शवयात्रा

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ओमप्रकाश वाल्मीकि

और अधिकओमप्रकाश वाल्मीकि

    चमारों के गाँव में बल्हारों का एक परिवार था, जो जोहड़ के पार रहता था। चमारों और बल्हारों के बीच एक सीमा रेखा की तरह था जोहड़। बरसात के दिनों में जब जोहड़ पानी से भर जाता था तब बल्हारों का संपर्क गाँव से एकदम कट जाता था। बाक़ी समय में पानी कम हो जाने से किसी तरह वे पार करके गाँव पहुँचते थे। यानी बल्हारों के गाँव तक जाने का कोई रास्ता नहीं था। रास्ता बनाने की ज़रूरत कभी किसी ने महसूस ही नहीं की थी।

    जब किसी चमार को उनकी ज़रूरत पड़ती, तो जोहड़ के किनारे खड़े होकर आवाज़ लगा देता। जोहड़ इतना बड़ा भी नहीं था, कि बल्हारों तक आवाज़ ही पहुँचे। आवाज़ सुनकर वे बाहर जाते थे।

    परिवार में सिर्फ़ दो जन ही रह गए थे—सुरजा, जिसकी उम्र ढल चुकी थी; और उसकी बेटी संतों, जो शादी के तीसरे साल में ही विधवा होकर मायके लौट आई थी। सुरजा की घरवाली को मरे भी तीन साल हो गए थे। घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियाँ संतों ने सँभाल रखी थी। सुरजा वैसे भी काफ़ी कमज़ोर हो चला था। उसे सूझता भी कम था। लेकिन फिर भी गाँव के छोटे-मोटे काम वह कर ही देता था।

    सुरजा का एक बेटा भी था, जो दस-बारह साल की उम्र में ही घर छोड़कर भाग गया था। कुछ साल इधर-उधर भटकने के बाद उसे रेलवे में नौकरी मिल गई थी। इस नौकरी ने ही उसे पढ़ने-लिखने की ओर आकर्षित किया था। इसी तरह उसने हाईस्कूल करके तकनीकी प्रशिक्षण लिया और रेलवे में ही फिटर हो गया था। नाम था कल्लू, जो अब कल्लन हो गया था।

    जब संतों की शादी हुई थी, सारा ख़र्च कल्लन ने ही उठाया था। सुरजा के पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं थी। कल्लन की शादी भी रेलवे कॉलोनी में ही हो गई थी। उसके ससुर भी रेलवे में ही थे। उसे पढ़ी-लिखी पत्नी मिली थी, जिसके कारण उसके रहने-सहन में फ़र्क़ गया था। उसके जीवन का ढर्रा ही बदल गया था।

    गाँव वह यदाकदा ही आता था। लेकिन जब भी वह गाँव आता, चमार उसे अजीब-सी नज़रों से देखते थे। कल्लू से कल्लन हो जाने को वे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उनकी दृष्टि में वह अभी भी बल्हार ही था, समाज-व्यवस्था में सबसे नीचे यानी अछूतों में भी अछूत।

    गाँव में वह अपने आपको अकेला महसूस करता था। परिवार के बाहर एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जिससे वह दो घड़ी बतिया सके। गाँव के पढ़े-लिखे लोग भी उससे कटे-कटे रहते थे। आख़िर वह था तो बल्हार ही, जोहड़ पार रहने वाला। गाँव वाले उसे कल्लू बल्हार ही कहकर बुलाते थे। उसे यह संबोधन अच्छा नहीं लगता था। नश्तर की तरह उसे बाँधकर हीन भावना से भर देता था।

    इस बार वह काफ़ी दिन बाद गाँव आया था। उसने आते ही सुरजा से कहा, “बापू, मेरे साथ दिल्ली चलो। सरकारी मकान में सब एक साथ रह लेंगे।”

