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जल-प्रांतर

jal prantar

अरुण प्रकाश

अरुण प्रकाश

जल-प्रांतर

अरुण प्रकाश

और अधिकअरुण प्रकाश

    दूर से मंदिर दिखाई देता था। चारों तरफ़ फैले अछोर पानी के बीच घिरा शिव मंदिर। पानी इतना गहरा था कि हवा के थपेड़े से लहरें भी कम ही उठ पाती थीं। हवा पूरी तेज़ी से फेंकी गई गेंद की तरह आती और पानी की सतह सहलाती आगे बढ़ जाती। पानी का किनारा धुँधला दीखता था। पता नहीं, हवा कहाँ जाकर रुकती थी। पर जब रुकती थी, बादलों से भरा आकाश थोड़े खुले नल की तरह गंगा की पसरी देह पर टपकने लगता था। बूँदें गिरतीं तो ग़ुस्सैल पानी पर जैसे फफोले उगते और मिटते चले जाते।

    पानी के बीच घिरा मंदिर अनाथ बच्चे-सा निर्जन में खड़ा था। डरा और निरुपाय। गंगा ने इस बार बाढ़ के सारे पूर्वानुमान तोड़ दिए थे। भागने पर भी ठौर मुश्किल। पृथ्वी धँस गई थी और माटी पानी में लगातार कटाव की वजह से घुलती चली जा रही थी। पड़ोस का पहाड़ीथान घाट जल में समा चुका था। श्रद्धालुओं को घाट तक आने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि गंगा का जल उन्हें उनके ही घर से खदेड़ रहा था। लोग धामिन साँप की तरह फुँफकारते पानी के आगे-आगे भागते चले गए थे और पुरानी रेलवे लाइन की पुख़्ता टीलेनुमा सड़क पर जमा हो गए थे। सिमरिया घाट तक जाती रेलवे लाइन कभी होती थी। पुल बनने के बाद रेल वाले पटरियाँ उखाड़ ले गए थे पर रेलवे लाइन का नाम छोड़ गए थे।

    बहुत मरे। जानवर, शिशु, चूहे, बिल्लियाँ। कुत्ते आदमी को सूँघते साथ-साथ भागे थे। अचानक पानी ही सब कुछ हो गया था—सरकार, ताक़त, दया, क्रोध...भागते लोग सिर्फ़ पत्ते की तरह बज सकते थे। राहत के लिए थकी पलकों को ऊपर उठाकर देख सकते थे कि कोई हेलिकॉप्टर आए, बासी रोटी और प्याज़ का पैकेट गिरा दे। गहरे जल में गिरे पड़े अपनी टहनियों से घायल तने को सहलाने की कोशिश करते। गिद्ध उड़ते रहते और कहीं मवेशी की तैरती लाश पर उतर आते। मज़े में लाश को चुगते गिद्ध लाश के साथ ही बहते जाते। पंडित वासुदेव मंदिर के द्वार पर बैठे देखते रहते और घृणा से सिहरते रहते। किससे, क्या कहते उस निर्जन में? पानी ने सबको बेदख़ल कर दिया था। गुस्सैल गुलगेंट मंदिर के गिर्द बनतीं और मंदिर की नींव, सीढ़ियाँ और दीवारों से अपने आपको रगड़ती रहतीं। मंदिर के अहाते में बनी दोनों ख़ाली कोठरियाँ गुलगेंटों के धक्के से बैठ गई थीं। पंडित वासुदेव ने देखा था—कोठरियों की छत तिरछी हो गई है। सन्न रह गए थे वे। मन उचट गया। वे जल्दी-जल्दी सुमरनी माला को खींचने लगे—या प्रभु! हे गंगा माई! हर साल बाढ़ आती है। इस पहाड़ीथान घाट में। माई, तू तो पहाड़ीथान घाट की सीढ़ियों से ही लौट जाती है। पूरा इलाक़ा जानता है, जिस दिन पहाड़ीथान डूबेगा, उस दिन प्रलय हो जाएगा। कोई नहीं बचेगा। शांत रह माई, अगर वह शिवाला बाढ़ में डूबा-धँसा तो शिव-भक्त पहाड़ी बाबा का कोप नहीं सह पाएगी तू! जय हो पहाड़ी बाबा जय पहाड़ी बाबा।

    जब कोठरी की छत बैठी तो पहाड़ीथान में घुटने-भर पानी था। पंडित वासुदेव ने बड़े जतन से सूखे उपलों को कोठरी की छत पर डालकर प्लास्टिक के बोरे में ढक रखा था। तेज़ धूप में यह करते उपले की तरह ऐंठ गए थे वे। सारी मिहनत अकारथ गई जब छत गंगा में समा गई। पानी में बहते उपलों को वे देखते रह गए। कैसे हवन दे पाएँगे बिना अग्नि के फूलों के पौधे भी तो पानी में डूब गए थे। पूजा में सिर्फ़ अगरबत्ती जला देंगे। धीरे-धीरे शिवालय पर पानी का पहरा कस गया था। बस सीढ़ियों के पास थोड़ी-सी ज़मीन बची थी। पूजा-पाठ के बाद भगवान को सत्तू का भोग लगा देते। फिर बड़े कटोरे में महाप्रसाद (सत्तू) और रामरस (नमक) को गंगाजल में मिलाकर सानते और लंका (लाल मिर्च) के साथ खा जाते। घड़े में थिर रहे बाढ़ के गँदले पानी को छानकर पी लेते।

    सब कुछ से निपट मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे अदृश्य होते किनारे को सुमरनी फेरते ढूँढ़ते रहते। कभी कोई सूँस पानी के अंदर से औंधे मुँह उछलती तो पंडित वासुदेव बच्चे की तरह ख़ुश हो जाते। वे ख़ुद नदी किनारे बसे गाँव से थे। जब नदी उफना करती तो उस नन्ही शांत बाया (विशाला) नदी में सूँस जाते। कभी मछलियों को पकड़ने या यूँ ही मौज में आकर सूँस पानी से ऊपर उछलती तो नन्हे पंडित वासुदेव खिलखिलाने लगते थे। उफनती, पसरी गंगा में नावें भी नहीं थीं जिन्हें निहारा जाए। काले-मटमैले और बदसूरत सूँस में ही पंडित वासुदेव का कुतूहल टिका रहता।

    कोठरी की छत बैठने के बाद ही चीज़ें बदलने लगीं। उस दिन पंडित वासुदेव ने स्नान किया और अँगोछा लपेकर गीली धोती को निचोड़ने लगे। बादलों से भरे आकाश से चुटकी-भर धूप छिटककर गिरी तो पंडित वासुदेव ने सोचा, निचुड़ी धोती को मंदिर की गोल दीवारों पर लपेट दिया जाए तो इतनी कम धूप में भी धोती सूख जाएगी! मंदिर के दरवाज़े की साँकल से धोती का एक किनारा बाँधकर, धोती सँभालते मंदिर की परिक्रमा करते चल पड़े। पानी में गिरने से बचते-बचते मंदिर के पिछवाड़े पहुँचे तो सन्न रह गए।

    मंदिर की दीवार में खुदे हाथ-भर ऊँचे कई छोटे-छोटे मंदिर थे। ऐसे ही एक मंदिर से एक साँप फन ताने फुफकार रहा था। पानी में गिरते-गिरते बचे पंडित वासुदेव। चील-सी सतर्कता से पीछे मुड़े और धोती की परवाह किए बग़ैर मंदिर के दरवाज़े पर आकर मंदिर की सीढ़ी पर धम्म से बैठ गए। हे शिव! रक्षा करो! अपनी साँसों को सहेजते बैठे रहे। पानी की लहरों संग बहती धोती सामने गई। पंडित वासुदेव ने देखा, गँदले पानी से मटमैली गीली धोती को, फिर दरवाज़े की साँकल को जहाँ धोती का एक सिरा बँधा था।

    मंदिर की सीढ़ी पर बैठे पंडित वासुदेव के मन की गाँठ खुल गई थी। क्रोध से झनझनाती पंडिताइन की आवाज़ स्कूल के घंटे की तरह सुनाई पड़ने लगी। बच्चे की तरह चौकन्ने पंडित वासुदेव देख रहे थे चंडी बनी पंडिताइन को...

