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देर हो, अँधेर नहीं

der ho, andher nahin

लियो टॉल्स्टॉय

लियो टॉल्स्टॉय

देर हो, अँधेर नहीं

लियो टॉल्स्टॉय

और अधिकलियो टॉल्स्टॉय

    पाटनपुर नगर में हरजीत राय नाम का एक व्यापारी था। उसकी दो दुकानें थीं और रहने का अपना निज का घर। हरजीत जवान था। स्वस्थ शरीर, बाल घुँघराले, हँसता चेहरा। विनोदी स्वभाव का था और गाने का उसे शौक़ था। उमर पर उसे शराब का चस्का भी लगा था और पैसा होने पर उसे रंगरेली सूझती थी। लेकिन शादी हो गई तो उसकी आदतें धीमे-धीमे बदल गईं। ख़ास मौक़ों की बात दूसरी, नहीं तो शराब उसने अब छोड़ दी थी।

    एक बार वह कातकी के मेले को जा रहा था। जाने लगा और पत्नी से विदा ले रहा था तो वह बोली, “देखो, आज जाओ, मुझे बुरा सपना दीखा है।

    हरजीत हँस दिया। बोला, “मैं जानता हूँ कि तुमको यह डर है कि मैं मेले में गया तो बहक जाऊँगा और पैसा बरबाद करके आऊँगा। यही न?

    बीबी ने कहा कि ठीक मालूम नहीं कि यही डर है कि दूसरा है। लेकिन मुझे बुरा सपना हुआ है। सपने में दीखा कि तुम जब लौटे और टोपी उतारी तो सारे बाल तुम्हारे सफ़ेद-फक पड़े हुए हैं।

    हरजीत और भी हँसा। बोला, “यह तो और अच्छे भाग्य का सपना है। देख लेना कि इसका फल होगा कि मैं जितना माल ले जाता हूँ, वह सब बिक जाएगा और तुम्हारे लिए तरह-तरह की सौगात लेकर लौटूँगा।

    इस भाँति उसने परिवार से राजी-ख़ुशी विदा ली और चल दिया। आधे पड़ाव चलने पर उसे अपनी जान-पहचान का एक और व्यापारी मिला।

    वे दोनों एक साथ सराय में ठहरे। साथ ही खाया-पीया और फिर पास-पास के कमरों में सोने चले गए।

    सबेरे देर तक सोने की हरजीत की आदत नहीं थी। और ठंड-ठंड में रास्ता चलना भी आसान होता है, इसलिए तड़का फूटने से पहले उसने गाड़ीवान को जगाया। कहा कि गाड़ी जोतो और चलो।

    यह कहकर वह सराय के मालिक के पास गया जो वहीं पिछवाड़े रहता था। सरायवाले का लेना चुकाया, उसे धन्यवाद दिया और हरजीत अपने सफ़र पर आगे बढ़ा।

    कोई दसेक कोस चलने पर उसने बैल खोले कि कुछ उन्हें खिला-पिला दे। ख़ुद भी ज़रा आराम किया। सुस्ताने के बाद फिर सरायवाले को चाय के लिए कहकर अपनी बाँसुरी निकाल बजाने लगा।

    तभी एक इक्का आकर वहाँ रुका। इक्का सजा-बजा था और घोड़े के गले में घंटी बज रही थी। उसमें से एक अफ़सर उतरे, पीछे दो सिपाही। आकर अफ़सर ने हरजीत से सवाल पूछने शुरू किए कि तुम कौन हो, कहाँ से आए हो?

    हरजीत ने सवालों का माकूल जवाब दिया और कहा, “आइए, चाय में मेरा साथ दीजिएगा?

