Font by Mehr Nastaliq Web

घुसपैठिए

ghusapaithiye

ओमप्रकाश वाल्मीकि

और अधिकओमप्रकाश वाल्मीकि

    मेडिकल कॉलेज के छात्र सुभाष सोनकर की ख़बर से शहर की दिनचर्या पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा था। अख़बारों ने इसे आत्महत्या का मामला बताया था। एक ही साल में यह दूसरी मौत थी मेडिकल कॉलेज में। फाइनल वर्ष की सुजाता की मौत को भी आत्महत्या का केस कहकर रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया था। किसी ने भी आत्महत्या के कारणों की पड़ताल करना ज़रूरी नहीं समझा था। लगता था जैसे इस शहर की संवेदनाओं को लकवा मार गया है। दो-दो हत्याओं के बाद भी यह शहर गूँगा ही बना रहा।

    राकेश के दफ़्तर पहुँचते ही फ़ोन की घंटी बजी। रमेश चौधरी का फ़ोन था। उसने काँपती आवाज़ में कहा था, ‘‘राकेश साहब, सुभाष सोनकर बलि चढ़ गया है...’’

    ‘‘क्या?...’’ राकेश ने लगभग चीख़ते हुए पूछा।

    ‘‘अभी और कितनी हत्याएँ होंगी राकेश साहब?...’’ रमेश ने अपनी बात जारी रखी थी, ‘‘आख़िर सोनकर का अपराध क्या था?...सिर्फ़ इतना की माँ-बाप उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे।’’ रमेश चौधरी का एक-एक शब्द गहरी वेदना से बाहर रहा था।

    राकेश काठ की तरह जड़ हो गया था। रमेश चौधरी की भर्राई आवाज़ जैसे हज़ारों मील दूर से रही थी। जिसे वह ठीक से सुन नहीं पा रहा था। सोनकर की मौत का राकेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था। राकेश को लग रहा था जैसे रमेश चौधरी किसी गहरी खाई में खड़ा है। जहाँ से प्रतिध्वनित होकर रही आवाज़ धीमी हो गई थी। जिसे सुन पाना राकेश के लिए कठिन महसूस हो रहा था।

    सुभाष सोनकर का उदास चेहरा राकेश की आँखों के सामने बार-बार रहा था। उसे लगा फ़ोन उसकी पकड़ से फिसल रहा है।

    उसकी स्मृति में वह दिन दस्तक देने लगा, जब रमेश चौधरी सुभाष सोनकर और उसके मित्रों को लेकर आया था। उस रोज़ वह दफ़्तर से घर आते ही अख़बार लेकर बैठ गया था। रसोई में इंदु की खटर-पटर चल रही थी। बच्चे दूसरे कमरे में अपना होमवर्क कर रहे थे। घर का वातावरण शांत था, लेकिन दफ़्तर से आते ही अख़बार से चिपक जाना इंदु को चिढ़ाने के लिए काफ़ी था। उसने व्यंग्य से पूछा, ‘‘कहीं जाना है क्या?’’ ‘‘नहीं...क्यों?’’ राकेश हड़बड़ा गया था। ‘‘कपड़े नहीं बदले...?’’ इंदु ने शंका ज़ाहिर की।

    राकेश ने कोई उत्तर नहीं दिया। दरअसल वह कुछ बेचैन था। दफ़्तर में रमेश चौधरी का फ़ोन आया था। कुछ ज़रूरी बात करना चाहता था। शाम को घर आएगा। राकेश ने टालने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन रमेश चौधरी माना ही नहीं था। राकेश ने कहा भी था, ‘‘दफ़्तर में ही जाओ।’’ लेकिन रमेश चौधरी ने कहा था, ‘‘नहीं, बात कुछ ऐसी ही है जो दफ़्तर में नहीं हो सकती है।’’

    रमेश चौधरी सामाजिक कार्यकर्ता है। अक्सर किसी किसी बहाने वह राकेश के पास आता ही रहता है। जब भी वह आता है राकेश अव्यवस्थित हो उठता है। उससे जितना बचने का प्रयास करो, वह उतना ही पीछे पड़ा रहता है। रमेश चौधरी के बोलने का अंदाज़ कुछ ऐसा था कि सामनेवाला व्यक्ति सहज नहीं रह पाता था।

