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राम सुमिरण करीय अभागी
राम सुमिरण करीय अभागी।त्रिभुवन नाथ सीता पति राघव, हृदय कमल में धरीय अभागी॥
केशवस्वामी
कलियुग के हनुमान
त्रेतायुग में कूदि पार कीन्हो हम सागर।सीता की सुधि लाय कियो निज नाम उजागर।
बालमुकुंद गुप्त
सीतानाथ विनय चित धारौ
रुकमिनी टेर सुनत झट थाए, गही बाँह अपनाई।सीता हरी दुष्ट रावन जब, लाये जीति लराइ॥
रत्नावली
इत उत घूमति बाग मृगा
सीता बूझति सखिन नाम तरु लता बिटप कर।चहति न नेक बिछोह प्रीति पथ दृढ़ि अति तत्पर॥
बनादास
कवितावली (उत्तर कांड से) (एन.सी. ई.आर.टी)
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥
तुलसीदास
दसहरा मुबारिक होय तुमकौं
बैजू
दानघाटी छाक आई गोकुलते
परमानंद दास
बड भागण हरि हिवड़े लगाई ए
बड भागण हरि हिवड़े लगाई ए।पुण्य पुरबला म्हारा प्रगट भया, मधुर-मधुर सुर मुरली सुणाई ए॥
रानाबाई
ए हरि, बंदओं तुअ पद नाए
जतने जतेक धन पाएँ बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाए।मरनक बेरि हरि केओ नहि पूछए एक करम सँग जाए॥
विद्यापति
भैया हो! अबहु छाक नहीं आई
भैया हो! अबहु छाक नहीं आई।भाई अबेर भूख लागी है, काहै बेर लगाई॥