    लेकिन अफ़सर निमंत्रण को अनसुना करके अपनी जिरह पर कायम रहे।

    “पिछली रात तुम कहाँ थे? अकेले थे? या और कोई व्यापारी साथ था? आज सवेरे वह दूसरा आदमी तुम्हें मिला? अँधेरे-तड़के तुम सराय से क्यों चल दिए? इत्यादि—

    हरजीत अचरज में था कि ये सब प्रश्न उससे क्यों किए जा रहे हैं? तो भी जैसा था, वह सब बताता चला गया। फिर उसने कहा, “आप तो मुझसे इस तरह, सवाल-पर-सवाल पूछ रहे हैं जैसे मैं कोई चोर-डाकू हूँ। अपने काम से मैं जा रहा हूँ, मुझसे सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं है।

    अफ़सर ने इस पर साथ के सिपाहियों को पास बुला लिया। कहा, मैं इस ज़िले का पुलिस अफ़सर हूँ। सवाल मैं इसलिए पूछता हूँ कि जिसके साथ तुम कल रात ठहरे थे, उसका आज गला कटा हुआ पाया गया है हम तुम्हारी तलाशी लेंगे।

    इस पर वे तीनों कमरे में गए और अफ़सर-सिपाही सबने मिलकर हरजीत का सामान खोलना शुरू किया और देखते क्या हैं कि सामान में से एक छुरा बरामद हुआ!

    अफ़सर ने कहा, यह किसका है?

    हरजीत देखता रह गया। ख़ून से दाग़ी उस छुरे को अपने सामान में से निकलते देखकर वह अचकचा गया था। वह डर गया।

    इस चाक़ू पर ख़ून के निशान कैसे हैं?

    हरजीत ने जवाब देने की कोशिश की। लेकिन शब्द उसके मुँह से ठीक नहीं निकले। लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “मैं—मेरा नहीं—मैं नहीं जानता।

    पुलिस अफ़सर ने कहा, इसी सबेरे अपने बिस्तरे पर वह व्यापारी मरा पाया गया है। किसी ने गला काट दिया है। एक तुम्हीं हो सकते हो जिसने यह काम किया। मकान अंदर से बंद था और तुम्हारे सिवाय वहाँ और कोई था। फिर तुम्हारे सामान में से यह छुरा भी निकलता है। इस पर ख़ून के निशान तक मौजूद हैं। तिस पर तुम्हारा चेहरा और तरीक़ा भी भेद खोले दे रहा है। इसलिए सच कहो कि तुमने उसे कैसे मारा और कितना रुपया तुम्हारे हाथ लगा?

    हरजीत ने शपथपूर्वक कहा, यह मेरा काम नहीं है। शाम को साथ ब्यालू करने के बाद मैंने उस व्यापारी को फिर देखा तक नहीं। मेरे पास अपने पाँच हज़ार रुपयों के अलावा और कुछ नहीं है। यह चाक़ू मेरा नहीं है।

    लेकिन यह कहते हुए उसकी जवान लड़खड़ाती थी, चेहरा पीला था और डर से वह ऐसा काँप रहा था कि मुज़रिम ही हो।

    पुलिस-अफ़सर ने सिपाहियों को हुक्म दिया कि इसको बाँधकर गाड़ी में ले लो। सिपाहियों ने हाथ-पैर बाँधकर उसे गाड़ी में पटक दिया। हरजीत के आँसू गए और उसने प्रार्थना की शरण ली। उसके पास माल रहा रकम। सब छीनकर उसे नज़दीक क़स्बे की हवालात में बंद होने भेज दिया गया। पाटनपुर में उसकी बाबत पूछताछ हुई कि वह कैसे चाल-चलन का आदमी है। वहाँ के व्यापारियों ने और दूसरे लोगों ने बताया कि पहले तो वह पीया करता था और वक़्त मौज़ में गँवाता था। लेकिन वह आदमी भला है और इधर आकर राह-रास्त पर चलता है। ख़ैर, मुक़दमा चला और अजबपुर के एक व्यापारी की हत्या करने और उसके आठ हज़ार रुपए चुराने का आरोप उसके सिर लगा।

    हरजीत की स्त्री सुनकर शोक में बेसुध-सी हो गई। उसे समझ पड़ा कि कैसे वह अपने कानों पर विश्वास करे। बच्चे उसके सब छोटे थे। एक तो दूध पीती बच्ची थी। सबको साथ ले वह शहर में गई जहाँ उसका पति जेल में था। पहले तो मुलाक़ात की इजाज़त मिली। बहुत उनहार करने और कोशिश करने से आख़िर उसे इजाज़त मिली और वह पति के पास ले जाई गई। जेल के कपड़ों और बेड़ियों में चोर-डाकुओं के साथ बंद जब उसने अपने पति को देखा तो वह सह सकी और धड़ाम से गिरी। काफ़ी देर बाद उसे होश हुआ। तब उसने बच्चे को गोद में खींच पति के पास बैठकर घर-बार की बातचीत शुरू की। उसने पूछा कि यह क्या हुआ?