    कोई काम नइ देत? रातियो रेडियो में कहलकइ जे गंगा के पानी ख़तरा के निसान से आर उपर बैढ़ जैतइ। पहाड़ी घाट से सब लोग भागल। अहाँ माला फेरत बैठल रहू। चालीस वर्षीय थुलथुल पंडिताइन क्रोध से तर बाणों से पंडित वासुदेव को बींधे जा रही थी। घृणा से गोरी-चिट्टी पंडिताइन के चेहरे की नसें उभर आई थीं।

    भगवान सबकी रच्छा करते हैं, हमरी नहीं करेंगे?

    भगवान रच्छा करते तो परलय होता? पंडित की बात को गेंद की तरह लपककर फिर से उछाल दिया पंडिताइन ने। सब कुछ बह गया, गाँव का गाँव मसान बन गया। कौन भगत आएगा जो चढ़ौआ के लिए पड़ल रहेंगे?

    शिव-शिव कहो टमकावाली, सब दिन भगवान ने ही परसाद भेजा। मैं ग़रीब ब्राह्मण, कहाँ से पेट चलाता रह? भगतों के चढ़ौआ से ही न? आज बाढ़ की विपति आई तो भगवान को छोड़कर भाग जाऊँ? पहाड़ी बाबा का शाप कौन झेलेगा?

    पानी तवे पर चढ़ी रोटी की तरह था। पतली रोटी की तरह छिछला पानी। जैसे-जैसे बाढ़ का ताप बढ़ता, रोटी पकती और फूलती जा रही थी। आसपास के गाँवों के लोग गंगा नदी के फूले पेट का अंदाज़ा पहाड़ी घाट की सीढ़ियों पर चढ़ते पानी से लगा रहे थे। अलस्सुबह श्रद्धालु पहाड़ी घाट स्नान करने पहुँचते, पहाड़ीथान में पूजा कर अपने घर लौटते तो पूरे इलाक़े में पानी पर फैले किरोसिन तेल की तरह ख़बर फैल जाती कि पहाड़ी घाट की इतनी सीढ़ियाँ पानी में डूबने से बची हैं। सतर्कता से लोग और कस जाते। भाल-मवेशी का सूखा चारा मचान बनाकर ज़मीन से ऊपर रख दिया जाता। जलावन और अनाज की बोरियों को काठ की चौकियों (तख़्तों) के ऊपर रख दिया जाता। गरज ये कि जीवन बचाने वाली सभी चीज़ों को ज़मीन की सतह से ऊपर रख दिया जाता। रोज़ शाम को जवार के लोग रेडियो से प्रादेशिक समाचार सुनने के लिए चिपक जाते।

    निपनिया, मधुरापुर, सिगपुर, महंथ टोल, जयनगर, रूपनगर, सिमरिया, अमरपुर, गंगापरसाद टोला में बाढ़ का आना कोई नई बात नहीं थी। ये गाँव साल-दर-साल बाढ़ की विनाशलीला भुगतते फिर भी केकड़े की तरह नदी के किनारे से चिपके रहते। अपनी ज़मीनें छोड़ लोग कहाँ जाते? अस्सी साल पहले बना गुप्ता बाँध बूढ़ा हो चुका था। जगह-जगह दरारें थीं। चूहे जैसे ठेकेदारों ने बाँध के अंदर-अंदर बिल बना रखे थे। बाँध कभी नदी के तले से पचास फीट ऊँचा होता था। लेकिन धीरे-धीरे गंगा की कोख में बालू भरता गया। नदी का तल ऊँचा उठता गया। इस तरह बाढ़ से रक्षा करने वाला गुप्ता बाँध बौना दिखाई देने लगा था। अजीब यह था कि गुप्ता बाँध पर हर साल बाढ़ नियंत्रण के नाम पर काग़ज़ी तौर पर मिट्टी डाली जाती थी। पर गंगा की कोख में भरते बालू के ढेर को साफ़ नहीं किया जाता था। गंगा का तल गहरा हो जाता तो शासन-तंत्र की हरियाली सूख जाती। गंगा में आई बाढ़ राजधानी पटना में भी पूँछ फटकारने लगी थी। फिर भी बाढ़ के कई फ़ायदे थे। बाढ़ का प्रकोप असंतोष, राजनीतिक उठा-पटक, हड़ताल सबको स्थगित कर देता था और सालों रिश्वत के पानी से शासन की जड़ों को सींचती रहती थी। राजधानी से दूर-दराज़ के इलाक़ों में बाढ़ आती तो हेलिकॉप्टर से उड़ान भरने का मज़ा भी साथ लाती। सिमरिया गाँव तो बाढ़ को दाद की तरह हर साल खुजलाता। लेकिन लगता था कि इस बार दाद से ख़ून भी निकलेगा।

    जब पहाड़ी घाट की तीन सीढ़ियाँ पानी में डूबने से बची थीं तो घाट पर बनी फूस की दुकानें हटने लगीं। राम साह की मिठाई की दुकान, सीतो मल्लाह की पान-बीड़ी की दुकान और परभुआ की चाय की दुकान तीनों उठ गए। बैलगाड़ी लदे छप्पड़ों और सामानों को जाते देख पंडिताइन दुःख से ठगी रह गई। सब दुकान वाले ही उनके पड़ोसी थे। रात-बिरात, सुख-दुःख में काम आने वाले, फ़ुर्सत में गपियाने वाले।

    रमेसर, परभुआ चाय वाले के भाई, ने पंडिताइन को टोक दिया, अब्ब घाट भी नहीं बचेगा चाची! चचा से कहिए कि कल तक मंदिर से हट जाएँ। ऊपर से पानी, नीचे से पानी। कई दिन घाट बचेगा? संतोष तो आज भी जाने को राज़ी है।

    पंडिताइन ने उसाँस भरी, संतोष की बात कौन मानेगा बेटा? पंडिजी कहेंगे तभी न!

    पंडिताइन का बेटा संतोष अपनी माँ के पास खड़ा रमेसर को जाते देखता रहा। पंडिताइन ने पूछ लिया, भोला बड़ही दोकान नहीं ले गया?

    “काहे ले जाएगा? रात में ही कोई मुर्दा गया तो उसका लकड़ी-बाँस बिकेगा न? बड़का नाव ले आया है। घाट डूबने लगेगा तो नाव में लादकर ले जाएगा। फिकिर तो हम लोगों को है। माई, बाबू से आज साफ़ कह दो कि हम लोग भी रेलवे लाइन पर चले जाएँ नई तो सोए रहेंगे राते में बाढ़ के पानी में समा जाएँगे।

    दाल, चावल, आटा, नमक-तेल का साठ किलो का बोझ माथे पर लादे पंडित वासुदव पहाड़ीथान पहुँचे तो खाए-पीए बलिष्ठ शरीर पर कपड़े पसीने से भीगकर चिपक गए थे। गोरा, नुकीला चेहरा पसीने की वजह से भाले की तरह चमक रहा था।

    संतोष माइ, सामान ले आया हूँ। अब निश्चिंत हो जाओ। कल फिर बारो बाज़ार जाकर मटिया तेल (किरोसिन तेल) भी ले आऊँगा! बस, बाढ़ में कोनो तकलीफ़ नहीं।

    चूल्हे में कोयला लहकाती पंडिताइन निःशब्द उठ खड़ी हुई और मिट्टी के घड़े से एक लोटा पानी निकालकर पंडित वासुदेव के सामने रख दिया। अँगोछे से हवा करते पंडित वासुदेव हाथ-मुँह धोते, पंडिताइन की चुप्पी को बबूल के धँसे काँटे की तरह महसूस करते रहे।

