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महाराज की शर्त

maharaj ki shart

तेनालीराम

तेनालीराम

महाराज की शर्त

तेनालीराम

और अधिकतेनालीराम

    महाराज कृष्णदेव राय कई बार अपने दरबारियों की विलक्षण परीक्षाएँ लिया करते थे। ऐसे ही उन्होंने एक दिन भरे दरबार में सभी छोटे-बड़े दरबारियों को हज़ार-हज़ार अशर्फ़ियों से भरी एक-एक थैली दी, फिर बोले : आप सबको एक सप्ताह का समय दिया जाता है।

    सप्ताह भर के अंदर-अंदर आपने यह धन अपने ऊपर ख़र्च करना है। किंतु शर्त ये हैं कि आप लोग ख़र्च करते समय हमारा मुँह अवश्य देखें।” सभी दरबारियों ने हँसी-ख़ुशी वह थैलियाँ ले लीं और अवकाश बाज़ार की ओर चल दिए। मगर अशर्फ़ियों को लेकर एकाएक ही वह परेशान हो उठे।

    ख़रीददारी तो वे करते, मगर राजा की शर्त याद आते ही परेशान हो उठते। कारण कि अशर्फ़ियाँ ख़र्च करने से पहले राजा का मुँह कैसे देखें? इसी परेशानी के आलम में एक सप्ताह गुज़र गया। राजाज्ञा का उल्लंघन भी नहीं किया जा सकता था। यदि महाराज ने पूछ लिया कि ख़र्च करने से पहले मेरा मुँह किस प्रकार देखा तो क्या जवाब देंगे?

    एक सप्ताह बाद दरबार लगा तो सबसे पहले दरबारियों से महाराज ने यही पूछा : बताइए, आप लोगों ने क्या-क्या ख़रीददारी की?” “हम कुछ भी कैसे ख़रीद सकते थे महाराज, आपकी शर्त ही ऐसी थी। बाज़ार में आपके दर्शन कैसे और कहाँ होते? इस प्रकार आपके दर्शन हुए और अशर्फ़ियाँ ख़र्च हुईं।

    सभी की ओर से राजपुरोहित ने यह उत्तर दिया। “और तेनालीराम तुम? क्या तुम भी अशर्फ़ियाँ ख़र्च कर सके?” “महाराज! मैंने तो सारी अशर्फ़ियाँ ख़र्च कर दीं। ये नई धोती, ये कुर्ता, ये नया दुपट्टा और यहाँ तक कि ये जूतियाँ भी मैंने उन अशर्फ़ियों से ही ख़रीदी हैं।

    “इसका मतलब आपने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया।” महाराज ने आँखें तरेरीं। “हरगिज़ भी नहीं महाराज—बिल्कुल भी नहीं। बड़े ही सीधे और नरम लहज़े में तेनालीराम ने कहा : “एक-एक अशर्फ़ी आपका श्रीमुख देखकर ख़र्च की।” “किंतु कैसे?”

    आप भूल रहे हैं महाराज कि एक-एक अशर्फ़ी पर आपका चित्र अंकित है। “ओह!” महाराज मुस्कुरा उठे। जबकि सभी दरबारी हक्के-बक्के किंतु शर्मिंदा से होकर तेनालीराम का चेहरा देखते रह गए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चर्चित एवं लोकप्रिय कहानियाँ “तेनालीराम” (पृष्ठ 119)
    • रचनाकार : तेनालीराम
    • प्रकाशन : प्रशांत बुक डिस्ट्रीब्यूटर
    • संस्करण : 2018

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