    हरजीत ने जो हुआ था सब बतला दिया।

    पूछने लगी, अब क्या करना चाहिए?

    'राजा के पास अर्ज़ी भेजनी चाहिए कि एक निरपराध आदमी की मौत से रक्षा की जाए।'

    स्त्री ने कहा, अर्ज़ी तो मैंने भेजी थी। लेकिन वह मंजूर नहीं हुई।

    हरजीत इसका जवाब नहीं दे सका। आँखें नीची डालकर देखता रहा।

    स्त्री ने कहा, सुनते हो, सपना वह मेरा बेमतलब नहीं था कि मैंने एकदम तुम्हारे बाल सफ़ेद देखे थे। याद है? उस रोज़ तुम्हें चलना नहीं चाहिए था। लेकिन—

    आगे वह ख़ुद कुछ नहीं कह सकी। फिर पति के बालों में उँगली फिराते हुए बोली, “मेरे स्वामी, अपनी स्त्री से देखो झूठ कहना। सच कहना—तुमने हत्या नहीं की?

    ओ, सो तुम भी मुझे संदेह करती हो! कहकर हाथों में मुँह को छिपा हरजीत फूटकर रोने लगा।

    उस वक़्त सिपाही ने आकर कहा कि मुलाक़ात का वक़्त पूरा हो गया। अब चलो।

    स्त्री-बच्चे चल दिए और हरजीत ने आख़िरी बार अपने परिवार को हसरत से देखकर विदा किया।

    उनके चले जाने पर हरजीत को ध्यान हुआ कि सब तरफ़ क्या-क्या कहा जा रहा है। और तो और, स्त्री तक ने उस पर शुबह किया। यह याद कर उसने मन में धार लिया कि ईश्वर ही बस सच्चाई जानता है। उसी से अब तो प्रार्थना करनी चाहिए। उसी से दया की आशा रखनी चाहिए। और कुछ नहीं। यह सोच हरजीत ने फिर कोई दरख़्वास्त नहीं की। आशा-अभिलाषा उसने छोड़ दी और ईश्वर की प्रार्थना में लीन रहने लगा।

    उसे कोड़ों की और डामुल की सज़ा मिली। सो पहले उसे भीगे बेंत से कोड़े लगे। जब उसके जख़्म भर आए तो और क़ैदियों के साथ उसे डामुल भेज दिया गया।

    छब्बीस बरस वह वहाँ काले पानी में क़ैदी रहा। इस बीच बाल उसके रुई से सफ़ेद हो गए। मैले सन के-से रंग की दाढ़ी बढ़ आई। हँसी-ख़ुशी उसकी उड़ गई। कमर झुक आई। अब धीमें चलता था, थोड़ा बोलता था और हँसता कभी था। अक्सर प्रार्थना में रहता था। और कहीं उसे आस थी।

    जेल में उसने जूते गाँठना सीख लिया था। उससे कुछ पैसों की बचत भी हो गई थी। उन पैसों से उसने 'संतों की जीवनी' नाम की किताब मँगा ली थी। जेल में पढ़ने लायक़ चाँदना रहता कि वह उस किताब को पढ़ने लगता और पढ़ता रहता। इतवार के दिन वह भजनपद गाकर सुनाता। उसकी आवाज़ अब भी ख़ासी थी और बड़ी भाव-भक्ति के साथ वह पद कहता था।