    एक लोटा पानी और! पंडित वासुदेव ने कहा।

    पंडिताइन फिर उठीं, पानी डालकर उनके सामने रख गईं। पंडित पर एक अर्थपूर्ण दृष्टि डालकर बोरे में आए सामान को सहेजने लगीं। संतोष बछिया को हाँकते आया तो पंडित वासुदेव को बोलने का मौक़ा मिल गया।

    संतोष, कल हम दोनों बारो चलेंगे और बढ़िया के लिए थोड़ा और भूसा लाकर रख देंगे।

    बछिया को खूँटे से बाँधते हुए संतोष ने गर्दन तिरछी कर बाप को देखा। चुपचाप। भीतर ही भीतर संतोष उबल रहा था-सारा सरंजाम गंगा माई लील जाएगी। सोचते रहिए कि पहाड़ीथान नहीं डूबेगा। जब डूबने लगेगा तो गाँव से चार किलोमीटर दूर कोई बचाने भी नहीं आएगा। सीतो मल्लाह क्या पागल है? ज़िंदगी-भर नाव खेता रहा। दाहिने हाथ के टूटने के बाद पान-बीड़ी की दुकान चलाता है। वो कोई झूठ थोड़े ही कहता है—इ कलिजुग है संतोष। गंगा माई के लिए पहाड़ीथान डुबाना क्या मुश्किल?

    संतोष और उसकी माँ की चुप्पी से फट पड़े पंडित वासुदेव।

    क्या हो गया है तुम लोगों को? मुँह में पान है क्या?

    बाबू, यहाँ सामान जुटाने से क्या फ़ायदा? इस बार बाढ़ में कुछ भी नहीं बचेगा। घाट के सब दुकानदार चले गए। हम लोग भी चले जाते... संतोष ने दबी जवान से कहा।

    कहाँ चले जाते? हम कोई मल्लाह हैं कि घाट डूबने लगे तो नाव आगे बढ़ा दें?

    कोई पहली बार गंगा माई का कोप हुआ है? हर साल बाढ़ आती है, सब चले जाते हैं, पंडित वासुदेव यहीं रहता है। माई को पूछ, कब मंदिर में पानी घुसा है? गंगा भाई हर साल आती है। पहाड़ीथान के चरन पखाड़कर चली जाती है। पहाड़ी बाबा का परताप है!

    पंडिताइन मकई की मोटी रोटी थापती पंडित वासुदेव का भाषण सुनती रहीं। 'इ मनुष थोड़े मानेगा? सास कहती थी—अइसन जिद्दी वसुदेवा, बाप ने संस्कृत की मध्यमा परीक्षा में फेल होने पर डाँटा कि विपा गया। घर से भागा सीधे पहाड़ी बाबा के पास। साधु बनेंगे। टोला-समाज कहते-कहते थक गया, नहीं लौटा। आख़िर पहाड़ी बाबा ने बड़का चेला बनाया और कहा—अरे, बम भोले भी तो बियाह किए थे। तब चालीस साल की उमर में शादी किया।'

    संतोष, बेटा सब बात छोड़, खाना खा ले।

    पंडिताइन ने बात सँभाल दी। कौन ठिकाना, सत्रह साल का छोरा बाप से झगड़ ही जाए। गर्म ख़ून है। एक तो संतोष ऐसे ही यजमानी के धँधे पर भुनभुनाता है। उस पर रमेसरा के साथ बैठकर पार्टी-फार्टी बोलता रहता है।

    उकताए पंडित वासुदेव संध्या पूजा करने मंदिर में घुस गए थे। रात-भर झमाझम वर्षा होती रही। तेज़ हवा का झोंका आता तो पंडिताइन की कोठरी में पानी की बौछार दरवाज़े की दरार को भेद जाती। ट्टर्र-टर्र की आवाज़ें आती रहीं—लहरें गरज रही थीं। पहाड़ी घाट से सटे किनारे को वर्षा और गंगा मिलकर काटते चले जा रहे थे। पानी किनारे की मिट्टी को अपनी धारा के चाक़ू से अंदर-अंदर काटती जाती और किनारा कटकर चट्टान की तरह गिरता—धड़ाम। वीरान रात में अकेली तेज़ धड़ाम की आवाज़ पंडिताइन के कानों पर दस्तक देती। पंडिताइन उठ बैठती। सामने खाट पर सोए संतोष पर एक नज़र डालकर आश्वस्त होती और सोने की कोशिश करने लग जाती।

    क़रीब चार बजे सुबह ओड-ओड की आवाज़ सुनकर पंडिताइन उठ बैठी।

    संतोष कलेजा थामे उल्टियाँ कर रहा था। झपटकर पंडिताइन संतोष की पीठ को अपनी हथेलियों से दबाकर बैठ गई। संतोष उल्टी दबाने की कोशिश करता, फड़फड़ाते फेफड़ों को थामने लगा।

    मंदिर में जगे पंडित वासुदेव प्रातकाली गा रहे थे। उनके गाने की आवाज़ वीराने में तेज़ लग रही थी—

    किछु ने रहल मोरा हाथ।

    हे ऊधो किछु ने रहल मोरा हाथ।

    गोकुल नगर सगर वृंदावन, सुन भेल यमुना घाट

    किछु ने रहल मोरा हाथ।

    पंडित वासुदेव को जगा जानकर घबराई पंडिताइन ज़ोर से चिल्लाई—'पाहुन!' पंडिताइन पंडित वासुदेव को पाहुन (अतिथि) कहकर ही बुलाती थी क्योंकि उसके मायके में पंडित को सभी पाहुन कहकर ही बुलाते थे। बदहवास पंडित वासुदेव जब कोठरी में घुसे तो संतोष 'पानी-पानी' चिल्ला रहा था। उसके सामने उल्टी फैली थी। पंडित वासुदेव ने पंडिताइन से कहा, अहाँ हटू! पंडिताइन के हटते ही पंडित वासुदेव ने अपने बलिष्ठ हाथों से संतोष को उठाकर चारपाई पर लिटा दिया।

    एक चम्मच पानी, पंडित ने चम्मच संतोष के मुँह में दे दिया और पूछा, कितनी उल्टी?

    पानी से गला भीगते ही संतोष कुछ सामान्य होने लगा। उसने इशारे से बताया—एक।

    चिंता मत करो। भोर है, डॉक्टर से दिखाकर दवा ले आएँगे।

    पंडिताइन हताश भाव से बोली, अहाँ के हाथ जोड़इ छी, हमरा सबके गाम पहुँचा दिअ।

    गाँव में पानी नहीं है? सब रेलवे लाइन पर दिन काट रहे हैं।

    हमहूँ रेलवे लाइन पर दिन काटब।

    यहाँ सब पगला गया है।

    पागल सही, जिनगी बचत। अखन एकरा दवा आइन देबै, सड़क डूब जैसे तरखन?

    पंडित समझाने के लिए मुलायम पड़ गए, ईश्वर सहाय छवि, अहाँ...

    कोई काम नइ देत? रातियो रेडियो में कहलकड जे गंगा के पानी खतरा के निसान से आर उपर बैढ़ जैतेइ। पहाड़ी घाट से सब लोग भागल। अहाँ माला फेरैत बैठल रहू।

    क्या हो गया है सबको? माँ, बाप, रिश्ता, संबंध पर से विश्वास हटे तो समझ में आता है कि लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। पर टमकावाली, जो सब दिन बम भोला का दिया खाती रही है, उसे भी भगवान पर विश्वास उठ गया है। कहती है, कोई काम नहीं देगा, गंगा की बाढ़ सबको अपने में समो लेगी। शिवजी भी काम नहीं आएँगे? पहाड़ी बाबा काम नहीं आएँगे ? कौन-सा युग चल रहा है—कलियुग। क्या यह अविश्वास और शंका का ही युग है?