    “ना बेट्टे, इब आख़री बख़त में यो गाँव क्यूँ छुड़वावे... पुरखों ने यहाँ आक्के किसी जमान्ने में डेरा डाल्ला था। यहीं मर-खप्प गए, इसी माट्टी में। इस जोहड़ की ढैंग पे रहके जिनगी काट दी। इब कहाँ जांगे,” सुरजा ने आँखें मिचमिचाकर अपने मन की बात कही थी, जैसे अतीत में वह कुछ ढूँढ़ रहा था।

    कल्लन ने संतों की ओर देखा। वह तो चाहती थी, इस जहालत से छुटकारा मिले। लेकिन बापू की बात काटने का उसमें कभी पहले हौसला था, अब है, बस चुपचाप बैठकर पैरे के अंगूठे से मिट्टी कुरेदने लगी थी। जैसे उसका सोच उसे कहीं बहुत दूर ले जा रहा था, जहाँ दूर-दूर तक भी कोई किनारा दिखाई नहीं पड़ता था। कल्लन ने ज़ोर देकर कहा, “बापू, यहाँ तो इज़्ज़त है, ना रोटी, चमारों की नज़र में भी हम सिर्फ़ बल्हार हैं... यहाँ तुम्हारी वजह से आना पड़ता है... मेरे बच्चे यहाँ आना नहीं चाहते... उन्हें यहाँ अच्छा ही नहीं लगता...”

    उसकी बात बीच में ही काटकर सुरजा बोला, “तो बेट्टे, हियाँ मत आया कर... म्हारी तो कट जागी इसी तरह। बस, संतों की फ़िकर है। यो अकेल्ली रह जागी... यो टूटा-फूटा घर भी शायद अगली बारिश ना देख पावे। तुझे जो म्हारी चिंता है, तो तू इस घर कू पक्का बणवादे...” सुरजा के मन में यह बात कई बार आई थी। लेकिन कह नहीं पाया था। आज मौक़ा पाकर कह दिया।

    “बापू, मेरे पास जो दो-चार पैसे हैं, उन्हें यहाँ लगाकर क्या होगा। आपके बाद मैं तो यहाँ रहूँगा नहीं... संतों मेरे साथ दिल्ली चली जाएगी,” कल्लन ने साफ़-साफ़ कह दिया।

    सुनते ही सुरजा भड़क गया। उसके मुँह से गालियाँ फूटने लगीं। चिल्लाकर बोला, “तू! मेरे मरने का इंतिज़ार भी क्यूँ करै है... इसे आज ही ले जा। और हाँ, अपणे पैसों की धौंस मुझे ना दिखा... अपने धौरे रख... जहाँ इतनी कटगी है, आगे बी कट ही जागी।”

    उन दोनों के बीच जैसे अचानक संवाद सूत्र बिखर गए थे। ख़ामोशी उनके इर्द-गिर्द फैल गई थी।

    सुबह होते ही कल्लन दिल्ली चला गया था। पैसों का बंदोबस्त करके वह हफ़्ते भर में लौट आया था। साथ में पत्नी सरोज और दस साल की बेटी सलोनी भी आई थी। बेटे को वे उसकी ननिहाल में छोड़कर गए थे। कल्लन ने आते ही बापू से कहा, “किसी मिस्तरी से बात करो। कल ईंटों का ट्रक जाएगा।”

    सुनते ही सुरजा की आँखों में चमक गई थी। उसे कल्लन की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ था। लेकिन कल्लन ने उसे विश्वास दिला दिया था। वह उसी वक़्त मिस्तरी की तलाश में निकल पड़ा था।

    गाँव में ज़्यादातर मकान सूरतराम ठेकेदार ने बनाए थे। सुरजा उसी के पास पहुँचा, “ठेकेदारजी, म्हारा भी एक मकान बणा दो।”

    सूरतराम ने पहले तो सूरजा को ऊपर से नीचे तक देखा। तन पर ढंग का कपड़ा नहीं और चला है पक्का मकान बनवाने। सूरतराम जल्दी में था। उसे कहीं जाना था। उसने हँसकर सुरजा को टाल दिया, “आज तो टेम ना है, फिर बात करेंगे।”