    जेल-अफ़सर हरजीत को चाहते थे। वह सीधा, नेक और विनयी था। और क़ैदी भी उसकी इज़्ज़त करते थे। वे उसे 'दादा' 'भगतजी' कहा करते थे। जब उन्हें जेलवालों से किसी बात के लिए दरख़्वास्त करनी होती, या कुछ कहना-सुनना होता तो हरजीत को ही अपना मुखिया बनाते थे। और जब आपस में झगड़ा होता, तब उसी के पास आकर निबटारा और फैसला माँगते थे।

    घर से हरजीत को कोई ख़बर नहीं मिली। उसे पता नहीं था कि उसकी बीबी-बच्चे जीते भी हैं कि नहीं।

    एक दिन उनकी जेल में क़ैदियों की एक नई टुकड़ी आई सो शाम को पुराने क़ैदी नएवालों के आस-पास जमा हो बैठे। पूछने लगे कि कहाँ-कहाँ से आए हो!

    और कितनी-कितनी सज़ा लाए हो? और किस-किस ज़ुर्म की सज़ाएँ हैं?... इत्यादि। इन्हीं सबके बीच हरजीत भी था। वह आनेवालों के पास बैठा था और निगाह नीची डाले, जो कहा जाता, सुन रहा था।

    नए क़ैदियों में से एक आदमी अपना क़िस्सा बयान कर रहा था। वह लंबा, तगड़ा कोई साठ बरस का आदमी था। दाढ़ी उसकी बारीक छटी थी। मज़े में आपबीती कह रहा था—

    दोस्तो, मैं बताता हूँ। बात यह कि मैंने गाड़ी में से खोलकर एक घोड़ा ले लिया। सो उसके लिए में पकड़ा गया और चोरी का इल्ज़ाम लगा। मैंने कहा वाह, मैंने घर आने के लिए घोड़ा खोला था ताकि जल्दी पहुँच जाऊँ। घर आकर मैंने उसे पास नहीं रखा, खुला छोड़ दिया। तिस पर वह गाड़ीवाला आदमी मेरा दोस्त था। इसलिए मैंने अदालत से कहा, 'इसमें कोई बुरा नहीं है।'”

    उन्होंने कहा, 'चुप रहो। तुमने चोरी की है।'

    लेकिन कहाँ और कैसे चोरी की है, यह वह साबित कर सके। एक बार हाँ, मैंने सचमुच ज़ुर्म किया था। उस जुर्म का किसी को पता ही चला और मैं नहीं पकड़ा गया। और अब यहाँ आया तो एक कुछ बात के लिए...लेकिन दोस्तो, मैं झूठ बकता हूँ।, मैं यहाँ पहले भी चुका हूँ। लेकिन ज़्यादा दिन नहीं ठहरा।

    एक ने पूछा, “हो कहाँ के?

    पाटनपुर मेरा गाँव है। वतन मेरा वही है। नाम बलवंत। वैसे मुझे 'बल्ली-बल्ली' कहते हैं।

    हरजीत ने पाटनपुर का नाम सुनकर सिर उठाया। पूछा, तुम पाटनपुर के राय घराने के लोगों को जानते हो? उनका क्या हाल है? क्या उनमें कोई अभी जीता है?

    क्या पूछा, जानता हूँ? ख़ूब, जानूँगा क्यों नहीं। वे मालदार लोग हैं। हाँ, उनका बाप यहीं-कहीं डामुल में हम चोर-डाकुओं की तरह क़ैद है। लेकिन दादा, तुम यहाँ कैसे आए?

    हरजीत को अपने दुर्भाग्य की कथा कहना नहीं रुचा। उसने लंबी साँस ली। बोला, “छब्बीस साल से यहीं अपने पाप की सज़ा काट रहा हूँ

    बलवंत ने कहा, पाप क्या?

    हरजीत ने कहा, अंह, छोड़ो भी। कुछ तो किया ही होगा।

    हरजीत और कुछ कहता। लेकिन साथियों ने बल्ली को बताया कि हरजीत राय क्योंकर यहाँ जेल में पहुँचे। किसी हत्यारे ने एक सौदागर की हत्या की और चाक़ू इनके सामान में छिपा दिया। इस तरह बेकसूर इन्हें सज़ा मिली।

    यह सुनकर बलवंत हरजीत राय की तरफ़ देख उठा। फिर घुटनों पर हाथ मारकर बोला कि यह ख़ूब रही! वाह यह एक ही रही! लेकिन दादा, तुम बुढ़ा कितने गए हो?