    पंडित वासुदेव को अपना बचपन याद आने लगा—पढ़ने में निखट्टू थे। परीक्षा में फेल होने पर घर से भागे थे—पहाड़ी बाबा की शरण में साधु बनने। कोई करतब नहीं दिखाया उन्होंने। लेकिन शिव ने सब कुछ दे दिया। मंदिर के पुजारी बने, घर-गृहस्थी बस गई। पत्नी, बेटा, समाज में प्रतिष्ठा, कुछ भी तो लालसा बची नहीं रही। कोई और काम करते तो भी पंजा तो करते ही। अब कोई काम नहीं करते हैं, सिर्फ़ पूजा करते हैं और उसी मंदिर के चढ़ावे से ही घर-परिवार चल जाता है। कैसे विश्वास करें कि भगवान भक्त के लिए कुछ भी नहीं करते। बाद में मिट्टी कट रही है, विश्वास दरक जाएगा, आस्था भी कटाव को नहीं झेल पाएगी?

    ठीक है, टमकावाली और संतोष रेलवे लाइन कैंप जाना चाहते हैं, तो छोड़ आऊँगा। मैं भगवान को छोड़कर नहीं जाऊँगा।

    थोड़ी देर बकझक चलती रही। आख़िर पूजा-पाठ सम्पन्न कर पंडित वासुदेव पंडिताइन, संतोष और बछिया को रेलवे लाइन कैंप पर छोड़ आए थे!

    रेलवे लाइन कैंप! वहाँ पटरी थी, ट्रेन चलती थी और वह कैंप था। बीस वर्ष पहले वहाँ पटरी थी, और उस पर ट्रेन दौड़ती थी—बरौनी जंक्शन से सिमरिया घाट तक। मोकामा जाने के लिए यात्री बरौनी जंक्शन से ट्रेन द्वारा सिमरिया घाट पहुँचते, स्टीमर से गंगा पार कर मोकामा जाते। बरौनी जंक्शन और सिमरिया घाट पर बड़ी गहमागहमी रहती। कुली और भोजनालय का धँधा ख़ूब चलता। स्टीमर और रेल सेवा दियारे की तरह फैले इस इलाक़े के लिए सुहागिन के कर्णफूल थे। गंगा पर पुल बना, रेलवे लाइन बेकार। रेल वाले पटरी, स्लीपर सब उखाड़कर ले गए। तब से विधवा की सूनी माँग की तरह रेलवे लाइन की ख़ाली ज़मीन पड़ी हैं जो मवेशियों के लिए चरागाह है, जहाँ बेर, बबूल, अकवन और बेहया के झाड़ हैं।

    रेलवे लाइन पर बने बेतरतीब फटे तिरपाल, प्लास्टिक शीट, टूटे छप्परों, फूस के मचानों की वजह से कैंप के एक सिरे से दो किलोमीटर दूर दूसरे सिरे पर पहुँचना मुश्किल था। लोगों ने रास्ता कहाँ छोड़ा था? सब आसरे एक-दूसरे पर चढ़े थे। गायें, भैंस, बैल, कुत्ते, बकरियाँ और लोग वहीं समाए थे। पानी बरसता तो गोबर, गू-मूत, कीचड़, सब एकरस हो जाते और तब रेलवे लाइन की ढलान पर सिर्फ़ फिसलन होती। सारे बाढ़ पीड़ित फिसल रहे थे—पानी, मिट्टी और हवा का संतुलन जो बिगड़ चला था।

    पंडित वासुदेव जब दवा लेकर कैंप लौटे तो संतोष के दोस्त रमेसर ने प्लास्टिक के बोरे को खोलकर तंबू तान दिया था। चार खूँटा गाड़कर लकड़ी के दो तख़्ते डालकर चारपाई बना दी गई थी। दवा खाने के बाद संतोष सँभलने लगा था। रमेसर साइकिल से पहाड़ीथान के दो चक्कर लगाकर पंडित वासुदेव का बचा घरेलू सामान उठा लाया था।

    साँझ होने से पहले पंडित वासुदेव पहाड़ीथान पूजा-पाठ के लिए लौटना चाहते थे इसलिए अतिरिक्त सतर्कता से बोले—

    कल फिर आऊँगा। अब तो संतोष ठीक है।

    पंडिताइन कुछ नहीं बोली, ग़ुस्से में भरी रही। क्या बोलती—कई बार तो कह चुकी, लौटकर मंदिर मत जाओ, थोड़े मानेंगे। आख़िर पंडित वासुदेव कमर में खोंसी धोती से रुपयों का एक बंडल पंडिताइन के सामने रख आगे बढ़ गए थे।

    अगले दिन दुपहर ढलते-ढलते गंगा विकराल हो उठी और पहाड़ीथान से एक किलोमीटर दूर गुप्ता बाँध तिनके की तरह बह गया। साँप की तरह गढ़े, नालों को सरसराते पार करता पानी मनुष्य, जानवर, कीड़े सबको खदेड़ रहा था। पहले पहाड़ी घाट जल में समाया, फिर खेत, खेतों के बीच में बनी झोंपड़ियाँ और फिर गाँव। गाँव में बचे-खुचे लोग रेलवे लाइन की तरफ़ भागे। जानवरों को ऊँची जगहों का पता नहीं था। फिर भी वे भागते रहे—डरे, सहमे, भड़कते, चिंघाड़ मारते। आख़िर जहाँ आदमी दिखा, वहीं जानवर टिक गए!

    मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे पंडित वासुदेव त्राहिमाम-त्राहिमाम करते रहे। उनके कानों में भागते लोगों, जानवरों की चीख़ और गगनभेदी हाँक देर तक भनभनाते रहे। साँझ होते-होते पहाड़ी थान और रेलवे लाइन के बीच चार किलोमीटर तक बाढ़ पसर गई थी। संतोष और पंडिताइन के सुरक्षित रेलवे लाइन पर पहुँच जाने से पंडित वासुदेव नि:शंक हो चले थे हालाँकि पहाड़ीथान का किनारा कटता चला जा रहा था। पानी मंदिर की सीढ़ियों से दस हाथ दूर रह गया था। सूर्य डूबने चला था। रोशनी कम होते ही अचानक सूनेपन का अहसास पंडित वासुदेव में भीतर तेज़ छुरे की तरह धँस गया था। वे गंगा के उभरे पेट पर डूबते सूर्य को निस्तेज होते देखते रहे। उनका पूरा शरीर गहरे नारंगी रंग में भीगा दिखाई दे रहा था। आख़िर सूर्य अस्त हो गया तो वे बुदबुदाए, ईश्वर इच्छा।

    और वे पूजा-पाठ की तैयारी में लग गए।

    गाँव के पास रेलवे लाइन को रेलवे वालों ने काट दिया। काट दिया ताकि रेलवे कॉलोनी पर बढ़ते पानी का दबाव कम हो जाए। पूरा कैंप फटे तिरपाल की तरह तेज़ आँधी में फड़फड़ाने लगा। कैसे जाएँगे कैंप के लोग रेलवे कॉलोनी के बाज़ार, दवा-दारु नमक-तेल, अन्न-जलावन के लिए?