    ‘‘...तुम लोग अपने आपको समझते क्या हो? तुम लोगों को सिर्फ़ बड़े-बड़े प्रमोशन चाहिए, वे भी आरक्षण के भरोसे। बच्चों को स्कूल-कॉलेज में एडमीशन भी कोटे से ही चाहिए। लेकिन इस कोटे को बचाए रखने के लिए जब कुछ करने की नौबत आती है तो तुम लोगों को ज़रूरी काम निकल आते हैं या फिर दफ़्तर से छुट्टी नहीं मिलती। तब रमेश चौधरी ही बनेगा बलि का बकरा। गालियाँ भी वही खाएगा। देखो साहब...अगर भीड़ का हिस्सा बनने में आप लोगों को ख़तरा दिखाई देता तो ऐसी संस्थाओं को चंदा दो जो तुम्हारे हितों के लिए काम करती हैं...तुम लोग इसी तरह उदासीन बने रहे तो वह दिन दूर नहीं जब आरक्षण को ये लोग हजम कर जाएँगे....बाबा साहब तो हैं नहीं...और बाबा साहब के नुमाइंदे बनने का जो ढोंग कर रहे हैं वे भी संसद में पहुँचते ही गीदड़ बनकर उनकी गोद में बैठ जाते हैं जो आरक्षण विरोधी हैं, और तरह-तरह की नौटंकियाँ करने में माहिर हैं। न्यायाधीशों से फैसले दिलवाएँगे कि अब मेडिकल और इंजीनियरिंग में आरक्षण से दाख़िला नहीं मिलेगा। इससे प्रतिभाएँ नष्ट होती हैं...जैसे प्रतिभाएँ इनकी ग़ुलाम हैं और सिर्फ़ इनके घरों में ही जन्मती हैं...अरे इतने ही प्रतिभावान थे तो देश की यह हालत कैसे हो गई...’’

    ऐसे संवादों से राकेश आएँ-बाएँ देखने लगता है। और यदि यह वार्तालाप घर में चल रहा होता तो इंदु को लगता है जैसे अड़ोसी-पड़ोसी कान लगाकर सुन रहे हैं। इस वार्तालाप से इंदु ऐसी उखड़ती है कि कई-कई दिन तक घर में गोलाबारी चलती ही रहती है। ऐसे में राकेश एकतरफ़ा युद्धधविराम घोषित करके आत्मसमर्पण की मुद्रा अख़्तियार कर लेता है। इंदु घुमा-फिराकर यही कहती है :

    ‘‘...तुम चाहे जितने बड़े अफ़सर बन जाओ, मेल-जोल इन लोगों से ही रखोगे, जिन्हें यह तमीज़ भी नहीं है कि सोफ़े पर बैठा कैसे जाता है...तुम्हें इनसे यारी-दोस्ती करना है तो घर से बाहर ही रखो...आस पड़ोस में जो थोड़ी-बहुत इज़्ज़त है, उसे भी क्यों ख़त्म करने पर तुले हो...गले में ढोल बाँधकर मत घूमो...यह जो सरनेम लगा रखा है...यही क्या कम है...कितनी बार कहा है कि इसे बदलकर कुछ अच्छा-सा सरनेम लगाओ...बच्चे बड़े हो रहे हैं...इन्हें कितना सहना पड़ता है। कल पिंकी की सहेली कह रही थी...रैदास तो जूते बनाता था...तुम लोग भी जूते बनाते हो...पिंकी रोते हुए घर आई थी...मेरा तो जी करता है बच्चों को लेकर कहीं चली जाऊँ...’’ इंदु की यह तानाकशी राकेश को बौना बना देती है। वह ख़ुद अपराध बोध से भर जाता है।

    बस अख़बार खोलकर बैठ जाता है। ऐसे अख़बार की सुर्ख़ियाँ गड्डमड्ड होकर काले धब्बों में बदल जाती हैं। और राकेश को लगने लगता है जैसे वह सुरक्षित है।