    और लोग पूछने लगे तुमको इनके बारे में अचंभा क्यों हो रहा है, जी? क्या तुमने पहले इनको कहीं देखा था? कहाँ देखा?

    लेकिन बल्ली ने जवाब किया। उसने सिर्फ़ यही कहा कि दोस्ती है, संजोग की बात कि हम लोग यहाँ आकर मिले।

    इन शब्दों से हरजीत को भी आश्चर्य हुआ। मन में उसके गुमान हुआ कि यह आदमी जानता है कि किसने उस व्यापारी को मारा था। पूछा बलवंत, शायद तुमने उस मामले की बाबत सुना होगा। हाँ, हो सकता है कि तुमने मुझे पहले देखा भी हो।

    सुनता कैसे नहीं? दुनिया बातों से भरी है। कान किसी के बंद थोड़े रह सकते हैं। लेकिन एक मुद्दत हुई। अब क्या याद कि मैंने क्या सुना था।

    हरजीत ने पूछा कि शायद तुमने सुना हो कि किसने व्यापारी का ख़ून किया? बलबंत इस पर हँसने लगा। बोला, क्यों, जिसके सामान में छुरा निकला, वही तो हत्यारा। अगर किसी और ने वहाँ रख दिया तो वह जब तक पकड़ा जाए, मुज़रिम कैसा? तिस पर दूसरा कोई तुम्हारे थैले में चाक़ू रख कैसे सकता था जबकि थैला तुम्हारे सिर के नीचे था! ऐसे तुम जग जाते?

    हरजीत को यह सुनकर पक्का हो गया कि इसी आदमी ने वह हत्या की होगी। इस पर उसका जी ख़राब हो आया और उठकर वहाँ से चला।

    सारी रात वह जागता रहा। उसको बहुत कष्ट था। कल पल को थी। तरह-तरह की तस्वीरें उसके मन में आती थीं, स्त्री का चेहरा आया, जब वह मेले में जाने के लिए उससे विदा ले रहा था। उसे ऐसा मालूम हुआ जैसे वह सामने जीती-जागती मौजूद हो। ऐसी प्रत्यक्ष कि उसे छू सकता हो। मानो उसकी हँसी की आवाज़ और बातचीत का एक-एक शब्द सुन पाता हो। फिर उसके मन में बच्चों की तस्वीरें आईं। फूल से बच्चे! एक बड़े से चोगे में दुबका था, दूसरा माँ का दूध पी रहा था। अनंतर वह ख़ुद अपने को देखने लगा, जैसा कि वह हुआ करता था। जवान, ख़ुश और तंदुरुस्त और ख़ूबसूरत। उसको याद आया कि सराय में कैसा मगन मैं बंसी बजा रहा था। चिंता की रेख छू नहीं गई थी कि तभी पकड़ लिया गया! फिर वह जगह और दृश्य याद आया। जहाँ कोड़े लगे थे। अफ़सर लोग और कुछ क़ैदी इर्द-गिर्द खड़े थे। इसके बाद इन जेल के छब्बीस बरसों का समूचा जीवन उसकी आँखों के आगे फिर गया। वहाँ की मुसीबतें, कुसंग, बेड़ियाँ और समय से पहले उस पर उतरा बुढ़ापा। इन सबको याद कर उसका जी भारी हो आया। उसे बड़ी व्यथा हुई, ऐसी कि मौत माँगने की इच्छा हुई।

    और यह सब उस दुष्ट के कर्म हैं। हरजीत सोचने लगा। उस बलवंत के ख़िलाफ़ उसे बड़ा ग़ुस्सा आया। मन में होने लगा कि चाहे मरना पड़े, पर उस बदमाश को फल देना चाहिए। वह रात भर प्रार्थना करता रहा, पर उसे शांति नहीं मिली। दिन में वह बलवंत के पास से बचता रहा, ऊपर नज़र उठाई।

    इस तरह दो हफ़्ते निकल गए। रात को हरजीत सो सकता था, उसे इतना त्रास था। समझ में नहीं आता कि क्या करूँ, क्या करूँ?