    रेलवे कॉलोनी के पास रेलवे लाइन टूटने का अंदेशा था। रेलवे लाइन टूटे इसके पहले ही कील गाँव के पास पुरानी रेलवे लाइन काट दी गई ताकि पानी का दबाव टूट जाए। वही हुआ जो रेलवे वालों ने सोचा था—गरहड़ा, मुशहदी, जयनगर, रूपनगर, बारो की ज़मीन को अपने में समोता बाढ़ का पानी निपनिया-बरौनी गाँव को पार करता तेघड़ा-बरौनी सड़क तक जा धमका। पुरानी रेलवे लाइन टापू बन गई थी।

    रेलवे लाइन कैंप पर हंगामा मचा था। ब्लॉक ऑफ़िस से बी.डी.ओ. सहित कई अधिकारियों को बाढ़ पीड़ितों ने घेर रखा था। बी.डी.ओ. लोगों को समझा रहा था—

    शांत हो जाइए। बारी-बारी से अपनी बात कहें। हम समस्या जानेंगे तो समाधान ढूँढ़ सकते हैं।

    घंटा ढूँढ़ेंगे साले, पता नहीं है कि बाढ़ कितना दुःख देती है।

    हर साल बरौनी ब्लॉक में बाढ़ आती है। रिलीफ़ नहीं बाँटेंगे, समस्या पूछेंगे, एक नौजवान भड़भड़ाया।

    गाली-गलौज से क्या होगा, चुप रहो, दूसरे ने डाँटा।

    हमें सबसे पहले दो चापाकल चाहिए। बाढ़ का पानी पीकर सबको हैज़ा हो जाएगा। तीसरे ने कहा।

    उसमें तो टाइम लगेगा, तब तक पानी उबालकर पीजिए। हम हैज़े का टीका लगवाने का इंतज़ाम कर देते हैं। बी.डी.ओ. ने अपने को संयत करते हुए कहा।

    पानी उबालकर पीएँ! अभी जलावन कहाँ से लाएँ?

    माचिस कहाँ से आएगा?

    किरासन तेल कहाँ है?

    अनेक आवाजों में एक तीखी आवाज़ उभरी, साला लोग रिलीफ़ में कमाएगा कि रिलीफ़ बाँटेगा? सबका एक्के इलाज—लगाओ जूता।

    बी.डी.ओ. ने हाथ जोड़े, देखिए, आपका क्रोध मैं समझता हूँ। आप हमें ज़रूरत बता दें, हम भरसक इंतज़ाम करेंगे।

    बी.डी.ओ. ने काग़ज़-क़लम सँभाल लिया, बोलिए रायजी!

    32 वर्ष की उम्र से 20 वर्ष अधिक दीखने वाले कामरेड रामबालक राय सोचने लगे। कोई धीरे बोलता है तो नौजवान कहेंगे—इ तो रामबालक दा स्टाइल में बोलता है।

    लिखिए, रामबालक राय ने अपने चिपचिपाए चेहरे को गमछे से पोंछा, कम-से-कम तीन नाव, छह चापाकल, दस्त-कै-बुखार रोकने की दवा, नमक, चीनी, सत्तू, चिवड़ा, दियासलाई, कोयला, तिरपाल, मवेशी के लिए भूसा और तत्काल राहत के लिए दो हज़ार लोगों के लिए जितना रोटी-सत्तू भेज सकें, भेजें। नहीं तो लोग, ख़ासकर बाल-बच्चे कोई दो दिन से भूखा है, कोई चार दिन से—सब फड़फड़ाते-फड़फड़ाते मर जाएँगे।

    खाली फाइल खोलने से नहीं होगा। रमेसर ने चेतावनी दी, रिलीफ़ जल्दी भेजिएगा नहीं तो ब्लॉक चलाना मुश्किल होगा।

    संतोष ने बात में तह लगाई, मत भूलिएगा कि भुक्खड़ लोग जब बेलगाम होगा तो कोई उसे रोक नहीं पाएगा।

    बी.डी.ओ. सफ़ाई देने लगा, पूरा प्रशासन तत्पर है, डी.एम., एम.पी., एम. एल.ए. साहब सब लगे हुए हैं। रिलीफ़ बाँटने के लिए नाव, मोटरबोट, हेलिकॉप्टर सब रहा है। बेगूसराय हवाई अड्डे पर ही रिलीफ़ का हेडक्वार्टर बना दिया गया है...अच्छा, हम लोग चलते हैं, दूसरे गाँव भी जाना है।

    बी.डी.ओ. अपने दल के साथ मोटरबोट की तरफ़ बढ़ चले।

    दो दिनों से कैंप के ऊपर हेलिकॉप्टर उड़ते और लौट जाते। शायद बाढ़ का मुग्धकारी दृश्य देखकर। हेलिकॉप्टर की आवाज़ सुनते ही हज़ारों विश्वास से भरी आँखें आकाश में टँग जातीं। कैंप का जीवन अजीब था। किसानों की खेती-बाड़ी का काम ठप्प था। जिनके मवेशी थे, वे तैरकर या नाव या मटके की घिरनई से गरहड़ पहुँचते, वहाँ से ट्रेन पकड़कर दलसिंगसराय स्टेशन जाते जहाँ बाढ़ के होने की वजह से मवेशियों के लिए चारा मिल जाता था। जिन्हें कोई काम नहीं था, वे सवेरे ही ताश खेलने बैठ जाते थे। रिलीफ़ पैकेट नहीं गिरता, वे विश्वास से भरी आँखें बल्ब की तरह झट से बुझ जाती थीं। तीसरे दिन जब हेलिकॉप्टर गुज़र रहा था तो मुरारी महतो से रहा गया। खड़े होकर उसने झट से अपनी लुँगी ऊपर उठा ली।

    लो देखो सुपरघंट! साला घर्र-घर्र करता आता है, देखकर चला जाता है। अरे, कितनी बार देखोगे कि हम कैसे डूबे हैं।

    मुरारी की हरकत से शांत रामबालक भी भड़क उठे, मुरारी, यहाँ सबकी माँ-बहन रहती हैं, सब बेहूदपनी नहीं चलेगी।

    तो ले आओ रिलीफ़, नेता जी! मुखिया, सरपंच तो पहले ही गाँव छोड़कर भाग। बी.डी.ओ. कहाँ है जो लिस्ट बनाकर ले गया था। जाओ बेगूसराय में खोजो।

    संतोष उखड़ गया, मुरारी, नंगई से रिलीफ़ मिलेगा? थोड़ा धैर्य-विश्वास रखो।

    काहे का विश्वास, अयँ? किस पर विश्वास? रिलीफ नई मिलेगा तो नंगई करबे करेंगे।

    रामबालक ने उत्तेजित रमेसर को दबाकर बैठा दिया और संतोष को समझाने लगा, “ए संतोष, उसका ग़ुस्सा वाजिब है। चलो, अभी बेगूसराय चलते हैं।

    बेगूसराय रिलीफ़ सेंटर में बड़ी भीड़ थी। कंधे से कंधे हिल रहे थे। सेना के दो हेलिकॉप्टर खड़े थे। राज्य सरकार का एक खिलौनानुमा हवाई जहाज़ खड़ा था! हवाईअड्डे के तीन कमरों वाले दफ़्तर के बरामदे पर मेज़ें और कुर्सियाँ लगी थी। ज़िला अधिकारी खड़े थे। ज़िले के दो संसद सदस्य और पाँच विधानसभा सदस्य कुर्सियों में धँसे बहस कर रहे थे। भीड़ में धक्कम-मुक्की करते तीनों जब ज़िलाधिकारी के पास पहुँचे तो ज़िलाधिकारी अनुनय-विनय की मुद्रा में बोल रहे थे, देखिए, रिलीफ़ पैकेट परसों से बने पड़े हैं। इन पैकेटों में रोटियाँ हैं, सत्तू नहीं। और देर हुई तो सड़ जाएँगी। अब इन लाखों पैकेटों के अंदर आपके नामों की पर्ची डालना संभव नहीं है।'' ज़िलाधिकारी ने हाथ जोड़े, यह प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है, प्राण बचाने का मामला है। आप सब जनप्रतिनिधि हैं...