    दरवाज़े की घंटी बजने से उसकी विचार तंद्रा टूट गई थी। उसने दरवाज़ा खोला। रमेश चौधरी ही था। उसके साथ चार युवा और थे। वे सब अंदर आकर इधर-उधर पसर गए थे। राकेश उन्हें ग़ौर से देख रहा था। सभी के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। उदास चेहरों पर भय की परछाइयाँ दिखाई पड़ रही थीं।

    वे सभी चुप थे। सभी अपने-अपने खोल में सिमटे हुए थे। खोल से बाहर आने की छटपटाहट उनके चेहरों से ज़्यादा उनकी आँखों में थी। उनकी दशा देखकर राकेश के मन में कई तरह की शंकाएँ पनपने लगी थीं।

    रमेश चौधरी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘राकेश साहब, यह है अमरदीप, ये विकास चौधरी, ये नितिन मेश्राम और ये सुभाष सोनकर। सभी मेडिकल कॉलेज के छात्र हैं। अमरदीप और नितिन मेश्राम फ़ाइनल वर्ष में हैं और ये दोनों प्रथम वर्ष में हैं। आपसे मिलना चाहते थे।’’ ‘‘हाँ...ज़रूर...’’ राकेश ने सहज भाव से कहा।

    अमरदीप हिचकते हुए बोला, ‘‘सर! हम लोग बहुत बड़ी परेशानी में हैं...समझ नहीं रहा है क्या करें?’’ अमरदीप पल-भर के लिए रुका। ख़ुद को व्यवस्थित करते हुए बोला, ‘‘मेडिकल कॉलेज के जो हालात हैं, उसमें हमारे लिए पढ़ाई जारी रखना दिन-प्रतिदिन कठिन हो रहा है। ये साल हमने जिन यातनाओं के साथ गुज़ारे हैं...हम ही जानते हैं। कई बार तो लगता था पढ़ाई छोड़कर वापस लौट जाएँ...लेकिन माँ-बाप की उम्मीदें रास्ता रोककर मजबूर कर देती हैं। उन सब यातनाओं के साथ पढ़ाई जारी रखना...बहुत तकलीफ़देह है...एक रोज़ तो मैंने आत्महत्या तक करने का निश्चय कर लिया था।’’ निराशा और हताशा से लबरेज अमरदीप के शब्दों ने साँझ के धुँधलकों को और अधिक गहरा दिया था। अमरदीप के अंतस से गूँजती चीत्कारें साफ़-साफ़ सुनाई पड़ रही थीं।

    माहौल ग़मगीन हो गया था। राकेश के हृदय में जैसे कंपन बढ़ गए थे। अपने ही अंतर्मन की हिलोरों पर तैरता अमरदीप बोला, ‘‘कल पूरा दिन होस्टल के एक कमरे में विकास चौधरी और सुभाष सोनकर को दरवाज़ा बंद करके पीटा गया।’’

    ‘‘क्यों...? क्या रैगिंग चल रही थी?’’ राकेश ने हैरानी से पूछा।

    ‘‘रैगिंग होती तो फ़र्स्टइयर के सभी छात्रों के साथ यह सुलूक होता। लेकिन वहाँ तो सिर्फ़ इन दोनों को ही पीटा गया’’, अमरदीप ने जोर देकर कहा।

    ‘‘दलित छात्रों को अलग खड़ा करके अपमानित करना तो रोज़ का क़िस्सा है। प्रवेश परीक्षा के प्रतिशत अंक पूछकर थप्पड़ या घूँसों से प्रहार होता है। ज़रा भी विरोध किया तो लात पड़ती है। यह दो-चार दिन नहीं साल के साल चलता है। और यह पिटाई कॉलेज या छात्रावास तक ही सीमित नहीं है। शहर से कॉलेज तक जानेवाली बस में भी पिटाई होती है। कोई एक सीनियर चलती बस में चिल्लाकर कहता है, ‘‘इस बस में जो भी चमार स्टूडैंट है...वह खड़ा हो जाए...फिर उसे धकियाकर पिछली सीटों पर ले जाया जाता, जहाँ पहले से बैठे सीनियर लात, घूँसों से उसका स्वागत करते हैं।’’ अमरदीप ने हालात का ब्यौरा दिया।