    सुरजा ने हार नहीं मानी। सुबह ही वह मुँहअँधेरे निकल पड़ा था। पास के गाँव में साबिर मिस्तरी था। पुराना कारीगर। सुरजा ने उसे अपने आने का मक़सद बताया। साबिर मान गया था, “ठीक है, मैं कल आके देख लूँगा। अपना मेहनताना पेशगी लूँगा।

    “ठीक है मिस्तरीजी। कल जाओ... जोहड़ पे ही म्हारा घर है,” सुरजा अपनी ख़ुशी छिपा नहीं पा रहा था। लौटते समय उसके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। कमज़ोर शरीर में भी जैसे स्फूर्ति भर गई थी।

    जब तक वह लौटकर घर पहुँचा, ईंटें चुकी थीं। लाल-लाल ईंटों को देखकर सुरजा अपनी थकावट भूल गया था। वह उल्लास से भर उठा था। उसने ऐसी ख़ुशी इससे पहले कभी महसूस ही नहीं की थी।

    जोहड़ पार ईंटे उतरती देखना गाँव के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था। पूरे गाँव में जैसे भूचाल गया था। गाँव के कई लोग जोहड़ के किनारे खड़े थे।

    रामजीलाल कीर्तन सभा का प्रधान था। रविदास जयंती पर रात-भर कीर्तन चलता था। भीड़ में वह भी खड़ा था। जब उससे रहा नहीं गया तो चिल्लाकर बोला, “अबे ओ! सुरजा... यो इन्टे कोण लाया है?”

    सुरजा ने उत्साहित होकर कहा, “अजी बस, म्हारा कल्लण पक्का घर बणवा रिया है।”

    रामजीलाल की आँखें फटी की फटी रह गईं। अपने भीतर उठते ईर्ष्या-द्वेष को दबाकर उसने कहा, “यो तो चोखी बात है सुरजा... पर पक्का मकान बणवाने से पहले परधानजी से तो पूछ लिया था या नहीं?”

    रामजीलाल की बात तीर की तरह सुरजा के सीने में उतर गई। उसे लगा, जैसे कोई सूदखोर साहूकार सामने खड़ा धमकी दे रहा है। ग़ुस्से पर काबू पाने का असफल प्रयास करते हुए सुरजा ग़ुर्राया, “परधान से क्या पूछणा...?”

    “फेर भी पूछ तो लेणा चाहिए था,” कहकर रामजीलाल तो चला गया लेकिन सुरजा को संशय में डाल गया था।

    रामजीलाल सीधा प्रधान के पहुँचा। जोहड़ पार के हालात नमक-मिर्च लगाकर उसने प्रधान बलराम सिंह के सामने रखे। बलराम सिंह ने उस वक़्त कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर नहीं की। सिर्फ़ सिर हिलाकर मूँछों पर हाथ फेरता रहा। प्रधान भी घाघ था। वह रामजीलाल की फ़ितरत से वाक़िफ़ था। उसके चले जाने के बाद वह कुछ ग़मगीन-सा हो गया था। सुरजा बल्हार पक्का मकान बनवा रहा है, यह बात उसे बैचेन करने के लिए काफ़ी थी। वैसे भी सुरजा गाँव के लिए अब उतना उपयोगी नहीं था।

    यह ख़बर पूरे गाँव में फैल गई थी, जोहड़ पार बल्हारों का पक्का मकान बन रहा है। रेलवे की कमाई है, ईंटों का ट्रक गया है। सीमेंट, रेत, बजरी, सरिये रहे हैं। बात फैलते-फैलते इतनी फैल गई कि मकान नहीं गाँव की छाती पर हवेली बनेगी। खिड़की-दरवाज़ों के लिए सागौन की लकड़ी रही है, सुना है रंगीन संगमरमर के टाइल भी रहे हैं। जितने मुँह उतनी बातें।