    हाँ, जनप्रतिनिधि हैं, सांसद यमुना बाबू गरज पड़े, इसी से मेरे नाम की पर्ची पैकेट में जानी चाहिए।

    विधायक भजन सिंह ने व्यंग्य-बाण छोड़ा, हम लोग का पशु-प्रतिनिधि हैं? आपको वोट चाहिए तो हमें भी वोट चाहिए। आपका नाम जाएगा तो हमारा नाम भी जाएगा।

    आपका जाए जाए, मुझे मतलब नहीं, यमुना बाबू ने बचाव करते हुए कहा, डी.एम. साहब, रिलीफ़ का पैसा हम लाए हैं हमारा नाम जाएगा।

    नहीं जाएगा तो? विधायक राजो पासवान ने व्यंग्य से पूछा।

    तो रिलीफ़ भी नहीं बँटेगा। और सुनो साले हरिजन! तेरी मज़ाल नहीं कि मेरा नाम जाने से रोक दे।

    हंगामा हो गया। दोनों पक्षों के समर्थक एक-दूसरे पर टूट पड़े।

    जूतमपैजार देखकर रामबालक, रमेसर, संतोष सन्न रह गए। काफ़ी देर बाद पुलिस भीड़ को नियंत्रित कर पाई। किसी तरह रामबालक रेलवे लाइन कैंप का नाम, जनसंख्या वग़ैरह लिखा गया। तीनों बुरी तरह थक गए थे। बस यही संतोष की बात थी कि रामबालक के साथ बी.डी.ओ. से चार नाव मिलने की पर्ची, हैज़े का थोड़ा-सा टीका और दूसरी दवाओं के बंडल थे।

    संतोष अपने तंबू में लौटा तो पंडिताइन ने सीधे तोप दाग़ना शुरू कर दिया—

    नेतागिरी कइल भगेल। दोसरक चूल्हा पर रोटी सेंक के माड देवे करत, बाप जीवित अय कि नई ओकर कोनो फिकिर अय?

    संतोष अकबका गया—कोयला, किरासन तेल सबका इंतज़ाम तो था ही, हाँ, बाबू को देखने नहीं जा सका। जाने का साधन भी नहीं था। आज तो नाव मिली है।

    पंडिताइन की रुलाई फूट पड़ी, समुद्र ज़ेहन पानी के बीच मंदिर में। चार दिन से कोई ख़बर नईं। केकरो फिकिर (फ़िक्र) नइ छइ।

    संतोष तसल्ली देने आगे बढ़ा तो पंडिताइन और छाती कूटने लगी, देखबई भोलानाथ, अहाँक बसहा बैल (शिव बैल) छबि! भोला अहीं सहाय रहब।

    संतोष ने हिम्मत जुटाकर कहा, कैसे देखने जाता माइ? एक कोस तैरना क्या खेल है? आज नाव मिली है, जाकर ले आता हूँ पाहुन (पिता) को। उनको कुछ नहीं हुआ होगा। अभी स्टेशन पर अमरपुर का अभय कंपाउंडर मिला था जो बोला कि सिर्फ़ पहाड़ी थान का मंदिर बचा है।

    रमेसर के चप्पू के ज़ोर से डोंगी बढ़ी चली जा रही थी। छोटी-सी डोंगी में कामरेड रामबालक, अभय और संतोष बैठे थे। टीके के एम्पुल, थालाजोल, एवोमिन, क्लोरोस्ट्रेप कैप्सूल, स्पिरिट, ग्लूकोज, दियासलाई सत्तू के पैकेट सब डोंगी में भरे थे।

    पानी और बालू का रास्ता काटे नहीं कटता है भाई! रहा मंदिर सुनो, पंडितजी के नचारी गाने की आवाज़ रही है। रामबालक की बात सुनते ही सब चौकन्ने हो गए।

    दूर से पंडितजी की टेर धीरे-धीरे साफ़ सुनाई देने लगी थी—

    ओऽऽ शिवशंकर त्रिपुरारी

    कौन विधि हम निमहब हो, विपत पड़ल सिर भारी

    ओऽ शिवशंकर त्रिपुरारी

    जँ एहि बेर भोला पार लगाइब, आयब फेर अगारी

    ओऽ शिवशंकर त्रिपुरारी

    भक्त अहाँक सुनी पुकारि रहल अछि, राखब लाज विचारी

    ओऽ शिवशंकर त्रिपुरारी

    जाबत धैर्य धरब अपने पर ताबत ढाढ़ि दुआरी

    ओऽ ओ।

    नाव के मंदिर के पास पहुँचते ही संतोष ने ज़ोर से आवाज़ दी, पाहुन! पाहुन!

    कौन? की आवाज़ के साथ ही पंडित वासुदेव मंदिर के बाहर निकल आए। बदन से धोती बाँधे, हाथ से सुमरनी, भव्य अधपकी दाढ़ी। संतोष को नाव से उतरने की कोशिश करते देख पंडित जी चिल्लाए, नाव से मत उतरो बेटा, दीवार टूट गई है।

    पाहुन, आप अभी चलिए, माइ दिन-रात रोती रहती है।

    काहे रोती है, मैं यहाँ ठीक हूँ बेटा! बम भोला सबकी रच्छा करते हैं, हमारी नहीं करेंगे?

    नहीं पाहुन, आप चलिए संतोष ने प्रतिवाद किया, कहीं तबीयत ख़राब हो गई तो कौन देखेगा यहाँ?

    संतोष ठीक कह रहा है पंडिजी, रामबालक ने ज़ोर देकर कहा, आप हमारे साथ चलिए। हम लोग भी रिलीफ़ बाँटने में फँसे हैं।

    नहीं बेटा, यहाँ बम भोला की सेवा कौन करेगा? जब तक बाढ़ है, दो-चार दिन में खोज-ख़बर ले लिया करना।

    अभय कंपाउंडर कुछ सोचते हुए बोला, “आप हैज़े का टीका तो लगवा लीजिए।

    पंडित वासुदेव ने आत्मविश्वास से भरी हँसी बिखेरी, मेरा टीका तो बम भोला है बेटा! वही रच्छा करेंगे।

    संतोष गिड़गिड़ाने लगा, आप चलिए पाहुन, नहीं तो माइ मुझ पर बिगड़ेगी। आपका सत्तू ख़त्म हो जाएगा, ये पानी गंदा है...

    जैसे कुछ ध्यान गया हो, पंडित वासुदेव मुस्कुराए, सुनो संतोष, कल जब फिर रिलीफ़ बाँटने निकलना तो मेरे लिए धूप, अगरबत्ती, सलाई, नमक और सत्तू लेते आना।

    संतोष झट माई की दी हुई पोटली उठाकर, पोटली उछालने से पहले बोला, लपकिए पाहुन, पोटली में सब कुछ हैं। और कोई तकलीफ़ है तो बोलिए।

    पंडित वासुदेव ने पोटली सँभालते हुए कहा, नहीं रे, बस मंदिर में बहुत नागदेवता जमा हो गए हैं। सो बच-बचाके रहना पड़ता है, पता नहीं कब क्रोधित हो जाएँ।

    डोंगी पर बैठे सब को जैसे साँप सूँघ गया।

    कुछ क्षणों बाद अभय कंपाउंडर ने क्षमा माँगते हुए कहा, पंडिजी, छोटा बड़ी बात! साँप-बिच्छू का कोई भरोसा है? इसका तो सुभाव काटने का है, काटबे करेगा। चलिए, नाव पर बैठिए।

    हाँ, पंडिजी”, कामरेड रामबालक ने ज़ोर देकर कहा, शिवजी की पूजा गंगा माइ और नाग देवता कर लेंगे। अब तो आपको चलना ही पड़ेगा।

    मुझे कुछ नहीं होगा रामबालक, पंडित वासुदेव का आत्मविश्वास सहज हो चला था, संसार में सारे जीव रहते हैं। मैं भी भक्त, नाग देवता भी शिव भक्त। भक्त एक-दूसरे को नहीं काटते-मारते। पीछे पलटते हुए पंडित वासुदेव ने कहा, संतोष, माइ को धीरज देना। तेरी माइ का धीरज जल्दी ख़त्म हो जाता है।

    रमेसर ने बाँस तिरछा करके ज़मीन में अड़ाया और ज़ोर लगाकर बाँस को दबा दिया। डोंगी गहरे पानी की तरफ़ पीछे हटी। रामबालक दूसरे मुहाने पर से चप्पू चलाने लगा। डोंगी सीधी सिमरिया हाई स्कूल की तरफ़ बढ़ने लगी, जहाँ कुछ बाढ़ पीड़ितों ने शरण ले रखी थी। संतोष पीछे मुड़कर मंदिर को देखता रहा। पंडित वासुदेव मंदिर के दरवाज़े से घुसे और मंदिर के गह्वर जैसे अँधेरे में गुम हो गए।