    एक रात जेल में घूम रहा था कि उसे पास कहीं से मिट्टी गिरती हुई मालूम हुई। वह रुका कि क्या है। इतने में देखता है कि एक तरफ़ दीवार के नीचे बलवंत का मुँह उझक आया है। हरजीत को देखकर बलवंत का चेहरा डर से राख हो गया।

    हरजीत ने चाहा कि इस बात को दरगुज़र कर दे। पर बलवंत ने बाहर निकलकर उसको हाथ से पकड़ लिया। कहा कि मैंने कोठरी में से रास्ता खोद डाला है। रोज़ मिट्टी को जूतों में रखकर काम पर बाहर जाने के वक़्त इधर-उधर फेंक आया करता था।

    लेकिन अब तुम चुप रहो। हल्ला मत करना। चलो, तुम भी मेरे साथ निकल चलो। और अगर तुमने कुछ आवाज़ की तो मुझे पकड़कर, चाहे मार-मार कर, वे फिर मेरी जान ही निकाल लें, लेकिन तुम्हें तो पहले ही ख़त्म कर दूँगा।

    हरजीत अपने शत्रु को देखकर ग़ुस्से से काँपने लगा। उसने अपना हाथ झटककर अलग कर दिया। कहा, मैं भागना नहीं चाहता और तुम अब क्या और मुझे ख़त्म करोगे? पहले ही सब कर चुके हो। और तुम्हारी ख़बर देने की जो बात हो—तो मैं नहीं जानता। जो परमात्मा करेगा होगा।

    अगले दिन जब क़ैदी बाहर काम पर गए तो वार्डरों ने देखा कि एक जगह मिट्टी का ढेर-सा हो रहा है। किसी कैदी ने ही ला-लाकर यहाँ डाली होगी, और कौन डालता? जेल तलाश किया गया तो उस चोर रास्ते का भी पता लग गया। जेल-सुपरिंटेंडेंट आए और सबसे पूछा कि किसकी यह करतूत है। सबने इनकार कर दिया कि हमें पता नहीं। जो जानते थे उन्होंने भी भेद नहीं दिया, क्योंकि बता देते तो बलवंत की जान की ख़ैर थी। आख़िर सुपरिंटेंडेंट ने हरजीत से पूछा सुपरिंटेंडेंट भी उसका मान करते थे और मानते थे कि हरजीत सत्यवादी है।

    'हरजीत, तुम सच्चे और नेक आदमी हो। ईश्वर से डरते हो। सच बताओ कि यह काम किसका है?

    बलवंत ऐसा बना रहा जैसे मतलब हो। सुपरिंटेंडेंट पर उसने आँखें लगा रखी और भूले भी हरजीत की तरफ़ नहीं देखा। साहब के सवाल पर हरजीत के हाथ काँपने लगे और ओंठ भी काँपे। बहुत देर तक एक भी शब्द उसके मुँह से निकला। एक बार सोचा कि जिसने मेरी ज़िंदगी बरबाद कर दी, उसे ही मैं किसलिए बचाऊँ? मैंने कितना दुःख उठाया है! अब मिलने दूँ उसे बदला। लेकिन फिर ख़याल हुआ कि मैं कह दूँगा कि तो जेलवाले इसकी जान के गाहक हो जावेंगे। तिस पर क्या पता कि मेरा शक ही हो और बात सच हो। जो हुआ सो हुआ, अब उसकी तक़लीफ़ से क्या हाथ आनेवाला है?

    सुपरिंटेंडेंट ने दुहराकर पूछा, सुनते हो न, हरजीत? तुम पाप से डरते हो। सच बताओ दीवार में छेद किसने किया है?

