कोसी का घटवार

kosi ka ghatwar

शेखर जोशी

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कोसी का घटवार

शेखर जोशी

और अधिकशेखर जोशी

    गुसाईं का मन चिलम में भी नहीं लगा। मिहल की छाँह से उठकर वह फिर एक बार घट (पनचक्की) के अंदर आया। अभी खप्पर में एक-चौथाई से भी अधिक गेहूँ शेष था। खप्पर में हाथ डालकर उसने व्यर्थ ही उलटा-पलटा और चक्की के पाटों के वृत्त में फैले हुए आटे को झाड़कर एक ढेर बना दिया। बाहर आते-आते उसने फिर एक बार और खप्पर में झाँककर देखा, जैसे यह जानने के लिए कि इतनी देर में कितनी पिसाई हो चुकी है, परंतु अंदर की मिकदार में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। खस्स-खस्स की ध्वनि के साथ अत्यंत धीमी गति से ऊपर का पाट चल रहा था। घट का प्रवेश-द्वार बहुत कम ऊँचा था, ख़ूब नीचे तक झुककर वह बाहर निकला। सिर के बालों और बाँहों पर आटे की एक हल्की सफ़ेद पर्त बैठ गई थी।

    खंभे का सहारा लेकर वह बुदबुदाया, “जा स्साला! सुबह से अब तक दस पंसेरी भी नहीं हुआ। सूरज कहाँ का कहाँ चला गया है! कैसी अनहोनी बात!”

    बात अनहोनी तो है ही। जेठ बीत रहा है। आकाश में कहीं बादलों को नामोनिशान भी नहीं। अन्य वर्षों में अब तक लोगों की धानरोपाई पूरी हो जाती थी, पर इस साल नदी-नाले सब सूखे पड़े हैं। खेतों की सिंचाई तो दरकिनार, बीज की क्यारियाँ सूखी जा रही हैं। छोटे नाले-गुलों के किनारे के घट महीनों से बंद हैं। कोसी के किनारे है गुसाईं का यह घट। पर इसकी भी चाल ऐसी कि लद्दू घोड़े की चाल को मात देती है।

    चक्की के निचले खंड में ‘छच्छिर-छच्छिर’ की आवाज़ के साथ पानी को काटती हुई मथानी चल रही थी। कितनी धीमी आवाज़! अच्छे खाते-पीते ग्वालों के घर में दही की मथानी इससे ज़्यादा शोर करती है। इसी मथानी का वह शोर होता था कि आदमी को अपनी बात नहीं सुनाई देती और अब तो भले नदी पार कोई बोले, तो बात यहाँ सुनाई दे जाए!

    छप...छप...छप...पुरानी फ़ौजी पैंट को घुटनों तक मोड़कर गुसाईं पानी की गूल के अंदर चलने लगा। कहीं कोई सुराख़-निकास हो, तो बंद कर दें। एक बूँद पानी भी बाहर जाए। बूँद-बूँद की क़ीमत है इन दिनों। प्रायः आधा फर्लांग चलकर वह बाँध पर पहुँचा। नदी की पूरी चौड़ाई को घेरकर पानी का बहाव घट की गूल की ओर मोड़ दिया गया था। किनारे की मिट्टी-घास लेकर उसने बाँध में एक-दो स्थान पर निकास बंद किया और फिर गुल के किनारे-किनारे चलकर घट के पास गया।

    अंदर जाकर उसने फिर पाटों के वृत्त में फैले हुए आटे को बुहारकर ढेरी में मिला दिया। खप्पर में अभी थोड़ा-बहुत गेहूँ शेष था। वह उठकर बाहर आया।

    दूर रास्ते पर एक आदमी सिरे पर पिसान रखे उसकी ओर रहा था। गुसाईं ने उसकी सुविधा का ख्य़ाल कर वहीं से आवाज़ दे दी, “हैं हो! यहाँ लम्बर देर में आएगा। दो दिन का पिसान अभी जमा है। ऊपर उमेदसिंह के घट में देख लो।”

    उस व्यक्ति ने मुड़ने से पहले एक बार और प्रयत्न किया। ऊँचे स्वर में पुकार कर बोला, “ज़रूरी है जी, पहले हमारा लम्बर नहीं लगा दोगे?”

