जासूसी और ऐतिहासिक उपन्यास

नलिन विलोचन शर्मा

जासूसी और ऐतिहासिक उपन्यास

नलिन विलोचन शर्मा

और अधिकनलिन विलोचन शर्मा

     

    हिंदी-साहित्य की अपूर्णताओं और अभावों की तालिका काफ़ी लंबी-चौड़ी है। आप चाहें तो इस तालिका के बिल्कुल नीचे ही सही, जासूसी उपन्यासों और कहानियों को भी स्थान दे सकते हैं, लेकिन स्थान देना ज़रूर पड़ेगा।

    हिंदी के विद्वान् और गंभीर पाठक निस्संदेह इस शीर्षक को देखकर नाक-भौं सिकोड़ेंगे। जब हिंदी-साहित्य के सामने इतनी बड़ी-बड़ी समस्याएँ हैं तो यह बेवक्त की शहनाई कैसी? मेरा नम्र निवेदन है कि हिंदी के साहित्यिकों की विद्वत्ता और गंभीरता गौरव की वस्तु है और उनका प्रदर्शन आवश्यकता से अधिक हो चुका है और हो रहा है। हिंदी के बालखिल्य कवि भी क्रांतप्रज्ञ दार्शनिक के रूप में अवतीर्ण होते हैं, नवसिखुए औपन्यासिक भी संसार को कोई अभिनव संदेश देना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। अब गीतों की कहानियों के ‘पहले संग्रह' भी दूसरों की या अपनी लिखी हुई भूमिकाओं से भारी बनकर ही प्रकाशित होते हैं।

    साहित्य के बहुत सारे रूप हिंदी में अछूते पड़े हुए हैं चूँकि शायद हम उन्हें साहित्य का हल्का भाग समझते हैं। लेकिन साहित्यिक यदि समर्थ हैं तो न कोई विषय हल्का हो सकता है, न साहित्य का रूप ही। हिंदी में व्यक्तिगत निबंध, पर्सनल एस्से, नहीं के बराबर हैं। अँग्रेज़ी साहित्य से जानकारी रखने वालों को मालूम है, वहाँ इसका क्या महत्त्व है। व्यक्तिगत निबंधों के कारण ही वहाँ के कितने लेखक साहित्य के महारथी माने जाते हैं। और व्यक्तिगत निबंध है क्या? संक्षेप में उनकी परिभाषा दी जाती है एलेगैट नॉनसेंस, उनमें 'क्या' का कोई महत्त्व नहीं, 'कैसा' ही खास बात है। हिंदी में सियारामशरण जी ने एक हद तक 'सच-झूठ' में इस अभाव की पूर्ति की है, इधर काशी के साप्ताहिकों में भी इस ओर कभी-कभी कोई प्रयत्न दीख पड़ जाता है। यह आश्चर्य की बात है कि ऐसे निबंध भारतेंदु-युग में काफ़ी लिखे गए, लेकिन विकास के विपरीत परिमाण में विविधता का ह्रास होता गया; विद्वत्ता ने मौलिकता को गंभीरता से, हास्य-प्रियता को साहित्य से अपदस्थ-सा कर दिया।

    जासूसी गल्प का प्रारंभ भी विविधता-प्रधान भारतेंदु-युग में ही हुआ, लेकिन साहित्य के दूसरे अंगों के साथ-साथ उसका विकास नहीं हो सका। वह कला की पदवी पाने के बदले चार आना सीरीज़ की चीज़ बन गई। जासूसी गल्प के नाम पर प्रधानतः अँग्रेज़ी की सस्ती पुस्तकों के अनुवाद या रूपांतर ही मिलते हैं। हीलर कंपनी की परम उदार नीति का भरोसा नहीं रहता तो शायद इनका प्रकाशन भी बंद हो चुका रहता, जिसके लिए किसी को भी अफ़सोस नहीं होता।