    ‘‘यह तो सरासर जुल्म है’’, राकेश ने उत्तेजित होते हुए कहा। अमरदीप ने राकेश की ओर देखा,...‘‘अभी कुछ दिन पहले ऐसी ही बस में फ़ाइनल के प्रणव मिश्रा ने चिल्लाकर आवाज़ लगाई तो उस बस में सुभाष सोनकर था, जो प्रणव की आवाज़ पर चुपचाप रहा। सोनकर के पास जो छात्र बैठा था, उसने इशारे से बता दिया कि सोनकर यहाँ बैठा है। प्रणव मिश्रा अपनी अवहेलना पर तिलमिला गया। सोनकर के बाल पकड़कर अपनी ओर खींचे, ‘क्यों बे चमरटे सुनाई नहीं पड़ा हमने क्या कहा था?’ सोनकर ने अपने बाल छुड़ाने की कोशिश की...मैं चमार नहीं हूँ। बालों की पकड़ मजबूत थी। सोनकर कराह उठा। प्रणव मिश्रा का झन्नाटेदार थप्पड़ सोनकर के गाल पर पड़ा...(गाली)...चमार हो या सोनकर...ब्राह्मण तो नहीं हो...हो तो सिर्फ़ कोटेवाले...बस इतना ही काफ़ी है, प्रणव मिश्रा ने सोनकर को लात-घूँसों से अधमरा कर दिया। पूरी बस में ठहाके गूँज रहे थे...बाबा साहब के नाम पर गालियाँ दी जा रही थीं। प्रणव मिश्रा के इस शौर्य पर उसे शाबाशियाँ मिल रही थीं।’’

    राकेश ने सोनकर की ओर देखा। वह अपराधी की मुद्रा में सिर झुकाए बैठा था। सोनकर के चेहरे पर चोट के निशान और गहरे हो गए थे।

    रमेश चौधरी भी ख़ामोश था। लेकिन उसके चेहरे की मांसपेशियाँ कसी हुई थीं। चेहरे का रंग बदल रहा था। रसोई में इंदु की खटर-पटर और तेज़ हो गई थी। इंदु के खँखारने का स्वर राकेश के लिए संकेत था....‘अजी, आप इन पचड़ों में पड़ो।’ रसोई के कामकाज के दौरान भी इंदु के कान इन लोगों की बातचीत पर ही लगे थे।

    इंदु का जो नज़रिया था, वह सामाजिक प्रताणना का प्रतिफल था। वह एक सहज जीवन जीना चाहती थी। उसे लगता था राकेश को इन झमेलों से बचना चाहिए। वह इसी कोशिश में लगी रहती थी कि आस-पड़ोस के लोग उनके बारे में जान पाएँ कि वे कौन हैं? उसे यह सब बहुत सुरक्षित लगता था। लेकिन राकेश उनकी व्यथा-कथा से विचलित हो गया था। उसे महसूस हो रहा था कि वे सब किसी घने बियाबान जंगल में फँस गए हैं जहाँ चारों ओर सिर्फ़ अँधेरा है या कँटीले झाड़-झंखाड़।

    इंदु रसोईं से निकलकर बेडरूम में चली गई थी। जहाँ बच्चे अपने होमवर्क में मशग़ूल थे। कुछ ही क्षण बाद राकेश का आठ वर्षीय पुत्र बाहर आया। आदेशात्मक लहज़े में राकेश से बोला, ‘‘पापा! मेरा होमवर्क कराओ।’’

    ‘‘हाँ, बेटे, बस अभी कराते हैं, दस मिनट में....ज़रा रमेश अंकल से बात कर लें...तब तक तुम अपनी ड्राइंग बना लो’’, राकेश ने उसे बहला-फुसलाकर वापस भेज दिया। राकेश इंदु का इशारा समझ रहा था—‘इन्हें जल्दी भगाओ...इन झंझटों से अपने आपको दूर रखो।’

