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प्रथम आदि ओंकार तीन ग्राम चौदह सुर
प्रथम आदि ओंकार तीन ग्राम चौदह सुर,जब-जब पावत गुनी जन कर-कर विचार।
गोपाल
काहे को रोकत मारग सूधो
ताको कहा परेखो कीजै जानत छाछ न दूधौ।सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेरत ऊधौ॥
सूरदास
हरि, तेरी लीला की सुधि आवै
हरि, तेरी लीला की सुधि आवै।कमल नैन मन-मोहनि मूरति, मन-मन चित्र बनावै॥
परमानंद दास
चेतन तैं सब सुधि बिसरानी भइया
चेतन तैं सब सुधि बिसरानी भइया।झूठौं जग सांचौ करि मान्यौ, सुनी नहीं सतगुरु की बानी भइया।
बख्तराम साह
वारी थारा मुखड़ा की श्याम सुजान
अनियारी अँखिया रसभीनी बाँकी भौंह कमान॥दाड़िम दसन अधर अरुणारे बचन सुधा सुखखान।
प्रतापबाला
अमृत निचोय कियो इकठोर
अमृत निचोय कियो इकठोर।तुम्हरे वदन सुढार सुधा निधि तबतें विधना रची न ओर॥
परमानंद दास
जागिए, ब्रजराज कुँवर
बिधु मलीन रवि प्रकास गावंत नर नारी।सूर स्याम प्रात उठौ, अंबुज-कर-धारी॥
सरस्वती वंदना
संभृत जुग जनु सुधा संपुट विशव सकल विहारनी।अद्भुत अनूपं मराल आसनि जयति जय जगतारनी॥
मान कवि
गिरिधर आवत गांइनि पाछैं
चंदन चरतित नील कलेवर, बेनु बजावत आछैं।‘कुंभनदास' प्रभु अधर-सुधा पीवत, को चाहै छाछैं॥
कुंभनदास
श्री गुरु पद नख वंदना
सोभित सलौने सुभ्र सरस सुधा सों सने,सील सिंधु रूप लसें जिन सम चंद ना।
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी
हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास
प्रतिबिंब तरल कपोल कमनी जुग तरौना कान।सुधा-सागर मध्य बैठे, मनों रबि जुग न्हान॥
चाचा हितवृंदावनदास
ऊधो! कोकिल कूजल कानन
सुन्दरस्याम मनोहर मूरति भावति नीके गानन।सूर मुकुति कैसे पूजति है वा मुरली की तानन॥