    मंदिर से काफ़ी दूर निकल आने पर भी संतोष की उदासी बरकरार थी। चप्पू चलाते हुए रामबालक ने कहा, संतोष, उदास क्यों हो, बूढ़े जल्दी नहीं बदलते। गंगा धार्मिक श्रद्धालुओं के लिए माँ है। हम, तुम उसके बाढ़ की कोड़े की मार साल भर सहलाते रहते हैं। काहे की माँ है यह गंगा, जिसकी कोख में बालू भरता जा रहा है। थोड़ा-सा पानी वह सह नहीं पाती, उलीच देती है। नदी माँ होती है, तब जब वह तुम्हें सींचे। वह सींचे भी कैसे, बाँध हमने बनाए, इसकी कोख के बालू को साफ़ किया। बस गंगा माई, गंगा माई का जाप करने से मरने के बाद ही स्वर्ग मिलेगा। जब तक जीओगे, गंगा तुम्हारा जीवन नर्क बना देगी। पंडिजी का अटल विश्वास है, तुम नहीं हिला सकोगे। प्रकृति, परिस्थिति या विज्ञान ही ऐसी अंधी आस्थाओं को हिला सकते हैं। गंगा को लेकर शानदार नाटक हो रहा है। यहाँ हम लोग कटाव से घिरे हैं। सब कुछ तो कटता चला जा रहा है। पता नहीं, कब तक कटाव चलता रहेगा...

    संतोष ने धीमे से कहा, यह सब ठीक है कामरेड, पर माई...

    मैं उन्हें समझा दूँगा।

    हल्की बारिश शुरू हो गई थी। जल्दी-जल्दी चप्पू चलाए जाने लगे।

    अभाव, लगातार वर्षा और सरकारी बेरुख़ी के अजगर ने कैंप को लपेटकर तानना शुरू कर दिया था। जो भी मामूली-सा रिलीफ़ मिलता उसे अपने-अपने क्षेत्रों में बँटवाने के लिए विधायकों, सांसदों में छीना-झपटी मची थी। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ मदद के लिए गई थीं। व्यापार मंडल, बाज़ार समिति, हिरदयराम गोशाला, रोटरी और लायंस क्लब वग़ैरह थोड़ी-बहुत मदद कर रहे थे। रामबालक, रमेसर, संतोष वग़ैरह राहत सामग्री जुटाकर बाँटने के काम में जुटे थे ताकि लोग हिम्मत हारें। पित भी हैज़े ने महामारी का रूप ले लिया था। असामयिक रुदन प्रेत की तरह मँडराता रहता। कब कौन मरेगा, कोई नहीं जानता था कि मृत्यु किसके दरवाज़े पर दस्तक दे देगी।

    सवेरे से संतोष निकल गया था। बाज़ार समिति वालों के पास रिलीफ़ सामग्री लेने गया था। बाज़ार समिति का अध्यक्ष लगता था कई फ़ुटबॉलों से बना था। इस विशाल काया से ऐसी विनम्र सुरीली आवाज़ निकलती थी कि वह आदमी फ़िल्मी लगने लगता था। बाज़ार में सारी जिंसों के भाव आसमान छू रहे थे। सामान्य दिनों में भूसा टोकरे की माप से बिकता था, अचानक तौलकर बेचा जाने लगा था। 16 रुपए का चालीस किलो। किरोसिन तेल सरसों के तेल की तरह, सरसों का तेल घी की तरह बिकने लगा था। बाज़ार समिति ने चार बोरे चिवड़ा, एक कार्टून दियासलाई रेलवे लाइन कैंप के लिए दिया था। लोग चढ़ते भावों को लेकर प्रतिरोध की सोच भी नहीं सकते थे, किसी तरह ज़िंदा रहना ही बड़ी बात थी। ग़ुस्सा कभी-कभी बदली के बीच से छिटक पड़ता था, जब कोई सरकारी आदमी नज़र जाता था।

    संतोष सामान डोंगी से उतरवाकर कामरेड रामबालक के हवाले कर कहने लगा, कामरेड, बहुत भूख लगी है, कुछ खाकर आता हूँ, तब तक कैंप में रिलीफ़ बाँटने की ख़बर कर दीजिए।

    हाँ-हाँ, जाओ, सबेरे से भूखे हो।

    संतोष, रमेसर के साथ अपनी छोलदारी को ओर चल पड़ा। छोलदारी के बाहर से उसने आवाज़ दी, माई, कुछ खाना दे दो।

    कोई आवाज़ नहीं आई तो वह अंदर घुसा। पंडिताइन का भारी शरीर पसीने से लथपथ था। गोरा चेहरा उखडे लाल रंग का हो गया था। पंडिताइन लेटी-लेटी घिसटकर दरवाज़े की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही थी। पूरी छोलदारी में दस्त, उल्टी की बदबू फैली थी। संतोष सन्न रह गया, बहुत मुश्किल से उसके मुँह से आवाज़ निकली—

    माइ! कि भेल।

    सवेरे से...तुम गए...तभी से...बहुत बार उल्टी...दस्त!

    वह रमेसर की ओर मुड़ा, रमेसर, तुम जल्दी से अभय कंपाउंडर और कामरेड को लेकर आओ! मैं माइ को देखता हूँ।

    उसने नमक और चीनी मिलाकर शर्बत बनाया और पंडिताइन को चम्मच से पिलाने लगा। गला तर होने के बाद पंडिताइन ने धीमे से कहा, बेटा, गंदगी...

    संतोष तुरंत बाहर गया, तेज़ी से जाकर रामसाह की विधवा बहन गंगिया को बुला लाया। दोनों ने मिलकर छोलदारी की सफ़ाई की। पंडिताइन के कपड़े बदलवाकर चारपाई पर लिटा दिया। माइ के पास बैठे संतोष के अंदर आशंका की आँधी चल रही थी—माइ बचेगी कि नहीं? कैंप में अठारह लोग हैज़े से मर चुके थे। हैज़े का टीका भी तो पूरा नहीं मिला था कि सब को टीका लगाया जा सकता। पंडिताइन ने फिर उल्टी की। गंगिया सफ़ाई करने लगी। तभी बाहर से कामरेड रामबालक की आवाज़ आई। साथ में अभय कंपाउंडर भी था। अभय ने झटपट उल्टी रोकने की सूई पंडिताइन को लगा दी।

    अभी इससे इनको थोड़ी नींद भी जाएगी और उल्टी भी रुक जाएगी। पर हालत ठीक नहीं है, ग्लुकोज का पानी चढ़ाना होगा।

    नहीं। पंडिताइन ने झटके से कहा, संतोष, तुम पंडिजी को बुला दो, बस...