    राकेश कुछ अटपटा-सा गया था। रमेश चौधरी ने भी इशारा समझ लिया था। वह सहज बने रहना चाहता था। उसने राकेश को धीरे से कहा, ‘‘साहब, हम आपका ज़्यादा समय नहीं लेंगे...बस इन लड़कों को कोई रास्ता सुझाइए....डॉक्टर तो इन्हें बनना ही है....।’’

    राकेश गहरी सोच में था। उसे सूझ ही नहीं रहा था कि इन हालात में छात्रों को क्या करना चाहिए।

    नितिन मेश्राम अभी तक चुप था। राकेश को गहरी सोच में डूबा देखकर बोला, ‘‘होस्टल नं. 1 में कमरा एलॉट हो जाने के बाद किसी दलित छात्र को उसमें घुसने नहीं दिया जाता है। घूम-फिरकर होस्टल नं. दो में ही दलित छात्रों को रखा जाता है। यही स्थिति गर्ल्स होस्टल की भी है। वहाँ की सभी दलित लड़कियाँ एक ही होस्टल में रहती हैं। कॉलेज मैनेजमेंट को ये समस्याएँ गंभीर नहीं लगतीं। उन्हें लगता है दलितों के लिए मेडिकल में आना अतिक्रमण करना है। जब उनसे शिकायत करते हैं तो ध्यान ही नहीं देते।’’

    नितिन मेश्राम मुखर हो उठा था, ‘‘इतना ही नहीं, प्रैक्टिकल की परीक्षाओं में भी भेदभाव बरता जाता है। प्रणव मिश्रा मेरे ही बैच में है। क्लासेज अटेंड करता है, प्रैक्टिकल। फिर भी त्रिवेदी सर उसे ही सबसे ज़्यादा अंक देते हैं। अटैंडेंस की भी समस्या नहीं होती।’’ मेश्राम ने कटुता से कहा।

    राकेश की स्मृतियों में अतीत दस्तक देने लगा था। जब वह पहली बार होस्टल गया था। उसे जो रूम एलॉट हुआ था उसमें पहले से एक छात्र था जिसने उसे अपने कमरे में घुसने ही नहीं दिया था। उसने साफ़ मना कर दिया था कि वह किसी भंगी-चमार के साथ अपना रूम शेयर नहीं कर सकता है। जब उसने होस्टल वार्डन से शिकायत की तो उसने भी उसकी जाति पूछी थी और उसे एक दलित छात्र के साथ रख दिया था। साथ ही उसे चेतावनी भी दी थी—‘अपनी औकात में रहो...वरना बाहर कर दूँगा।’

    छात्रावास जीवन के दिन बहुत ही पीड़ादायक थे। एक-एक दिन जैसे यंत्रणा से गुज़र कर पार करना पड़ता था। मैस में भी अलग बैठना पड़ता था।

    रमेश चौधरी ने राकेश की सोच को झटका दिया, ‘‘साहब, अब आप ही बताइए क्या किया जाए?’’

    ‘‘तुम लोग डीन से मिले?’’ राकेश ने सवाल किया। ‘‘जी, मिले थे...उनका कहना है—आरक्षण से आए हो थोड़ा-बहुत तो सहना ही होगा। सवर्ण छात्रों की ज़्यादतियों को वे अनुचित नहीं मानते। क्योंकि नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ ये प्रतिक्रिया है। आरक्षण के विरोध से उपजा आक्रोश’’, नितिन ने वितृष्णा से भरकर कहा।

    ‘‘डीन ही नहीं प्रोफ़ेसर भी इसी तरह की टिप्पणियाँ करते हैं, और प्रणव मिश्रा जैसे छात्रों को शह देते हैं’’, अमरदीप ने नितिन मेश्राम की बात का समर्थन किया। सुभाष सोनकर अपने भीतर उठते ग़ुस्से को दबाते हुए बोला, ‘‘मैंने अपनी मेडिकल रिपोर्ट बनवाई थी। जिसे लेकर पुलिस थाने गया था रपट लिखाने। इंस्पेक्टर ने रिपोर्ट लिखने से साफ़ मना कर दिया था—यह तुम लोगों का अन्दरूनी मामला है। पुलिस को क्यों घसीटते हो...अब आप ही बताइए। आख़िर हम जाएँ तो कहाँ जाएँ। इन स्थितियों में ठीक से पढ़ाई में भी एकाग्र हो जाना मुश्किल हो जाता है।’’

