गदल

gadal

रांगेय राघव

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    बाहर शोरगुल मचा। डोडी ने पुकारा ''कौन है?''

    कोई उत्तर नहीं मिला। आवाज़ आई ''हत्यारिन! तुझे कतल कर दूँगा!''

    स्त्री का स्वर आया ''करके तो देख! तेरे कुनबे को डायन बनके खा गई, निपूते!''

    डोडी बैठा रह सका। बाहर आया।

    ''क्या करता है, क्या करता है, निहाल?'' डोडी बढ़कर चिल्लाया ''आख़िर तेरी मैया है।''

    ''मैया है!'' कहकर निहाल हट गया।

    ''और तू हाथ उठाके तो देख!'' स्त्री ने फुफकारा ''कढ़ीखाए! तेरी सींक पर बिल्लियाँ चलवा दूँ! समझ रखियो! मत जान रखियो! हाँ! तेरी आसरतू नहीं हूँ।''

    ''भाभी!'' डोडी ने कहा ''क्या बकती है? होश में आ!''

    वह आगे बढ़ा। उसने मुड़कर कहा ''जाओ सब। तुम सब लोग जाओ!''

    निहाल हट गया। उसके साथ ही सब लोग इधर-उधर हो गए।

    डोडी निस्तब्ध, छप्पर के नीचे लगा बरैंडा पकड़े खड़ा रहा। स्त्री वहीं बिफरी हुई-सी बैठी रही। उसकी आँखों में आग-सी जल रही थी।\

    उसने कहा ''मैं जानती हूँ, निहाल में इतनी हिम्मत नहीं। यह सब तैने किया है, देवर!''

    ''हाँ गदल!'' डोडी ने धीरे से कहा ''मैंने ही किया है।''

    गदल सिमट गई। कहा ''क्यों, तुझे क्या ज़रूरत थी?''

    डोडी कह नहीं सका। वह ऊपर से नीचे तक झनझना उठा। पचास साल का वह लंबा खारी गूजर, जिसकी मूँछें खिचड़ी हो चुकी थीं, छप्पर तक पहूँचा-सा लगता था।

    उसके कंधे की चौड़ी हड्डियों पर अब दिये का हल्का प्रकाश पड़ रहा था, उसके शरीर पर मोटी फतुही थी और उसकी धोती घुटनों के नीचे उतरने के पहले ही झूल देकर चुस्त-सी ऊपर की ओर लौट जाती थी। उसका हाथ कर्रा था और वह इस समय निस्तब्ध खड़ा रहा।

    स्त्री उठी। वह लगभग 45 वर्षीया थी, और उसका रंग गोरा होने पर भी आयु के धुँधलके में अब मैला-सा दिखने लगा था। उसको देखकर लगता था कि वह फुर्तीली थी। जीवन-भर कठोर मेहनत करने से, उसकी गठन के ढीले पड़ने पर भी उसकी फूर्ती अभी तक मौजूद थी।

    ''तुझे शरम नहीं आती, गदल?'' डोडी ने पूछा।

    ''क्यों, शरम क्यों आएगी?'' गदल ने पूछा।

    डोडी क्षणभर सकते में पड़ गया। भीतर के चौबारे से आवाज़ आई ''शरम क्यों आएगी इसे? शरम तो उसे आए, जिसकी आँखों में हया बची हो।''

    ''निहाल!'' डोडी चिल्लाया ''तू चुप रह!''

    फिर आवाज़ बंद हो गई।

    गदल ने कहा ''मुझे क्यों बुलाया है तूने?''

    डोडी ने इस बात का उत्तर नहीं दिया। पूछा ''रोटी खाई है?''

    ''नहीं, '' गदल ने कहा ''खाती भी कब? कमबख़्त रास्ते में मिले। खेत होकर लौट रही थी। रास्ते में अरने-कंडे बीनकर संझा के लिए ले जा रही थी।''

    डोडी ने पुकारा ''निहाल! बहू से कह, अपनी सास को रोटी दे जाए!''

    भीतर से किसी स्त्री की ढीठ आवाज़ सुनाई दी ''अरे, अब लौहरों की बैयर आई हैं; उन्हें क्यों ग़रीब खारियों की रोटी भाएगी?''

    कुछ स्त्रियों ने ठहाका लगाया।

    निहाल चिल्लाया ''सुन ले, परमेसुरी, जगहँसाई हो रही है। खारियों की तो तूने नाक कटाकर छोड़ी।''

    गुन्ना मरा, तो पचपन बरस का था। गदल विधवा हो गई। गदल का बड़ा बेटा निहाल तीस वर्ष के पास पहुँच रहा था। उसकी बहू दुल्ला का बड़ा बेटा सात का, दूसरा चार का और तीसरी छोरी थी जो उसकी गोद में थी।

    निहाल से छोटी तरा-ऊपर की दो बहिनों थी चंपा और चमेली, जिसका क्रमशः झाज और विश्वारा गाँवों में ब्याह हुआ था। आज उनकी गोदियों से उनके लाल उतरकर धूल में घुटरूवन चलने लगे थे। अंतिम पुत्र नारायन अब बाईस का था, जिसकी बहू दूसरे बच्चे की माँ बननेवाली थी। ऐसी गदल, इतना बड़ा परिवार छोड़कर चली गई थी और बत्तीस साल के एक लौहरे गूजर के यहाँ जा बैठी थी।

    डोडी गुन्ना का सगा भाई था। बहू थी, बच्चे भी हुए। सब मर गए। अपनी जगह अकेला रह गया। गुन्ना ने बड़ी-बड़ी कही, पर वह फिर अकेला ही रहा, उसने ब्याह नहीं किया, गदल ही के चूल्हे पर खाता रहा। कमाकर लाता, वो उसी को दे देता, उसी के बच्चों को अपना मानता, कभी उसने अलगाव नहीं किया। निहाल अपने चाचा पर जान देता था। और फिर खारी गूजर अपने को लौहरों से ऊँच समझते थे।

    गदल जिसके घर बैठी थी, उसका पूरा कुनबा था। उसने गदल की उम्र नहीं देखी, यह देखा कि खारी औरत है, पड़ी रहेगी। चूल्हे पर दम फूँकनेवाली की ज़रूरत भी थी।

    आज ही गदल सवेरे गई थी और शाम को उसके बेटे उसे फिर बाँध लाए थे। उसके नए पति मौनी को अभी पता भी नहीं हुआ होगा। मौनी रँडुआ था। उसकी भाभी जो पाँव फैलाकर मटक-मटककर छाछ बिलोती थी दुल्लो सुनेगी तो क्या कहेगी?

    गदल का मन विक्षोभ से भर उठा।

    आधी रात हो चली थी। गदल वहीं पड़ी थी। डोडी वहीं बैठा चिलम फूँक रहा था।

    उस सन्नाटे में डोडी ने धीरे से कहा ''गदल!''

    ''क्या है?'' गदल ने हौले से कहा।

    ''तू चली गई न?''

    गदल बोली नहीं। डोडी ने फिर कहा ''सब चले जाते हैं। एक दिन तेरी देवरानी चली गई, फिर एक-एक करके तेरे भतीजे भी चले गए। भैया भी चला गया। पर तू जैसी गई; वैसे तो कोई भी नहीं गया। जग हँसता है, जानती है?''

    गदल बुरबुराई ''जग हँसाई से मैं नहीं डरती देवर! जब चौदह की थी, तब तेरा भैया मुझे गाँव में देख गया था। तू उसके साथ तेल पिया लट्ठ लेकर मुझे लेने आया था न, तब? मैं आई