    लेकिन जासूसी गल्प कोई हेय चीज़ नहीं, न हिंदी के पाठकों में इसकी माँग की ही कमी है। हिंदी के पाठक ही कुछ नहीं तो प्रतिवर्ष लाखों रुपए के अँग्रेज़ी जासूसी उपन्यास पढ़ डालते होंगे।

    अँग्रेज़ी में इसी बेहद माँग के कारण जासूसी गल्प, साहित्य का सम्मान्य नहीं तो उल्लेखनीय अंग बन ही चुका है। चेस्टरटन जैसे शरीर और बुद्धि से दिग्गज लेखकों ने जासूसी उपन्यास लिखे और कैनन डायल तो इस अंग के क्लासिकल राइटर हो चुके, आचार्य ही मान लिए गए हैं। साहित्य के इस अंग ने अँग्रेज़ी में इतनी उन्नति कर ली है कि साधारणतः कॉलेज की कहानियों की पाठ्य-पुस्तकों में एक-दो जासूसी कहानियाँ अवश्यमेव संगृहीत रहती हैं और उनकी विशेषताओं की आलोचना अध्यापक और आलोचक उसी प्रकार करते मिलेंगे, जिस प्रकार कविता, नाटक या उपन्यास कहानी की।


    ऐतिहासिक उपन्यास

    ऐतिहासिक उपन्यास की सरल परिभाषा है कि उसके पात्र, पृष्ठाधार और घटनाएँ अतीत से ली जाती हैं। लेकिन यह परिभाषा तब तक अपर्याप्त बनी रहती है जब तक हम ऐसे कुछ प्रश्नों के उत्थापन से उसे शाणित नहीं करते, जैसे पात्रों में से कितने ऐतिहासिक हैं? वे मुख्य पात्र हैं या गौण? पृष्ठाधार का क्या महत्त्व है? उसमें युग-विशेष के विवरणों पर ज़ोर दिया गया है अथवा राष्ट्रीय जीवन के स्थाई तत्त्वों पर? अतीत से क्या तात्पर्य है? कागज़ात में बँधा हुआ सुदूर अतीत या सजीव परंपराओं का निकट अतीत?

    ये प्रश्न ऐतिहासिक उपन्यासों को सामान्य रूप से, तीन श्रेणियों में विभक्त कर देते हैं। पहली श्रेणी है युगीन उपन्यास (द पीरियड नॉवेल) की, जो ऐतिहासिक गवेषणा और पुरातात्त्विक भावना से प्रेरित होकर लिखा जाता है और जिसमें किसी अतीत ख़ुश या समाज का सांगोपांग निर्माण किया जाता है। इसमें साधारणतः पात्र सजीव मनुष्य होने के बदले युग-विशेष के व्याख्यात्मक उदाहरण मात्र बन जाते हैं। दूसरी श्रेणी में ऐतिहासिक (द हिस्टोरिकल रोमांस) परिगणनीय है, जिसमें वर्तमान की एकरसता और जटिलता से पलायन कर सुदूर अतीत के राजाओं और वीरों के इतिहास-प्रसिद्ध कार्यों की कथा रहती है। तीसरी श्रेणी में वास्तविक ऐतिहासिक उपन्यास आता है। इस प्रकार का उपन्यास यथार्थ से बचने का प्रयास नहीं करता, अपितु उसे तीक्ष्ण और परिवर्धित ही करता है। अतीत की घटनाएँ, कम या अधिक स्पष्टता के साथ, वर्तमान से संबद्ध हो सकती है। ऐसा उपन्यास समकालीन परिस्थितियों की वास्तविकता मात्र से मूलभूत और चिरंतन समस्याओं और उद्देश्यों को अलग कर देता है। चूँकि सच्ची ऐतिहासिक दृष्टि रखने वाला लेखक वर्तमान की अपेक्षा अतीत को अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं मान सकता, इसलिए वह सुदूर अतीत से बचता है और ऐतिहासिक व्यक्तियों और इतिहास-प्रसिद्ध घटनाओं का कम-से-कम उपयोग करता है। यही कारण है कि प्रायः ऐसे उपन्यास में लेखक की एक पीढ़ी-भर पहले का पृष्ठाधार रहता है। इससे लाभ यह होता है कि लेखक ने अपने शैशव में जो कहानियाँ सुनी हैं, उनकी स्मृति सशक्त सर्जनात्मक प्रेरणा बन जाती है।

