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स्विमिंग पूल

sviming pool

असग़र वजाहत

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असग़र वजाहत

और अधिकअसग़र वजाहत

    मुझे लग रहा था कि जिसका मुझे डर था, वही होने जा रहा है। और अफ़सोस यह कि मैं कोशिश भी करूँ तो उसे रोक नहीं सकता। मैंने कई प्रयत्न किए कि पत्नी मेरी तरफ़ देख लें ताकि मैं इशारे ही इशारे में उन्हें ख़ामोश रहने का इशारा कर दूँ, लेकिन वे लगातार वी.आई.पी. से बातें किए जा रही थीं।

    मेरे सामने कुछ दूसरे अतिथि खड़े थे, जिन्हें छोड़कर मैं एकदम से पत्नी और वी.आई.पी. की तरफ़ नहीं जा सकता था। प्रयास करता हुआ जब तक में वहाँ पहुँचा तो पत्नी वी.आई.पी. से 'उसी' के बारे में बात कर रही थीं। धाराप्रवाह बोल रही थीं। मैं शर्मिंदा हुआ जा रहा था। जब मुझसे ख़ामोश रहा गया तो बोला, अरे छोड़ो, ठीक हो जाएगा।

    पत्नी ग़ुस्से में बोलीं, “आपको क्या है, सुबह घर से निकल जाते हैं तो रात ही में वापस आते हैं। जो दिन-भर घर में रहता हो उससे पूछिए कि क्या गुज़रती है।

    यह कहकर पत्नी फिर 'उसके' बारे में शुरू हो गईं। मैं दिल ही दिल में सोचने लगा कि पत्नी पागल नहीं तो, हद दर्जे की बेवक़ूफ़ ज़रूर है जो इतने बड़े, महत्त्वपूर्ण और प्रभावशाली वी.आई.पी. से शिकायत भी कर रही है तो ये कि देखिए, हमारे घर के सामने नाला बहता है, उसमें से बदबू आती है, उसमें सूअर लोटते हैं, उसमें आसपास वाले भी निगाह बचाकर गंदगी फेंक जाते हैं, नाले को कोई साफ़ नहीं करता। सैकड़ों बार शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं। एक बार तो किसी ने भरा हुआ इतना बड़ा चूहा फेंक दिया था। वह पानी में फूलकर आदमी के बच्चे जैसा लगने लगा।

    यह सच है कि हमने घर के सामने वाले नाले की शिकायतें सैकड़ों बार दर्ज कराई हैं, लेकिन नाला साफ़ कभी नहीं हुआ। उसमें से बदबू आनी कम नहीं हुई। जब हम लोग शिकायतें करते-करते थक गए तो ऐसे परिचितों से मिले जो इस बारे में मदद कर सकते थे, यानी कुछ सरकारी कर्मचारी या नगरपालिका के सदस्य या दूसरे क़िस्म के प्रभावशाली लोग। लेकिन नाला साफ़ नहीं हुआ। हमारे यहाँ जो मित्र लगातार आते हैं, वे नाला सफ़ाई कराने संबंधी पूरी कार्यवाही से परिचित हो गए हैं। सब जानते हैं कि इस बारे में उपराज्यपाल को दो रजिस्टर्ड पत्र जा चुके हैं। इसके बारे में एक स्थानीय अख़बार में फ़ोटो सहित विवरण छप चुका है। इसके बारे में महानगरपालिका के दफ़्तर में जो पत्र भेजे गए हैं उनकी फ़ाइल इतनी मोटी हो गई है कि एक आदमी से उठाए नहीं उठती, आदि-आदि।

    वी.आई.पी. को घर बुलाने से पहले भी मुझे डर था कि पत्नी कहीं उससे नाले का रोना लेकर बैठ जाएँ। क्योंकि मैं उनकी मानसिक हालत समझता था, इसीलिए मैंने उन्हें समझाया था कि देखो, नाला-वाला छोटी चीज़ें हैं, यह वी.आई.पी. के बाएँ हाथ का भी नहीं, आँख के इशारे का काम है। ये काम तो उनके यहाँ आने की ख़बर फैलते ही, अपने आप हो जाएगा। लेकिन इस वक़्त पत्नी सब कुछ भूल चुकी थीं। मजबूरन मुझे भी वी.आई.पी. के सामने 'हाँ', 'हूँ' करनी पड़ रही थी। आख़िरकार वी.आई.पी. ने कहा कि यह चिंता करने की कोई बात ही नहीं है।

    वी.आई.पी. के आश्वासन के बाद ही पत्नी कई साल के बाद ठीक से सो पाईं। उन्हें दोस्तों और मोहल्ले वालों ने बधाई दी कि आख़िर काम हो ही गया। वी.आई.पी. के आश्वासन से हम लोग इतने आश्वस्त थे कि एक-दो महीने तो हमने नाले के बारे में सोचा ही नहीं, उधर देखा ही नहीं। नाला हम सबको कैंसर के उस रोगी जैसा लगता था जो आज मरा तो कल मर जाएगा।...कल सही तो परसों पर मरना निश्चित है। धीरे-धीरे नाला हमारी बातचीत से बाहर हो गया।

    जब कुछ महीने गुज़र गए तो पत्नी ने महानगरपालिका को फ़ोन किया। वहाँ से उत्तर मिला कि नाला साफ़ किया जाएगा। फिर कुछ महीने गुज़रे, नाला वैसे का वैसा ही रहा। पत्नी ने वी.आई.पी. के ऑफ़िस फ़ोन किए। वे इतने व्यस्त थे, दौरों पर थे, विदेशों में थे कि संपर्क हो ही नहीं सका।

    महीनों बाद जब वी.आई.पी. से संपर्क हुआ तो उन्होंने बहुत आत्मविश्वास से कहा कि काम हो जाएगा। चिंता मत कीजिए। लेकिन यह उत्तर मिले जब छह महीने बीत गए तो पत्नी के धैर्य का बाँध टूटने लगा। वे मंत्रालय से लेकर दीगर दफ़्तरों के चक्कर काटने लगीं। इस मेज़ से उस मेज़ तक। उस कमरे से इस तक। सिर्फ़ 'हाँ' 'हाँ' 'हाँ' 'हाँ' जैसे आश्वासन मिलते रहे, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

    एक दिन जब मैं ऑफ़िस से लौटकर आया तो पत्नी ने बताया कि उन्होंने नाले में बहुत-से फूल बहते देखे हैं।

    मैंने कहा, किसी ने फेंके होंगे।

    इस घटना के दो-चार दिन बाद पत्नी ने बताया कि उन्होंने नाले में किताबें बहती देखी हैं। यह सुनकर मैं डर गया। लगा, शायद पत्नी का दिमाग़ हिल गया है, लेकिन पत्नी नॉर्मल थीं।

    फिर तो पत्नी ही नहीं, मोहल्ले के और लोग भी नाले में तरह-तरह की चीज़ें बहती देखने लगे। किसी दिन जड़ से उखड़े पेड़, किसी दिन चिड़ियों के घोंसले, किसी दिन टूटी हुई शहनाई।

    एक दिन देर से रात गए घर आया तो पत्नी बहुत घबराई हुई लग रही थीं। बोलीं, “आज मैंने वी.आई.पी. को नाले में तैरते देखा था। वे बहुत ख़ुश लग रहे थे। नाले में डुबकियाँ लगा रहे थे। हँस रहे थे। किलकारियाँ मार रहे थे। उछल-कूद रहे थे, जैसा लोग स्विमिंग पूल में करते हैं!

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 305)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : असग़र वजाहत
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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