    रामबालक ने संतोष को बाहर निकलने का इशारा किया। बाहर आते ही उसने कहा, देखो, तुम और रमेसर डोंगी लेकर पंडिजी को लेने चले जाओ। मैं पानी चढ़ाने का सामान, दवा लाने किसी को भेजता हूँ, डॉक्टर तो आएगा नहीं, सब डॉक्टरों के यहाँ बड़ी भीड़ है। सरकारी अस्पताल जाकर रोगी मर सकता है, बच नहीं सकता। अभय यहीं रहेगा। बस सब काम जल्दी करो।

    रमेसर और संतोष भागे डोंगी के पास। तीन डोंगियाँ बँधी थीं। एक डोंगी में दोनों सवार होकर जल्दी-जल्दी बाँस और चप्पू से डोंगी खेने लगे।

    संतोष की घबराहट बहुत बढ़ गई थी। ऐसे भी तेज़ी से चप्पू चलाने से वह हाँफ़ रहा था। अगर उत्तर या दक्षिण नाव को ले जाना हो और तेज़ पुरबाई बह रही हो तो नाव को सँभालना मुश्किल होता है। उमस से चिपचिपा आए पसीने ने उसकी हालत और ख़राब कर रखी थी। उसकी इस हालत को देखकर रमेसर ने टोका, संतोष, पहुँचने में ही इतनी ताक़त मत लगा दो कि लौटने की ताक़त ही बचे। अब तो मंदिर आने वाला है। धीमे चलो या फिर तुम चप्पू चलाना छोड़ दो। मैं धीरे-धीरे डोंगी खे ले जाऊँगा।

    डोंगी जैसे ही मंदिर के पास पहुँची, संतोष की बेसब्री बढ़ गई। डोंगी मंदिर से क़रीब पचास गज दूर थी तभी वह ज़ोर-ज़ोर से पंडिजी को आवाज़ देने लगा—

    पाहुन!—पा ऽऽऽ हुन, पा ऽऽऽ हुन! संतोष की तेज़ सुरीली आवाज़ उस वीरान जल-प्रांतर में दूर-दूर तक जा रही थी। मंदिर के अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई तो संतोष के माथे पर आशंका और बदहवासी से और पसीना उभर आया। रमेसर का चप्पू तेज़ हो गया। लेकिन बीच पानी में मंदिर होने से लहरें जो गुलगेट बना रही थीं, इसके कारण डोंगी को मंदिर के पास ले जाने में कठिनाई हो रही थी। संतोष का धैर्य चुकने लगा था।

    पाहुन! बोलिए पाहुन! माइ को हैज़ा हो गया है।

    मंदिर से कोई जवाब नहीं आया, तो वह भरे गले से रमेसर से सिर्फ़ इतना बोल पाया, रमेसर, पाहुन पाहुन नहीं...

    और संतोष की रुलाई फूट पड़ी। कैंप की अनेक मौतों में संतोष सबसे पहले लाश जलाने में शामिल हो जाता था और धैर्य बनाए रखता था।

    डोंगी जैसे ही मंदिर के अहाते की टूटी दीवार से सटी, संतोष छपाक से पानी में कूद गया और मंदिर के दरवाज़े के पास तेज़ी से पहुँचा और वहीं पत्थर की तरह, पेड़ की तरह जड़ हो गया।

    मंदिर के अंदर पंडित वासुदेव की लाश पड़ी थी। लाश से ऐसी तेज़ बदबू निकल रही थी कि वहाँ खड़ा होना भी मुश्किल था। पंडित वासुदेव का गोरा-चिट्टा बदन नीला पड़ गया था।

    संतोष की हालत देख, रमेसर ने डोंगी से छोटा लंगर उठाकर मंदिर की टी दीवार पर फेंका। लंगर के अड़ते ही रमेसर कूदकर मंदिर के दरवाज़े पर गया। रमेसर ने पंडित वासुदेव का पंजा पकड़कर हिलाने की कोशिश की, तब भी लाश कैसे हरकत करती?

    चलो, इनको बाहर निकालें। रमेसर ने कहा और धम्म से मंदिर के अंदर। जैसे ही उसने पंडित वासुदेव की गर्दन के नीचे हाथ लगाया कि सामने नज़र पड़ी और वह ज़ोर से चिल्लाया, साँप!

    तीन साँप फन ताने पड़े थे। रमेसर एक ही छलाँग में बाहर गया।

    पंडिजी को साँप ने ही काटा है। देखते हो पूरा शरीर ज़हर से नीला हो गया है। कहता वह चप्पू लाने बढ़ गया।

    रमेसर ने चप्पू संतोष को थमाया और बोला, मैं इनकी लाश को पाँव की तरफ़ ये पकड़कर पीछे खींचता हूँ, अगर कोई साँप आगे बढ़े तो चप्पू से उसके फन पर ही चोट करना!

    पंडित वासुदेव की भारी लाश को रमेसर टाँग पकड़कर पीछे घसीटने लगा। तभी एक साँप आगे सरसराया। रमेसर की बग़ल में खड़े चौकस संतोष ने हवा में लहराता चप्पू साँप के फन पर दे मारा। कुचला साँप तेज़ी से आगे बढ़ा तो उसने साँप के शरीर को चप्प से कसकर चाँप दिया। रीढ़ के टूटते ही साँप रुक गया। धम्म से संतोष ने उसके फन पर दुबारा वार किया, फिर कसकर चप्पू दबाने लगा ताकि फन पूरी तरह कुचल जाए। बाक़ी दोनों साँपों को बिलबिलाते देख रमेसर चिल्लाया, देखना, वे दोनों भी फन काढ़ चुके हैं। और दौड़कर वह दूसरा चप्पू नाव से उठा लाया। दोनों साँपों को निकलते देख संतोष ने फिर प्रहार किया। एक साँप के तो मुँह पर चप्पू लगा, वह पूँछ पटकने लगा। रमेसर जब तक जगह बनाकर तीसरे साँप पर वार करता, वह तेज़ी से सरसराता पानी में उतर गया। दूसरे साँप को मारने के बाद रमेसर ने ग़ौर से मंदिर के अंदर झाँका—शायद कोई और साँप हो। पर कोई और नहीं था। दोनों ने मिलकर किसी तरह पंडित वासदेव की दुर्गंध देती लाश को डोंगी में लादा और चप्पू चलाने लगे। बार-बार साँसों को कसते, ताकि कम-से-कम दुर्गंध सहनी पड़े।

    रेलवे लाइन कैंप के अस्थायी घाट पर डोंगी के लगते ही शोर मच गया—पंडिजी मर गए! साँप ने काटा! पता नहीं कब मरे! साथियों से घिरे कामरेड रामबालक ने लपककर संतोष को सँभाला, सांत्वना की थपकी देते हुए कहा, संतोष, धीरज रखना। चाची की हालत में सुधार है...रमेसर, तुम लोग लाश उठाकर लेते आओ।

    संतोष की आँखें वीराने में कुछ खोजती रहीं, जैसे उसने रामबालक की बात ही नहीं सुनी हो। चप्पू चलाते चलाते शरीर इतना थक गया था जैसे वह नशे में हो और उसे सारी चीज़ें घूमती नज़र रही थीं।

    कामरेड रामबालक के सहारे चलता संतोष और उसके पीछे लाश उठाए लोग जब छोलदारी पहुँचे तो करुणा से भीगी आँखें सितारों-भरी रात की तरह छोलदारी पे झुक आई थीं। संतोष छोलदारी के बाहर ही बैठ गया। रोने-धोने की तेज़ आवाज़ सुनकर पंडिताइन ने पूछा, गंगिया, रोना-धोना?

    चाची, पंडिजी... गंगिया की बातें रुदन में डूब गईं।

    घिसटती पंडिताइन छोलदारी के मुँह पर आई और लाश देखते ही फुक्का मारकर रो पड़ी, रे संतोषवा, कि भेल रे...

    रामबालक के हाथ के इशारे से यंत्रवत् संतोष आगे बढ़ा—माँ को तसल्ली देने के लिए। पंडिताइन ने संतोष का हाथ झटक दिया, ला, हमर पाहुन के ला, पाहुन?

    अवाक् संतोष धम्म से ज़मीन पर बैठ गया और दोनों हथेलियों से अपनी छाती को दबाने लगा—आँ आँ

    उसे तेज़ उल्टियाँ रही थीं, जैसे लाश की दुर्गंध उसके पोर-पोर में बस गई हो।

    धीरे-धीरे पंडिताइन की चीत्कार की जगह, शांत आँसू की बूँदें रह गईं, जैसे चीत्कार उस जल-प्रांतर में गुम हो गई हो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : शताब्दी की कालजयी कहानियाँ (खंड 3) (पृष्ठ 355)
    • संपादक : कमलेश्वर
    • रचनाकार : अरुण प्रकाश
    • प्रकाशन : किताबघर प्रकाशन
    • संस्करण : 2010

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