    ऐतिहासिक उपन्यास की एक चौथी श्रेणी भी है, जो अँग्रेज़ी के अनधिक प्रसिद्ध आधुनिक ऐतिहासिक उपन्यासकार एल. एच. मेयर्स की कृतियों से बन गई है, और जिसका निरूपण उन्होंने अपने उपन्यास 'द रूट एंड फ्लावर' की भूमिका में कुछ विस्तार से किया है। हम यहाँ उसका एक काफी बड़ा अंश प्रस्तुत करना उपादेय समझते हैं :

    “यह (द रूट एंड द फ्लावर) ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, यद्यपि इसका कार्य (एक्शन) अकबर (जो एलिज़ाबेथ का समसामयिक था) के काल में स्थापित किया गया है। इस उपन्यास में जीवन और चिंतन की पूर्वीय प्रणालियों के सुनिश्चित चित्रण का भी प्रयास नहीं किया गया है। स्थानिक रीति-रिवाज, इतिहास और भूगोल के साथ भी मैंने यथेच्छ छूट ली है; जो तथ्य उपयोगी थे उनसे काम लिया है और जो असुविधाजनक सिद्ध होते थे उन्हें तोड़ा-मरोड़ा भी है या उपेक्षित कर दिया है। इस उपन्यास के केवल चार पात्र ही वास्तविक व्यक्तियों के नाम से अभिहित हैं : सम्राट अकबर, उसके पुत्र सलीम और दानियल और अकबर के आध्यात्मिक सलाहकार शेख़ मुबारक। यह भी उल्लेखनीय है कि इन पात्रों में से भी जो एक पात्र सत्य को ध्यान में रखते हुए चित्रित किया गया है वह है अकबर।

    और अब मैं इस बात का खुलासा करना चाहता हूँ कि मैंने क्यों सोलहवीं शताब्दी के अवसानयुगीन भारत को अपने उपन्यास के चित्रपट के लिए चुना है। मेरा उद्देश्य रहा है कि मैं पाठक को जीवन के उस यंत्र से दूर हटा ले चलूँ जो उसके लिए सुपरिचित है; उन नामों और स्थानों के उल्लेख से बचूँ जो ऐसे साहचर्य के आधार हैं, जो मेरे लक्ष्य के लिए अनावश्यक हैं; पाठकों का ध्यान इस प्रकार आकृष्ट करूँ कि आज की सामाजिक और आर्थिक समस्याएँ व्यवधान न बन पाएँ। यह होते हुए भी, मैं जानता हूँ कि बहुत ऊँची उड़ान भरना खतरे से खाली नहीं है। वह कथाकार जो इतिहास और भूगोल की परिधि के बिलकुल बाहर उड़ जाता है, प्रारंभ में ही अपने सामने निस्सीम शून्यता पाता है। ऐसी स्थिति में उसे सभी कुछ प्रारंभ से ही कहना पड़ता है; यह तो मान नहीं लिया जा सकता कि उसके अतिप्राकृत लोक में भी आकाश नीला ही है और घास हरी। फलतः इस प्रकार की आत्यंतिक स्वतंत्रता लेखक और पाठक दोनों के लिए समान रूप से दूभर हो जाती है।

