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ब्रज की नारी डोल झुलावैं
ब्रज की नारी डोल झुलावैं।सुख निरखत मन मैं सचु पावें मधुर-मधुर कल गावैं॥
नंददास
डोल झुलावत सब ब्रज सुंदरि
डोल झुलावत सब ब्रज सुंदरि, झूलत मदन गुपाल।गावत फागु धमार हरखि भरि हलधर औ सब ग्वाल।
नंददास
माल गल तुलसी दल की
माल गल तुलसी दल की नंदलाल लिए मुरली विहरें वन।प्रान पिया के हिया कौ हर हँसि होति सुखी ललितादि सखीगन॥
हरिचरणदास
अरी! चली दूलह देखनि जाय
अरी! चली दूलह देखनि जाय।सुंदर स्याम माधुरी मूरति, अंखियां निरखि सिरायं॥