    हरजीत ने बलवंत की तरफ़ देखा। फिर कहा, मैं नहीं बता सकता हुज़ूर! ईश्वर की आज्ञा नहीं है कि मैं बताऊँ। इसके लिए मेरा जो चाहे कीजिए, मैं आपके हाथ में हूँ।

    साहब ने और जेल दरोग़ा ने बहुतेरी कोशिश की। लेकिन हरजीत ने आगे कुछ नहीं कहा। अब क्या होता? सो मामले को वहीं छोड़ना पड़ा।

    उस रात जब हरजीत अपने बिस्तर पर पड़ा था और आँखों में नींद उतर चली थी कि कोई दबे पाँव आया और चुपचाप पास बैठ गया। अँधेरे में भेद कर हरजीत ने पहचाना तो वह था बलबंत।

    हरजीत बोला, अरे, और तुम मेरा क्या चाहते हो? तुम यहाँ क्यों आए हो? क्या जी नहीं भरा?

    बलवंत चुप सुनता रहा। हरजीत उठकर बैठ गया और बोला, क्या है तुम्हारी मंशा? बुलाऊँ पहरेदार?

    बलवंत हरजीत के चरणों में झुका जाने लगा। धीमे-से बोला, हरजीत भाई, मुझे माफ़ कर दो।

    माफ़ किसलिए?

    मैं गुनहगार हूँ। मैंने ही उस व्यापारी को मारा था और छुरा तुम्हारे सामान में रख दिया था। मैं तुम्हें भी मारना चाहता था; लेकिन बाहर शोर सुन, छुरा तुम्हारे सामान में दुबका, खिड़की की राह में भाग गया था।

    हरजीत चुप था। उसे कुछ भी बोल सूझा। बलवंत धरती पर घुटनों के बल बैठा। बोला, “हरजीत भाई, मुझे माफ़ कर दो। मैं सब इक़बाल कर लूँगा। कहूँगा, मैं हत्यारा हूँ। तब तुम छूट जाओगे और घर जा सकोगे।

    हरजीत ने कहा, “बलबंत, अब मैं क्या कहूँ। कहना तो आसान है। पर यह छब्बीस बरस जाने मैं क्या-क्या नहीं उठाता रहा हूँ। क्यों? सब तुम्हारी वजह से। लेकिन अब मैं कहाँ जाऊँ। मेरी स्त्री स्वर्ग गई, बच्चे मुझे भूल चुके। कौन मुझे पहचानेगा? बलवंत, अब मेरे पास जाने को कोई जगह नहीं है

    बलवंत धरती पर से उठा नहीं, वहीं फ़र्श पर अपना सिर पटककर पीटने लगा।

    हरजीत, मुझे माफ़ करो। मुझे बेंत से पीटा तब इतनी तक़लीफ़ नहीं हुई जितनी अब तुम्हें देखकर होती है। मुझसे सहा नहीं जाता, मैं तुम्हें सताता गया, तुम मुझे बचाते गए... हरजीत, हा-हा खाता हूँ, परमात्मा के लिए मुझे क्षमा करो। मैं बड़ा अधम हूँ, पापी हूँ, दुराचारी हूँ।

    बलवंत को सुबकी भर-भरकर रोते हुए सुना तो हरजीत भी रो आया। बोला, ईश्वर तुम्हें क्षमा करेगा, बलवंत। कौन जानता है कि मैं तुमसे सौ गुना अधम नहीं हूँ।

    यह कहते-कहते उसके अंतर में जैसे एक प्रकाश का उदय हो आया। सब चाह जैसे उसकी मिट गई। घर जाने की अभिलाषा और कलख भी उसे अब नहीं रह गई। जेल से रिहाई की ज़रूरत ही उसमें रही। बस ईश्वर की आख़िरी घड़ी अब आए, यही आस उसे शेष रह गई।

    हरजीत ने कितना ही कहा, लेकिन बलवंत अपने ज़ुर्म का इक़बाल करके ही माना। पर हरजीत के जेल से छुटकारे का हुक्म आया कि वह तो देह से छुटकारा पा चुका था!

    स्रोत :
    • पुस्तक : लियो टॉल्सटॉय प्रतिनिधि रचनाएँ भाग-3 (पृष्ठ 151)
    • संपादक : कृष्णदत्त पालीवाल
    • रचनाकार : लियो टॉल्सटॉय
    • प्रकाशन : सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
    • संस्करण : 2019

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