ? अब जीवन में शायद कुछ भी पाने को बाकी नहीं बचा फिर भी अज्ञात अनुभव का आकर्षण खींच लाया है। यात्राएँ अनुभव की धार पर जीवन को तराशने का काम करती हैं। आप स्वयं नहीं जानते कि कब कहाँ और क्या बदल जाएगा। अनजाने अनुभव, मन की सतह पर यूँ छा जाते हैं कि हमेशा के लिए स्मृति की परतों में बस जाते हैं। ड्यूक की यह यात्रा सदा ऐसे ही रहेगी!

    स्रोत :
    • रचनाकार : रेखा सेठी
    • प्रकाशन : समालोचन

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