    अगले दिन सुबह ही प्रधान का आदमी धमका था जोहड़ के किनारे। सुरजा को मन मार के उसके साथ जाना पड़ा।

    सुरजा को देखते ही बलराम सिंह चीखा, “अंटी में चार पैसे गए तो अपनी औक़ात भूल गया। बल्हारों को यहाँ इसलिए नहीं बसाया था कि हमारी छाती पर हवेली खड़ी करेंगे... वह ज़मीन जिस पर तुम रहते हो, हमारे बाप-दादों की है। जिस हाल में हो... रहते रहो... किसी को एतिराज़ नहीं होगा। सिर उठा के खड़ा होने की कोशिश करोगे तो गाँव से बाहर कर देंगे।”

    बलराम सिंह का एक-एक शब्द बुझे तीर की तरह सुरजा के जिस्म को छलनी छलनी कर गया था। सुरजा की आँखों के सामने ज़िंदगी के खट्टे-मीठे दिन नाचने लगे। जैसे कल ही की बात हो। क्या नहीं किया सुरजा ने इस गाँव के लिए, और बलराम चुनाव के दिनों में एक-एक वोट के लिए कैसे मिन्नतें करता था, तब सुरजा बल्हार नहीं, सुरजा ताऊ हो जाता था। सुरजा ने एक सर्द साँस छोड़ी। बिना कोई जवाब दिए वापस चल दिया। बलराम सिंह ने आवाज़ देकर रोकना चाहा। लेकिन वह रुका नहीं। बलराम सिंह की चींख़ अब गालियों में बदल गई, जो बाहर तक सुनाई पड़ रही थी।

    घर पहुँचते ही सुरजा ने कल्लन से कहा, “तू सच कहवे था कल्लू... यो गाँव रहणे लायक़ ना है।” उसकी लंबी मूँछे ग़ुस्से में फड़फड़ा रही थीं। आँखों के कोर भीगे हुए थे।

    “बापू, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा... ये ईंटें तो कोई भी ख़रीद लेगा, ये मकान बनने नहीं देंगे,” कल्लन ने सुरजा को समझाने की कोशिश की। लेकिन सुरजा ने भी ज़िद पकड़ ली थी, वह झुकेगा नहीं। जो होगा देखा जाएगा। उसने मन ही मन दोहराया।

    “ना, बेट्टे, मकान तो ईब बणके रहवेगा... जान दे दूँगा, पर यो गाँव छोड़के ना जाऊँगा,” सुरजा ने गहरे आत्मविश्वास से कहा।

    कल्लन अजीब-सी दुविधा में फँस गया था। भावावेश में आकर वह ईंटें तो ले आया था, पर गाँव के हालात देखकर उसे डर लग रहा था। कहीं कोई बावेला उठ खड़ा हो। पत्नी सरोज और बेटी सलोनी साथ गए थे। लेकिन सलोनी को यहाँ आते ही बुख़ार हो गया था। सरोज के पास जो दो-चार गोलियाँ थीं, वे दे दी थीं सलोनी को। लेकिन बुख़ार कम नहीं हुआ था। सरोज का मन घबरा रहा था। वह लगातार कल्लन से जाने की जिद कर रही थी, “बेकार यहाँ मकान पर पैसा लगा रहे हो। संतों हमारे संग रहेगी। बापू को समझाओ।” लेकिन कल्लन सुरजा को समझाने में असमर्थ था। उसने सरोज से कहा, “अब, आख़िरी बखत में बापू का जी दुखाना क्या ठीक होगा?” सरोज चुप हो गई थी।

    सुरजा ने रात-भर जागकर ईंटों की रखवाली की थी। एक पल के लिए भी आँखें नहीं झपकी थीं सुबह होते ही वह साबिर मिस्तरी को बुलाने चल दिया था। सुरजा को डर था, कहीं कोई उसे उलटी-सीधी पट्टी पढ़ा दे, उसे अब किसी पर भी विश्वास नहीं था।