    गुसाईं होठों ही होठों में मुस्कराया, “स्साला कैसा चीख़ता है, जैसे घट की आवाज़ इतनी हो कि मैं सुन सकूँ!” कुछ कम ऊँची आवाज़ में उसने हाथ हिलाकर उत्तर दे दिया, “यहाँ ज़रूरी का भी बाप रखा है, जी। तुम ऊपर चले जाओ।” वह आदमी लौट गया।

    मिहल की छाँव में बैठकर गुसाईं ने लकड़ी के जलते कुन्दे को खोदकर चिलम सुलगाई और गुड़-गुड़ करता धुआँ उड़ाता रहा।

    खस्सर-खस्सर चक्की का पाट चल रहा था।

    किट-किट-किट-किट खप्पर से दाने गिराने वाली चिड़िया पाट पर टकरा रही थी।

    छिच्छिर—छिच्छिर की आवाज़ के साथ मथानी पानी को काट रही थी। पत्थरों के बीच में टखने-टखने तक फैला पानी क्या आवाज़ करेगा। पानी के गर्भ से निकलकर छोटे-छोटे पत्थर भी अपना सिर उठाए आकाश को निहार रहे थे। दोपहरी ढलने पर भी इतनी तेज़ धूप! कहीं चिरैया भी नहीं बोलती। किसी प्राणी का प्रिय-अप्रिय स्वर नहीं।

    सूखी नदी के किनारे बैठा गुसाईं सोचने लगा, क्यो उस व्यक्ति को लौटा दिया। लौट तो वह जाता ही घट के अंदर टच्च पड़े पिसान के थैलों को देखकर। दो-चार क्षण की बातचीत का आसरा ही होता।

    कभी-कभी गुसाईं को यह अकेलापन काटने लगता है। सूखी नदी के किनारे का यह अकेलापन नहीं, ज़िंदगी भर साथ देने के लिए जो अकेलापन उसके द्वार पर धरना देकर बैठ गया है, वही। जिसे अपना कह सके, ऐसे किसी प्राणी का स्वर उसके लिए नहीं, पालतू कुत्ते-बिल्ली का स्वर भी नहीं। क्या ठिकाना ऐसे मालिक का, जिसका घर-द्वार नहीं...बीवी—बच्चे नहीं, खाने—पीने का ठिकाना नहीं।

    घुटनों तक उठी हुई पुरानी फ़ौजी पैट के मोड़ को गुसाईं ने खोला। गूल में चलते हुए वह हिस्सा थोड़ा भीग गया था। पर इस गर्मी में उसे भीगी पैंट की यह शीतलता अच्छी लगी। पैंट की सलवटों को ठीक करते-करते गुसाईं ने हुक्के की नली से मुँह हटाया। उसके होठों में बाएँ कोने पर हल्की-सी मुस्कान उभर आई। बीती बातों की याद...गुसाईं सोचने लगा, इसी पैंट की बदौलत यह अकेलापन उसे मिला है।...नहीं, याद करने को मन नहीं करता। पुरानी...बहुत पुरानी बातें वह भूल गया है, पर हवलदार साहब की पैट की बात उसे नहीं भूलती।

    ऐसी ही फ़ौजी पैट पहनकर हवलदार धरमसिंह आया था...लॉण्ड्री की धुली, नोंकदार, क्रीजवाली पैंट। वैसी ही पैंट पहनने की महत्त्वाकांक्षा लेकर गुसाईं फ़ौज में गया था। पर फ़ौज से लौटा, तो पैंट के साथ-साथ ज़िंदगी का अकेलापन भी उसके साथ गया

    पैंट के साथ और भी कितनी ही स्मृतियाँ मुखर है। उस बार की छुट्टियों की बात...

    कौन महीना? हाँ, बैसाख ही था। सिर पर क्रास खुखरी के क्रेस्ट वाली, काली किश्तीनुमा टोपी को तिरछा रखकर—फ़ौजी वर्दी पहने वह पहली बार एनुअल-लीव पर घर आया, तो चीड़-वन की आग की तरह ख़बर इधर-उधर फैल गई थी। बच्चे-बूढ़े, सभी उमसे मिलने आए थे। चाचा का गोठ एक़दम भर गया था, ठसाठस्स। बिस्तर की नई, एक़दम साफ़, जगमग, लाल-नीली धारियों वाली दरी आँगन में बिछानी पड़ी थी लोगों को बिठाने के लिए। ख़ूब याद है, आँगन का गोबर दरी में लग गया था। बच्चे-बूढे सभी आए थे। सिर्फ़ चना—गुड़ या हलद्वानी के तम्बाकू का लोभ नहीं था, कल के शर्मीले गुसाईं को इस नए रूप में देखने का कौतूहल भी था। पर गुसाईं की आँखें इस भीड़ में जिसे खोज रही थी, वह वहाँ नहीं थी।

    नाले-पार के अपने गाँव से भैंस के कट्या को खोजने के बहाने दूसरे दिन लछमा आई थी। पर गुसाईं उस दिन उससे मिल सका। गाँव के छोकरे ही गुसाईं की जान को बवाल हो गए थे। बुड्ढे नरसिंह प्रधान उन दिनों ठीक ही कहते थे, आजकल गुसाईं को देखकर सोबनियाँ का लड़का भी अपनी फटी घेर की टोपी को तिरछी पहनने लग गया है।...दिन-रात बिल्ली के बच्चों की तरह छोकरे उसके पीछे लगे रहते थे, सिगरेट-बीड़ी या गपशप के लोभ में।