    रमेश चौधरी ने अख़बारों को भी रपट भेजी थी जिसमें दलित छात्रों के उत्पीड़न को मुख्य मुद्दा बनाया था। लेकिन अख़बारों ने इसे रैगिंग कहकर छापा। दलित छात्रों के साथ होनेवाली ज़्यादतियों का कहीं ज़िक्र तक नहीं था।

    विचार-विमर्श के बाद राकेश और रमेश चौधरी डीन से मिलकर समस्या का कोई कोई समाधान तलाश करेंगे। ज़रूरत पड़ी तो किसी प्रभावशाली व्यक्ति से मिलकर बात करेंगे। मेडिकल कॉलेज के डीन डॉक्टर भगवती उपाध्याय से मिलने पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। डीन का कहना था कि आरक्षण से मेडिकल का स्तर गिर रहा है। राकेश ने उन्हें टोकते हुए कहा था, ‘‘डॉक्टर साहब, हम यहाँ आरक्षण के पक्ष या विपक्ष पर चर्चा करने नहीं दलित छात्रों की समस्याएँ लेकर आए हैं।’’

    डीन उनकी कोई भी सुने बग़ैर आरक्षण से होनेवाले नुक़सान पर ही बोल रहे थे। उनकी धारणा थी कि कम योग्यतावाले जब सरकारी हस्तक्षेप से मेडिकल जैसे संस्थानों में घुसपैठ करेंगे तो हालात तो दिन-प्रतिदिन ख़राब होंगे ही। उन छात्रों का क्या दोष जो अच्छे अंक लेकर पास हुए हैं।

    राकेश बहस से बचना चाह रहा था, ‘‘डॉक्टर साहब, आरक्षण पर हम लोग फिर कभी चर्चा कर लेंगे, अभी तो उन हालात का कोई समाधान निकालिए, जिनकी हमने चर्चा की है। दलित छात्रों का उत्पीड़न रोकिए।’’

    ‘‘देखिए, छोटी-मोटी घटनाओं को इतना तूल मत दें। दलित उत्पीड़न जैसा मेरे कॉलेज में कुछ नहीं है। और मैं इन वाहियात चीज़ों को नहीं मानता। हमारे घर में तो भंगिन को भी ‘अम्मा’ कहा जाता था’’, डीन जैसे अपने आप से बाहर ही नहीं निकल रहे थे।

    राकेश और रमेश चौधरी बौखलाकर उठ आए थे। दलित छात्रों का मेडिकल में आना डीन की दृष्टि में घुसपैठ थी। रमेश चौधरी ने स्वयं को बहुत मुश्किल से क़ाबू में रखा था। शायद राकेश के कारण।

    कई दिन वे दोनों अनेक गण्यमान्य लोगों से मिले। लेकिन सभी जगह उन्हें निराशा ही हाथ लगी। अनेक दलित अधिकारियों के पास वे गए। उनका रवैया भी निराशाजनक ही था। वे कोई जोख़िम नहीं उठाना चाहते थे। उनका कहना था, मामले उठाने से दलित छात्रों का नुक़सान होगा।

    दस-पंद्रह दिन के अथक प्रयासों के बाद भी कोई सुगबुगाहट वे पैदा करने में असफल रहे थे। निराश होकर रमेश चौधरी ने कहा था, ‘‘राकेश साहब अब तो आपने ख़ुद ही देख लिया...मैं इन लोगों से क्यों कड़वी बात करता हूँ...’’