    किंतु अकबरकालीन भारतवर्ष का उदाहरण लीजिए चित्रपट पर तत्काल पर्याप्त, पर अत्यधिक नहीं, रेखाएँ उभर आती हैं। राजाओं और हाथियों, सफेद संगमर्मर के महलों, खजूर के कुंजों इत्यादि के एक अस्पष्ट चित्र की मैं कल्पना करता हूँ वह सुनिर्धारित तो नहीं है, किंतु उसमें पृष्ठभूमि के लिए उपयुक्त सुंदर और घुले-मिले रंगों की प्रचुरता है। और यही वह चीज़ है जिसे मैं चाहता हूँ। आपका जो सुविधाजनक सहज अज्ञान है उसका मुझे भरोसा है। उससे मुझे आवश्यक सभी चीज़ें मिल जाती हैं, बाकि तो मेरा काम है। हाँ, लेकिन जो क्षेत्र मैंने चुना है उसमें वह कौन-सी बात है जिसे करने का मेरा इरादा है? पाठक के मन में यह संदेह उत्पन्न हो सकता है कि उसके सम्मुख जो है वह एक दार्शनिक उपन्यास है, एक ऐसा उपन्यास जिसमें विभिन्न पात्र विचारों के मानवीकरण मात्र हैं। और अगर यह बात है', पाठक कहेगा, तो पुस्तक न तो उपन्यास के रूप में और न ही दर्शन के रूप में ही पढ़ने के योग्य हो सकती है। मैं उससे सहमत हूँ, और आशा करता हूँ कि यह उपन्यास दार्शनिक है तो एक दूसरे ही अर्थ में। ऐसे तो शायद ही कुछ प्राणी होंगे जो सृष्टि के साथ उनका क्या संबंध है, जब वे इस पर विचार करते हैं तो जिज्ञासा, विस्मय, यहाँ तक कि आतंक की भावना से बचे रहते हों। फलतः जो लेखक दार्शनिक तत्त्व वे बिल्कुल ही बचे रहने को दृढ़ प्रतिज्ञ है, उसे जिस तरह भी हो सके, मानव-प्रकृति के इस पक्ष की पूर्ण अवज्ञा करनी पड़ेगी। बहुतेरे उपन्यासकार किसी-न-किसी कारण ऐसा करते ही हैं; और, मैं यहाँ यह भी जोड़ दूँ, सृष्टि की व्याख्या करते हुए अनेक पेशेवर दर्शनिक भी ऐसा कर गुज़रते हैं। लेकिन मेरी दृष्टि में ऐसा करना खतरे से ख़ाली नहीं है क्योंकि जिसकी हम अवज्ञा करते हैं, उसे हम भूल भी जा सकते हैं। और निश्चय ही वे प्रश्न, जो प्रत्येक शिशु के मन में उठा करते हैं, याद रखे जाने चाहिए। और कुछ नहीं तो कम से कम इसलिए याद रखे जाने चाहिए कि वे मानवीय आवश्यकताओं में गंभीरतम है। आवश्यकताओं को उपेक्षा कर दीजिए, इन प्रश्नों को भूल जाइए, और होगा यह कि आप संतुष्ट हो जाएँगे ऐसी कला से जो क्षुद्र है, ऐसे तक से जो पंडिताऊ है, ऐसे ज्ञान से जो रोटी की तरह तृप्तिकर होने के बदले पत्थर की तरह अग्राह्य है।
    व्यक्तियों का वर्णन करने वाले उपन्यास और सृष्टि का वर्णन करने वाले दर्शन में, मैं समझता हूँ, एक नैसर्गिक संबंध है। जबतक एक उपन्यासकार मनुष्यता की साधारण नैतिक और दार्शनिक समस्याओं के प्रति कलात्मक तटस्थता प्रदर्शित करता है, तो हममें कुछ है जो विरोध में उठ खड़ा होता है। हम उसपर आत्मकेंद्रित वाग्जाल या कलात्मक पाखंड का अभियोग लगाते हैं। उदाहरण के लिए सभी भावनाओं को समान रूप से महत्त्वपूर्ण, और चरित्र के सभी प्रकट रूपों का सार्थकता के स्तर पर, मान लेने के कारण अपनी उपलब्धि में कुछ भी जोड़ नहीं हो सके हैं, वे केवल अपना और हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं क्योंकि हम समझते हैं कि वे कलात्मकता के एक क्षुद्र रूप का उन्नयन करना चाह रहे हैं।

    जहाँ तक मेरा सवाल है, मेरा विश्वास है कि जिस मनुष्य में नैतिक रुचि है; उसके प्रति अगर वह आदर दिखाता है तो वह अपना हित करता है। इसके लिए, जैसा मैं देखता हूँ, यह ज़रूरी नहीं है कि बौद्धिक अखंडता का बलिदान किया जाए; ज़रूरी सिर्फ यह है कि विचारण का प्रयोग अधिक कल्पनात्मक वस्तुतः अधिक तटस्थ हो। इसमें शायद ही संदेह का अवकाश हो कि संप्रति विचार का यह सबसे आवश्यक कर्त्तव्य है कि वह संपूर्ण मानस में अपनी स्थिति की परीक्षा करे, यह सोचे कि किस प्रेरणा से वह काम करता है, किन क्षेत्रों में वह नियमों की स्थापना कर सकता है, अपने को छोड़कर वह किन दूसरी मानसिक प्रक्रियाओं को कितने अधिकार दे सकता है, और अंततः नैतिक और सौंदर्यात्मक बोध की प्रतियोगी माँगों यदि वे सचमुच प्रतियोगी हैं, के संबंध में क्या निर्णय दे सकता है। जहाँ कलात्मक बोध और उसके परिष्कारों को बहुत महत्त्व दिया जाता है, वहीं हम नैतिक बोध के बारे में बहुत कम सुनते हैं। इसकी उपेक्षा की जाती है और उस बद्धमूल आध्यात्मिक ग्राम्यता की ओर, जो हमारी सभ्यता की आत्मा में व्याप्त है, साधारणतः हमारा ध्यान तक नहीं जाता। कलाओं के पारखी होते हैं, किंतु क्या चारित्र्य के भी पारखी होते हैं? ऐसा साधारण विश्वास है कि नैतिक और आध्यात्मिक विवेक का गुण सार्वभौम है, और कम या अधिक सभी मनुष्यों में वर्तमान रहता है। लेकिन क्या यह वस्तुतः सत्य है? और क्या चरित्र की सभी बातें सतह पर रहती हैं जो चाहे एक नजर में उनका पता पा जाए? क्या चरित्र में कम परिष्कार होते हैं, या उन्हें परख सकना कठिन है? क्या व्यक्तित्वों में कला-कृतियों से कम गुण विस्तार रहता है? और अंत में, क्या यह सचमुच ठीक है कि जहाँ कला में गुण का मूल्यांकन किया जा सकता है वहाँ व्यक्तित्व में सुदंर-असुदंर का भेद केवल व्यक्तिगत पसंद और नापसंद का है? मुझे आशा है, ऐसा नहीं है।

    ऐतिहासिक उपन्यास, जैसा हिंदी या गुजराती में लिखा गया है, गहन, दर्शनोत्क और सार्थक नहीं है। वह 'बिग बाओ-वाओ स्टोरीज़' से ज्यादा कुछ नहीं है। स्कॉट ने इन शब्दों में अपने वैसे ऐतिहासिक उपन्यासों का उल्लेख किया था जिनमें जीवन के उल्लास और अतीत के गौरव की भावना से पूर्ण साहस, रुमानियत और प्रकृति-वर्णन तो थे, किंतु जिनमें 'वह ऐंद्रजालिक स्पर्श नहीं था, जो वर्णन और मनोवेगों की सत्यता से अतिशय साधारण वस्तुओं और चरित्रों को महत्त्वपूर्ण बना देता है। 

    हिंदी या गुजराती के ऐतिहासिक उपन्यासकार क्या स्कॉट की तरह अपना वास्तविक मूल्य समझते हैं?

    स्रोत :
    • पुस्तक : त्रिमासिक साहित्य वर्ष 4 अंक 1 (पृष्ठ 144)
    • रचनाकार : नलिन विलोचन शर्मा
    • संस्करण : 1953

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