    एक दिन बड़ी मुश्किल से मौक़ा मिला था उसे। लछमा को पात-पतेल के लिए जंगल जाते देखकर वह छोकरों से काँकड़ के शिकार का बहाना बनाकर अकेले जंगल को चल दिया था। गाँव की सीमा से बहुत दूर, काफल के पेड़ के नीचे गुसाईं के घुटने पर सिर रखकर, लेटी-लेटी लछमा काफल खा रही थी। पके, गदराए, गहरे लाल-लाल काफल! खेल-खेल में काफलों की छीना-झपटी करते गुसाईं ने लछमा की मुट्ठी भींच दी थी। टप-टप काफलों का गाढ़ा लाल रस उसकी पैंट पर गिर गया था। लछमा ने कहा था, “इसे यहीं रख जाना, मेरी पूरी बाँह की कुर्ती इसमें से निकल आएगी।” वह खिलखिलाकर अपनी बात पर स्वयं ही हँस दी थी।

    पुरानी बात। क्या कहा था गुसाईं ने, याद नहीं पड़ता...तेरे लिए मखमल की कुर्ती ला दूँगा, मेरी सुवा!...या कुछ ऐसा ही।

    पर लछमा को मखमल की कुर्ती किसने पहनाई—पहाड़ी पार के रमुवाँ ने, जो तुरीनिसाण लेकर उसे ब्याहने आया था?

    “जिसके आगे-पीछे भाई-बहन नहीं, माई-बाप नहीं, परदेश में बंदूक की नोंक पर जान रखने वाले को छोकरी कैसे दे दें हम?” लछमा के बाप ने कहा था।

    उसका मन जानने के लिए गुसाईं ने टेढ़े-तिरछे बात चलवाई थी।

    उसी साल मंगसिर को एक ठंडी, उदास शाम को गुसाईं की यूनिट के सिपाही किसनसिंह ने क्वार्टर-मास्टर स्टोर के सामने खड़े-खड़े उससे कहा था, “हमारे गाँव के रामसिंह ने ज़िद की, तभी छुट्टियाँ बढ़ानी पड़ी। इस साल उसकी शादी थी। ख़ूब अच्छी औरत मिली है, यार! शक्ल-सूरत भी ख़ूब है, एक़दम पटाखा! बड़ी हँसमुख है। तुमने तो देखा ही होगा, तुम्हारे गाँव के नज़दीक की है। लछमा—लछमा कुछ ऐसा ही नाम है।”

    गुसाईं को याद नहीं पड़ता, कौन—सा बहाना बनाकर वह किसनसिंह के पास से चला आया था।...रम-डे था उस दिन। हमेशा आधा पैग लेने वाला गुसाईं उस दिन दो पैग रम लेकर अपनी चारपाई पर पड़ गया था।...हवलदार मेजर ने दूसरे दिन पेशी करवाई थी—मलेरिया प्रिकॉशन करने के अपराध में!...सोचते-सोचते गुसाईं बुदबुदाया, “स्साला एडजुटेंट!”

    गुसाईं सोचने लगा, उस साल छुट्टियों में घर से विदा होने से एक दिन पहले वह मौक़ा निकालकर लछमा से मिला था।

    “गंगानाथज्यू की क़सम, जैसा तुम कहोगे, मैं वैसा ही करूँगी।” आँखों मे आँसू भरकर लछमा ने कहा था।

    वर्षों से वह सोचता है, कभी लछमा से भेंट होगी तो वह अवश्य कहेगा कि वह गंगनाथ का जागर लगाकर प्रायश्चित्त ज़रूर कर ले। देवी-देवताओं की झूठी कसमें खाकर उन्हें नाराज़ करने से क्या लाभ? जिस पर भी गंगनाथ का कोप हुआ, वह कभी फल-फूल नहीं पाया। पर लछमा से कब भेंट होगी, यह वह नहीं जानता। लड़कपन से संगी-साथी नौकरी-चाकरी के लिए मैंदानों में चले गए हैं। गाँव की ओर जाने का उसका मन नहीं होता। लछमा के बारे में किसी से पूछना उसे अच्छा नहीं लगता। जितने दिन नौकरी रही, वह पलटकर अपने गाँव नहीं आया। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन का वालंटियरी ट्रांसफ़र लेने वालों की लिस्ट में नायक गुसाईं का नाम ऊपर आता रहा-लगातार पंद्रह साल तक।

    पिछले बैसाख में ही वह गाँव लौटा, पंद्रह साल बाद, रिज़र्व में आने पर। काले बालों को लेकर गया था, खिचड़ी बाल लेकर लौटा। लछमा का हठ उसे अकेला बना गया।

    आज इस अकेलेपन में कोई होता, जिसे गुसाईं अपनी ज़िंदगी की किताब पढ़कर सुनाता। शब्द-अक्षर...कितना देखा, कितना सुना और कितना अनुभव किया है उसने...।

    पर नदी के किनारे की यह तपती रेत, पनचक्की की खटर-खेटर और मिहल की छाया में ठंडी चिलम को निष्प्रयोजन गुड़गुड़ाना गुसाईं! और चारों ओर अन्य कोई