    राकेश भी अधिकारी था। लेकिन वह छात्रों की मदद करना चाहता था, सामाजिक उत्तरदायित्व समझकर। सरकारी अफ़सर ऐसे कामों से बचने की कोशिश करते थे। उन्हें डर था, कहीं इन हादसों के छीटों में वे भीग जाएँ। उन्हें दलित होने का भय हर वक़्त सालता है।

    रमेश ने जुलूस निकालने की योजना बना ली थी। तारीख़ भी तय हो गई थी। लेकिन अचानक सुभाष सोनकर की आत्महत्या ने सबकुछ बदलकर रख दिया था। सबसे ज़्यादा सदमा पहुँचा था रमेश चौधरी को। इस ख़बर से वह ग़ुस्से से बिफर पड़ा था। राकेश को जब उसने सोनकर की आत्महत्या का समाचार दिया उस वक़्त वह आपे से बाहर था।

    सोनकर को पहली ही परीक्षा में फेल कर दिया गया था। क्योंकि उसने प्रणव मिश्रा के ख़िलाफ़ पुलिस में नामज़द रपट लिखाने का दुस्साहस किया था, डीन और अन्य प्रोफ़ेसरों तक शिकायत पहुँचाने की हिमाकत की थी, यह भूलकर कि वह इस चक्रव्यूह में अकेला फँस गया है, जहाँ से बाहर आने के लिए उसे कौरवों की कई अक्षौहिणी सेना और अनेक महारथियों से टकराना पड़ेगा। परीक्षाफल का व्यूह भेदकर सोनकर बाहर नहीं पाया था। कई महारथियों ने निहत्थे सोनकर की हत्या कर दी थी। जिसे आत्महत्या कहकर प्रचारित किया गया था।

    रमेश चौधरी से फ़ोन पर यह समाचार पाकर राकेश भी गहरे अवसाद से भर गया था। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी कुशाग्र बुद्धि का सोनकर आत्महत्या कर सकता है। फ़ोन पर रमेश की आक्रोशित आवाज़ सुनकर राकेश की उलझनें और ज़्यादा बढ़ गई थीं। उसके काँपते हाथ में थमा फ़ोन भी थरथरा गया था। बहुत मुश्किल से राकेश फ़ोन क्रेडिल पर रख पाया था....राकेश ने स्वयं को सँभालने का प्रयास किया। फिर भी उसे लग रहा था जैसे उसका हृदय डूब रहा है। वह धम्म से कुर्सी में धँस गया। उसके मुँह से अस्फुट शब्द निकले, ‘‘सोनकर यह क्यों किया तुमने...!’’

    राकेश के मन बुरी तरह उचट गया था। दफ़्तर के काम में भी मन नहीं लग रहा था। वह दफ़्तर से उठकर जाने ही वाला था, फ़ोन की घंटी बज उठी। रमेश चौधरी का फ़ोन था। धीर-गंभीर आवाज़ में बोल रहा था, ‘‘राकेश साहब, कल पोस्ट मार्टम के बाद सोनकर की लाश का अंतिम संस्कार मेडिकल कॉलेज के मुख्य गेट पर होगा...आपमें साहस हो तो पहुँच जाना....’’

    रमेश चौधरी के शब्दों में छिपी आँच को उसने महसूस कर लिया था। वह अभी तक सोनकर की मौत के सदमे से उबर नहीं पाया था कि रमेश चौधरी के इस फैसले ने उसे पेशोपेश में डाल दिया था। सोनकर का चेहरा बार-बार उसकी आँखों में उतर रहा था। राकेश अपने भीतर उठनेवाली बेचैनी को जितना दबाने की कोशिश कर रहा था, वह उतनी ही तीव्रता से बढ़ रही थी। वह फिर से कुर्सी पर बैठ गया था। सोनकर का चेहरा उसे उद्वेलित कर रहा था। सोनकर की जद्दोजहद राकेश की अपनी पीड़ा बन गई थी। उसने एक गहरी साँस ली और झटके से उठकर खड़ा हो गया था। उसने तय कर लिया था, वह सोनकर की अंतिम यात्रा में शामिल ही नहीं होगा, उसे कंधा भी देगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हंस (मई-2000)
    • रचनाकार : ओमप्रकाश वाल्मीकि

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY