नन्हों

और अधिकशिवप्रसाद सिंह

    चिट्ठी-डाकिए ने दरवाज़े पर दस्तक दी तो नन्हों सहुआइन ने दाल की बटली पर यों कलछी मारी जैसे सारा कसूर बटुली का ही है। हल्दी से रँगे हाथ में कलछी पकड़े वे रसोई से बाहर आई और ग़ुस्से के मारे जली-भुनी, दो का एक डग मारती ड्योढ़ी के पास पहुँची।

    “कौन है रे!” सहुआइन ने एक हाथ में कलछी पकड़े दूसरे से साँकल उतार कर दरवाज़े मे झाँका तो डाकिए को देखकर धक् से पीछे हटी और पल्लू से हल्दी का दाग़ बचाते, एक हाथ का घूँघट खींचकर दरवाज़े की आड़ में छिपकली की तरह सिमट गई।

    “अपने की चिट्ठी कहाँ से आयेगी मुंशीजी, पता-ठिकाना ठीक से उचार लो, भूल-चूक होय गई होयगी”, वे धीरे से फुसफुसाई। पहले तो केवल उनकी कनगुरिया दिख रही थी जो आशंका और घबराहट के कारण छिपकली की पूँछ की तरह ऐंठ रही थी।

    “नहीं जी, कलकत्ते से किसी रामसुभग साहु ने भेजी है, पता-ठिकाना में कोई ग़लती नहीं...”

    “रामसु...” अधकही बात को एक घूँट में पीकर सहुआइन यों देखने लगी जैसे पानी का धक्का लग गया हो। केनगुरिया का सिरा पल्ले में निश्चेष्ट कील की तरह अड़ गया था— “अपने की ही है मुंशीजी...”

    मुंशीजी ने चिट्ठी आगे बढ़ाई, कनगुरिया फिर हिली, पतंगे की तरह फड़फड़ाती चिट्ठी को पंजे में दबोचकर नन्हों सहुआइन पीछे हटी और दरवाज़े को झटके से भेड़ लिया। आँगन के कोने में पानी रखने के चबूतरे के पास खड़ी होकर उन्होंने चिट्ठी को पढ़ा। रामसुभग रहा है, लिखा था चिट्ठी में। केवल तीन सत्र की इबारत थी पूरी। पर नन्हों के लिए उसके एक-एक अक्षर को उचारने मे पहाड़-सा समय लग गया जैसे। चबूतरे के पास कलसी के नीचे, पानी गिरने से ज़मीन नम हो गई थी, जौ के बीज गिरे थे जाने कब, इकट्ठे एक में सटे हुए उजले-हरे अँखुए फूटे थे। नन्हों सहुआइन एकटक उन्हें देखती रहीं बड़ी देर तक।

    पाँच साल का समय कुछ कम तो नहीं होता। लंबे-लंबे पाँच साल! पूरे पाँच साल के बाद आज रामसुभग को भौजी की याद आई है। पाँच साल में उसने एक बार भी कुशल-मंगल का हाल नहीं दिया। एक बार भी नहीं पूछा कि भौजी जीती है या मर गई। जब अपना ही नहीं रहा हाल-चाल लेनेवाला, तो दूसरा कौन पूछता है किसे? नन्हों सहुआइन ने चारपाई के पास से माची खीची और उस पर बैठ गई। हल्दी-सनी अंगुलियों के निशान ‘कार्ड’ पर उभर आए थे— जैसे वह किसी के शादी-ब्याह का न्यौता था। शादी-ब्याह का ख्य़ाल आते ही नन्हों सहुआइन की आँखें चलवे मछली-सी चिलक उठी। जाने कितनी बार सोचा है उन्होंने अपनी शादी के बारे में। कई बार सोचा, इस दु:ख दाई बात को फिर कभी सोचूँगी। जो भाग में था उस पर पछतावा क्या? पर वह औरत क्या जो अपनी शादी पर सोचे और एक ऐसी औरत जिसकी शादी उसकी ज़िंदगी का दस्तावेज़ बनकर आई हो, ज़िंदगी सिर्फ़ उसकी गिरो ही नहीं बनी उसने तो नन्हों के समूचे जीवन को रेतभरी परती की तरह वीरान कर दिया।

    गाँव की सभी औरतों की तरह नन्हों का भी ब्याह हुआ। उसकी भी शादी में वही हुआ जो सभी शादियों में होता है। बाजा-गाजा, हल्दी-सिंदूर, मौज-उत्सव, हँसी-रुला सब कुछ वही।

    एक बात में ज़रूर अंतर था कि नन्हों की शादी उसके मायके में नहीं, ससुराल में हुई। इस तरह की शादियाँ भी कोई नई नहीं हैं। जो ज़िंदगी के इस महत्त्वपूर्ण मौक़े को भी उत्साह और इच्छा के बावजूद रंगीनियों से बाँधने के उपकरण नहीं जुटा पाते वे बारात चढ़ाकर नहीं, डोला उतारकर शादी करते है। इसलिए नन्हों की शादी भी डोला उतारकर ही हुई तो इसमें भी कोई ख़ास बात तो नहीं हो गई। नन्हों का पति मिसरीलाल एक पैर का लँगड़ा था, पैदाइशी लँगड़ा। उसका दायाँ पैर जवानी में भी बच्चों की बाँह की तरह ही मुलायम और पतला था। डंडा टेककर फुदकता हुआ चलता। नाक-नक्श से कोई बुरा नहीं था, वैसे काला चेहरा उभरी हुई हड्डियों की वजह से बहुत वीरान लगता। घर में किराने की दुकान होती, जिसमें खाने-पीने के ज़रूरी सामानों के अलावा तम्बाकू, बीड़ी-माचिस और ज़रूरत की कुछ सब्ज़ियाँ भी बिकती। अक्सर सब्ज़ियाँ बासी पड़ी रहतीं, क्योंकि अनाज से बराबर के भाव ख़रीदने वाले अच्छे गृहस्थ भी मेहमान के आने पर ही इस तरह का सौदा किया करते।

    मिसरीलाल की शादी पक्की हुई तो नन्हों का बाप बड़ा ख़ुश था, क्योंकि मिसरीलाल के नाम पर जो लड़का दिखाया गया वह शक्ल में अच्छा और चाल-चलन में काफ़ी शौक़ीन था। लंबे-लंबे उल्टे फेरे हुए बाल थे, रंग वैसे साँवला था, पर एक चिकनाई थी जो देखने में ख़ूबसूरत लगती थी। इसीलिए लड़के वालों ने जब ज़ोर दिया कि हमें बारात चढ़ाके शादी सहती नहीं; डोला उतारेंगे, तो थोड़ी मीन-मेख के बाद नन्हों का बाप भी तैयार हो गया, क्योकि इसमें उसका भी कम फ़ायदा था। खर्चे की काफ़ी बचत थी।

    डोला आया, उसी दिन हल्दी-तेल की सारी रस्में बतौर टोटके के पूरी हो गईं और उसी रात को बाजे-गाजे के बीच नन्हों की शादी मिसरीलाल से हो गई। बाजों की आवाज़ें हमेशा जैसी ही ख़ुशी से भरी थी, मंडप की मंडियों और चँदोवे में हवा की ख़ुशीभरी हरकतें भी पूर्ववत् थी, भाटिनों के मंगल-गीत में राम और सीता के ब्याह की वही पवित्रता गूँज रही थी, पर नन्हों अपने हाथ भर के घूँघट के नीचे आँसुओं को सुखाने की कितनी कोशिश कर रही थी, इसे किसी ने देखा। एक भारी बदसूरत पत्थर को गले में बाँधे वह वेदना और पीड़ा के अछोर समुद्र में उतार दी गई जहाँ से उसकी सिसकियों की आवाज़ भी शायद ही सुनाई पड़ती।

    “कहो भौजी, बाबा ने देखा तो मुझको, एर शादी हुई मिसरी भैया की।”

    रामसुभग ने दूसरे दिन काने में बैठी नन्हों से मुसकराते हुए कहा, “अपना-अपना भाग है, ऐसी चाँद-सी बहू पाने की क़िस्मत मेरी कहाँ है?” भौजी मज़ाक के लिए बनी है, पर ऐसे मज़ाक का भी क्या जवाब? नन्हों की आँखों से झर-झर आँसू गिरने लगे जिन्हें वह पूरे चौबीस घंटे से लगातार रोके हुए थी। रामसुभग बिलकुल घबरा गया, उसने दुःखी करने के लिए ही चोट की थी, पर घायल सदा पंख समेटे शिकारी के चरणों में ही तो नहीं गिरता, कभी-कभी खून की बूँदें भर गिरती हैं। और पंछी तीर को सीने में समाए ही उड़ता जाता है।

    “ठीक कहा लाला तुमने, अपना-अपना भाग ही तो है...” नन्हों ने कहा और चुपचाप पलकों से आँसुओ की चट्टानों को ठेलती रही।

    रामसुभग मिसरीलाल का ममेरा भाई है। अक्सर वह यही रहता, एक तो इसलिए कि उसे अपना घर पसंद था। बाप सख्त़ी से काम कराता, और आना-कानी की तो बूढ़े बाप के साथ दूसरे भाइयों का मिला-जुला क्रोध उसके लिए बहुत भारी पड़ता। दूसरे, मिसरीलाल का भी इरादा था कि वह अक्सर यहाँ आता-जाता रहे ताकि उसे दुकान के लिए सामान वग़ैरह ख़रीदवाने में आसानी पड़े। रामसुभग के लिए मिसरीलाल का घर अपना जैसा ही था। उसने मिसरीलाल की शादी की बात सुनी तो बड़ा ख़ुश हुआ था कि घर में एक औरत जाएगी, थोड़ी चहल रहेगी और मुरव्वत में अक्सर जो उसे चूल्हा फेंकने का काम भी कर देना पड़ता, उससे फुर्सत मिल जाएगी। पर नन्हों को देखकर रामसुभग को लगा कि कुछ ऐसा हो गया है जैसा कभी सोचा था। नन्हों वह नहीं है जिसे मिसरीलाल की औरत के रूप में देखकर उसे कुछ अड़चन मालूम हो। वह काफ़ी विश्वास के साथ आया था नन्हों से बात करने, उसे जता देने कि रामसुभग भी कुछ कम नहीं है, मिसरीलाल का बड़ा आदर मिलता है उसे, यह घर जैसे उसी के सहारे टिका है और भौजी के लिए रामसुभग-सा देवर भी कहाँ मिलेगा, और शादी के पहले तो नन्हों के बाप ने भी उसे ही देखा था ...पर जाने क्या है नन्हों की उस झुकी हुई आँखों में कि रामसुभग सब भूल गया। चारपाई के नीचे बिछी रंगीन सुहागी चटाई पर पैरों को हाथ में लपेटे नन्हों बैठी थी गुड़ीमुड़ी, उसकी लंबी बरौनियाँ बारिश में भीगी तितली के पैरों की तरह नम और बिखरी थीं और वह एकटक कहीं देख रही थी, शायद मन के भीतर किसी बालियों से लदी फ़सल से ढके लहराते हुए एक खेत को, जिसमें किसी ने अभी-अभी जलती हुई लुकाठी फेंक दी है।

    रामसुभग बड़ी देर तक वैसे ही चुप बैठा रहा। वह कभी आँगन में देखता था कभी मुँडेरे पर। वह चाहता था कि इस चुप्पी को नन्हों ही तोड़े, वही कुछ कहे, अपने मन से ही जो कहना ठीक समझे, क्योंकि उसके कहने में शायद बात कुछ ठीक बने, बने, पर नन्हों तो कुछ बोलती ही नहीं।

    ब्याह के दूसरे दिन के रसम-रिवाज़ पूरे हो रहे थे, कमारी डाले मे अक्षत-सिन्दूर लेकर गाँव की तमाम सत्तियों के चौरे पूज आई थी, और सबसे मिसरीलाल की मृत माँ की ओर से वर-वधु के लिए आशीर्वाद माँग आई थी। रात-भर गाने से थकी हुई भाटिनें अपने मोटे और भोंड़े स्वरों में अब भी राम और सीता की जोड़ी की असीसें गा रही थी। कुछ बचे-खुचे लोग एक तरफ़ बैठे खा रहे थे, पुरवे-पत्तल इधर-उधर बिखरे पड़े थे।

    “अच्छा भौजी...” रामसुभग इस मौन को और झेल सका। चुपचाप उठकर आँगन में चला आया।

    “क्या बबुआ, भौजी पसंद आई?” एक मनचली भाटिन ने मोटी आवाज़ में पूछा।

    “हाँ, हाँ, बहुत...” रामसुभग इस प्रश्न की चुभन को भाँप गया था। उसने मुस्कराने की कोशिश की, पर गर्दन ऊपर उठ सकी। वह चुपचाप सिर झुकाए दालान में जाकर मिसरीलाल के पास चारपाई पर बैठ गया। उस समय मिसरीलाल दो-एक नाते-रिश्ते के लोगों से बातें कर रहा था। पीले रंग की धोती उसके काले शरीर पर काफ़ी फब रही थी, पर उसके चेहरे की वीरानी में कोई अंतर था, ख़ुशी उसके चेहरे पर ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने जंग लगी पिचकी डिबिया में कपूर रख दिया हो। उसके दाहिने हाथ का कंगन एक मरे हुए मकड़े की तरह झूल रहा था...जाने क्यों आज रामसुभग को मिसरीलाल बहुत बदसूरत लग रहा था, शादी के कपड़ों में कोई ऐसा भद्दा लगता है, यह रामसुभग ने पहली बार देखा।

    “सुभग”, मिसरीलाल ने बातचीत से निपटकर दालान में एकांत देखकर पूछा, “क्यों रे भौजी कैसी लगी— सच कहना, अपनों से क्या दुराव—गया था न, कुछ कह रही थी?

    “नहीं तो” रामसुभग ने कहा, “काफ़ी हँसमुख है, वैसे मायका छूटने पर तो सभी दुलहिने थोड़ी उदास रहती हैं। मिसरीलाल अजीब तरीके से हँसा, “अरे वाह रे सुम्भू, तू तो भई दुलहिने पहचानने में बेजोड़ निकला। उदास क्यों लगती है भला वह? किसी परिवार वाले घर में जाती, सास-जिठानियों की धौंस से कलेजा फट जाता, दिन-रात काँव-काँव, यहाँ तो बस दो परानी है, राज करना है, है कि नहीं?”

    “हूँ”, रामसुभग गर्दन झुकाए चारपाई के नीचे देख रहा था, उसने वैसे ही हामी भर दी जैसे उसने पूरी बात सुनी ही हो।

    “मीसरी साह!” दरवाज़े से कमारी ने पुकारा, “बाबाजी बुला रहे हैं चौके पर कंगन छूटने की साइत बीत रही है।” मिसरीलाल धीरे-से उठे और फुदकते हुए चौके पर जा बैठे। लाल चुनर में लपेटे, गुड़िया की तरह उठाकर नन्हों को कमारी ले आई और उसने मिसरीलाल की बग़ल में बिठा दिया।

    मिसरीलाल की शादी हुए एक सतवारा बीत चुका था। इस बीच जाने कितनी बार रामसुभग नन्हों के पास बैठा। नन्हों के पास बैठने में उसे बड़ी घुटन महसूस होती, उसे हर बार लगता कि वह ग़लती में गया, उसका मन हर बार एक अजीब क़िस्म की उदासी से भर जाता। वह सोचता कि अब उसके पास नहीं जाऊँगा, जो होना था सो हो गया, पर उसका जी नहीं मानता। नन्हों ने इस बीच मुश्किल से उससे दो-चार बातें की होगी। कभी शायद ही उसकी ओर देखा होगा, पर पता नहीं उन झुकी हुई बरौनियों से घिरी आँखों में कैसा भाव है कि रामसुभग खिंचा चला आता है। वे आँखें उसे कभी नहीं देखतीं, कहीं और देखतीं हैं, पर उनका इस तरह देखना रामसुभग के मन में आँधी की तरह घुमड़ उठता है। वह बार-बार सोचता कि शायद नन्हों के बाप के सामने वह दूल्हा बनकर खड़ा होता तो नन्हों आज यहाँ होती। झुकी हुई पलकों से घिरी इन आँखों की पीड़ा उसी की पैदा की हुई है। वही दोषी है, वही अपराधी है! रामसुभग इसीलिए नन्हों के पास जाने को विकल हो उठता है पर पास पहुँचने पर यह विकलता कम नहीं होती। उसकी माँ ने बहू को “मुँह दिखाई” देने के लिए दो रुपए न्योता के साथ भेजे थे, पर नन्हों को देखकर उसकी हिम्मत होती कि वे रुपए माँ की ओर से उसे दे दे। वह बाज़ार से सिल्क का एक रूमाल भी ख़रीद लाया। रुपए उसी में बाँध लिए। पर रूमाल हमेशा उसकी जेब में पड़ा रहा, वह उसे नन्हों को दे सका।

    “क्यों लाला, इतने उदास क्यों हो?” एक दिन पूछा था नन्हों ने, “यहाँ मन नहीं लगता, भाई-भौजाइयों की याद आती होगी.”

    “नहीं तो, उदास कहाँ हूँ, तुम जो हो,” रामसुभग ने मुसकराते हुए कहा।

    “मैं...हाँ, मैं तो हूँ ही, पर लाला, मैं तो दुःख की साझीदार हूँ, सुख कहाँ है अपने पास जो दूसरों को दूँ? उदासी में पली, उदासी में ही बढ़ी। जन्मी तो माँ मर गई, बड़ी हुई तो बाप का बोझ बनी। मैं भला दूसरे की उदासी क्या दूर कर सकूँगी...”

    “देखो भौजी...” रामसुभग ने पूर