    सलोनी का बुख़ार कम नहीं हो रहा था। सरोज ने कल्लन से किसी डॉक्टर को बुलाने के लिए कहा। गाँव-भर में सिर्फ़ एक डॉक्टर था। कल्लन उसे ही बुलाने के लिए चल दिया।

    कल्लन को देखते ही डॉक्टर ने मना कर दिया। सामान्य पूछताछ करके कुछ गोलियाँ पुड़िया में बाँधकर दे दी। कल्लन ने बहुत मिन्नतें कीं, “डॉक्टर साहब, एक बार चल के तो देख लो?” डॉक्टर टस से मस नहीं हुआ। कल्लन ने कहा, “मरीज़ को यहीं आपके क्लीनिक में लेकर जाता हूँ।”

    “नहीं... यहाँ मत लाना... कल से मेरी दुकान ही बंद हो जाएगी। यह मत भूलो तुम बल्हार हो,” डॉक्टर ने साफ़-साफ़ चेतावनी दी, “ये दवा उसे खिला दो, ठीक हो जाएगी।”

    कल्लन निराश लौट आया था। डॉक्टर ने जो गोलियाँ दी थीं, वे भी असरहीन थीं। बुख़ार से बदन तप रहा था। तेज़ बुख़ार के कारण वह लगातार बड़बड़ा रही थी। संतों उसकी सेवा-टहल में लगी थी। एक मिनट के लिए भी वहाँ से नहीं हटी थी। सरोज की चिंता बढ़ रही थी। उसके मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठ रही थीं।

    सुरजा सुबह का गया दोपहर बाद लौटा था। थका-हारा, हताशा उसे इस हाल में देखकर कल्लन ने पूछा “क्या हुआ बापू?” सुरजा ने निढाल स्वर में कहा, 'होणा क्या था? मिस्तरी कहीं दूर रिश्तेदारी में गया है। दस-पंद्रह दिन बाद आवेगा... बेट्टे! मुझे ना लगे इब वो आवेगा।” सुरजा ने अपने मन की हताशा ज़ाहिर की।

    “क्यों, बापू, हम तो उसकी मेहनत का पैसा उसे पेशगी दे रहे थे, फिर भी वह मुकर गया,” कल्लन ने तअज्जुब ज़ाहिर किया।

    “गाँव के ही किसी ने उसे रोका होगा... साबिर ऐसा आदमी ना है... वह भी इनसे डर गिया दिक्खे,” सुरजा ने गहरे अवसाद में डूबकर कहा। दोनों गहरी चिंता में डूब गए थे।

    “सलोनी का जी कैसा है?” सुरजा ने पूछा।

    “उसकी तबीयत ज़्यादा ही बिगड़ गई है। अस्तपाल ले जाना पड़ेगा,” कल्लन ने चिंता व्यक्त की।

    'किसी झाड़-फूँक वाले कू बुलाऊँ...” कहीं कुछ ओपरा ना हो?” सुरजा ने मन की शंका जताई।

    “नहीं, बापू... मैं कल सुबह ही उसे लेकर शहर जाऊँगा। बस, आज की रात ठीक-ठाक कट जाए,” कल्लन के स्वर में गहरी पीड़ा भरी हुई थी। सुरजा ने उसे ढाढ़स बँधाया।

    पूरी रात जागते हुए कटी थी। सलोनी की तबीयत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई थी। सुबह होते ही कल्लन ने सलोनी को पीठ पर लादा। उसके इर्द-गिर्द ठीक से कपड़ा लपेटा। सरोज साथ थी। वे धूप चढ़ने से पहले शहर पहुँच जाना चाहते थे।

    शहर गाँव से लगभग आठ-दस किलोमीटर दूर था। आने-जाने का कोई साधन नहीं था। कल्लन ने गाँव के संपन्न चमारों से बैलगाड़ी माँगी थी, लेकिन बल्हारों को वे गाड़ी देने को तैयार नहीं थे।

    पीठ पर लादकर सलोनी को ले चलना कठिन हो रहा था। वह बार-बार पीठ से नीचे की ओर लुढ़क रही थी। कल्लन की पत्नी सहारा देते हुए उसके पीछे-पीछे चल रही थी। वे जल्दी से जल्दी शहर पहुँचना चाहते थे। लेकिन रास्ता काटे नहीं कट रहा था।

    जैसे-जैसे धूप चढ़ रही थी, सलोनी का जिस्म निढाल हो रहा था। उसकी साँसे धीमी पड़ गई थीं। शहर लगभग आधा किलोमीटर दूर रह गया था। अचानक कल्लन को लगा जैसे सलोनी का भार कुछ बढ़ गया है। बुख़ार से तपता जिस्म ठंडा पड़ गया था। उसने सरोज से कहा, “देखो तो सलोनी ठीक तो है।”

    सलोनी के शरीर में कोई स्पंदन ही नहीं था। सरोज दहाड़ मारकर चीख़ पड़ी थी, “मेरी बेटी को क्या हो गया... देखो तो यह हिल क्यों नहीं रही।” उसने रोते हुए कहा।

    कल्लन ने सलोनी को पीठ से उतारकर सड़क के किनारे लिटा दिया था। वह हताश ठगा सा खड़ा था। उसके अंतस में एक हड़कंप सी मच गई थी। दस वर्ष की जीती-जागती सलोनी उसके हाथों में ही मुर्दा जिस्म में बदल गई थी। सब कुछ आँखों के सामने घटा था। वे ज़ोर-ज़ोर से चीख़कर रो रहे थे। रास्ता सुनसान था। उनकी चीख़ें सुनने वाला भी कोई दूर-दूर तक नहीं था। वे काफ़ी देर इसी तरह बैठे रोते रहे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था—क्या करें। सड़क किनारे कच्चे रास्ते पर सलोनी के शव को लिए वे तड़प रहे थे। काफ़ी देर बाद एक व्यक्ति शहर की ओर से आता दिखाई पड़ा। उन्हें उम्मीद की एक झलक दिखाई दी। शायद आने वाला उनकी कोई मदद करे।

    राहगीर क्षण-भर उनके पास रुका। लेकिन बिना कुछ कहे, आगे बढ़ गया। शायद उसने उन्हें पहचान लिया था। उसी गाँव का था। कल्लन को लगा इंसान की 'ज़ात' ही सब कुछ है।

    आख़िर वे उठे और बेटी का शव कंधों पर रखकर गाँव की ओर लौट चले। कंधों पर जितना बोझ था, उससे कहीं ज़्यादा बोझ उनके भीतर समाया हुआ था। सलोनी के बचपन की किलकारियाँ रह-रहकर उनकी स्मृतियों में कुलाँचे भर रही थीं। भारी मन से वे सलोनी का शव उठाए गाँव की ओर बढ़ रहे थे। रास्ता जैसे ख़त्म ही नहीं हो रहा था। जितना समय शहर के पास पहुँचने में लगा था, उससे ज़्यादा गाँव पहुँचने में लग रहा था। सरोज का हाल बहुत ही चिंताजनक था। वह सिर्फ़ घिसट रही थी। टूट तो कल्लन भी गया था लेकिन किसी तरह स्वयं को सँभाले हुए था। सरोज अधमरी-सी हो गई थी। उससे चला नहीं जा रहा था।

    सुरजा ने उन्हें दूर से ही देख लिया था। पहचाना तो उन्हें पास आने पर ही। लेकिन दूर से आती आकृतियों को देखकर उसने अंदाज़ा लगा लिया था। वे जिस तरह सलोनी को ला रहे थे, देखकर उसका माथा ठनका। वह घर से निकलकर सड़क तक गया था। सलोनी का शव देखकर वह स्वयं को नहीं सँभाल पा रहा था। वह तड़प उठा था। ज़मीन पर दोहत्थड़ मार-मारकर वह रोने लगा था। कल्लन की आँखों से भी बेतहाशा आँसू बह रहे थे। उनका रोना-धोना सुनकर संतों भी गई थी। उन्हें ढाढ़स बँधाने वाला कोई नहीं था।

    शहर से लौटने में उन्हें वैसे ही समय ज़्यादा हो गया था। किसी को बुलाने के लिए भी समय नहीं था। रात-भर इंतिज़ार करने की स्थिति में नहीं थे। कल्लन चाहता था कि शाम होने से पहले ही दाह-संस्कार हो जाए। सलोनी के शव को देखकर सरोज बार-बार बेहोश हो रही थी।

    समस्या थी लकड़ियों की। दाह-संस्कार के लिए लकड़ियाँ उनके पास नहीं थीं। सुरजा और संतों लकड़ियों का इंतिज़ाम करने के लिए निकल पड़े थे। उन्होंने चमारों के दरवाज़ों पर जाकर गुहार लगाई थी। लेकिन कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था। घंटा-भर भटकने के बाद भी वे इतनी लकड़ी नहीं जुटा पाए थे कि ठीक से दाह-संस्कार हो सके। घर में उपले थे। संतों ने कहा, “लकड़ियों की जगह उपले ही ले जाओ।”

    चमारों का शमशान गाँव के निकट था। लेकिन उसमें बल्हारों को अपने मुर्दे फूँकने की इजाज़त नहीं थी। कल्लन की माँ के समय भी ऐसी ही समस्या आई थी। चमारों ने साफ़ मना कर दिया था। गाँव से बाहर तीन-चार किलोमीटर दूर ले जाकर फूँकना पड़ा था। इतनी दूर सलोनी के शव को ले जाना... लकड़ी, उपले भी ले जाने थे। सुरजा और कल्लन के अलावा कोई नहीं था, जो इस कार्य में हाथ बँटा सकता था।

    बल्हारों के मुर्दे को हाथ लगाने या शवयात्रा में शामिल होने गाँव का कोई भी व्यक्ति नहीं आया था। 'ज़ात' उनका रास्ता रोक रही थी। कल्लन ने काफ़ी कोशिश की थी। वह रविदास मंडल, डॉक्टर अम्बेडकर युवक सभा के लोगों से जाकर मिला था। लेकिन कोई भी साथ आने को तैयार नहीं था। किसी किसी बहाने वे सब कन्नी काट गए थे।

    रेलवे कॉलोनी में ‘अंबेडकर जयंती’ के भाषण उसे याद आने लगे थे। उसने उन तमाम विचारों को झटक दिया था। गहरी वितृष्णा उसके भीतर उठ रही थी। उसे लगा, वे तमाम भाषण खोखले और बेहद बनावटी थे।

    कल्लन ने सुरजा से कहा, “बापू! और देर मत करो...” उन दोनों ने कपड़े में लिपटे सलोनी के शव को उठा लिया था। स्त्रियों के शमशान जाने का रिवाज बल्हारों में नहीं था। लेकिन संतों और सरोज के लिए इस रिवाज को तोड़ देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। संतों ने लकड़ियों का गट्ठर सिर पर रखकर हाथ में आग और हाँडी उठा लिए थे। पीछे-पीछे सरोज उपलों भरा टोकरा लिए चल पड़ी थी।

    इस शवयात्रा को देखने के लिए चमारिनें अपनी छतों पर चढ़ गई थीं। उनकी आँखों के कोर भीगे हुए थे। लेकिन बेबस थीं, अपने-अपने दायरे में क़ैद। बल्हार तो आख़िर बल्हार ही थे। अपने ही नहीं, उन्हें तो दूसरों के मुर्दे भी ढोने की आदत थी...

    चमारों का गाँव और उसमें एक बल्हार परिवार।