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प्रान प्यारे! कुंवर नैकु गाइयै
प्रान प्यारे! कुंवर नैकु गाइयै।आनन कमल अधर सुंदर धरि, मोहन बेनु बजाइयै॥
छीतस्वामी
श्री बंसीअलि प्रान हमारे
श्री बंसीअलि प्रान हमारे।हृदय-कमल-संपुट करि राखूँ, अँखियन के बर तारे॥
अलबेलीअलि
स्याम सुंदर प्रान-पियारे
स्याम सुंदर प्रान-पियारे! छिनुजिनि होहु नि न्यारे।नेकु की ओट मीन ज्यों तलफत इनि नैननि के तारे॥
चतुर्भुजदास
यमुना पर तन मन प्राण वारों
यमुना पर तन मन प्राण वारों।जाकी कीर्ति विशद कौन अब कहि सके ताहि, नैनन ते नेकु न टारों॥
कुंभनदास
प्रीतम, तूं मोहि प्रान तें प्यारो
प्रीतम, तूं मोहि प्रान तें प्यारो।जो तोहिं देखि हियो सुख पावत, सो बड़ भागिनवारौ?
नारायण स्वामी
श्री यमुना वंदना
या ही आन-बान कौं सु धारियै श्री यमुनेपातक अनेक एक आसरौ तिहारौ बड़ौ
यमुना प्रसाद चतुर्वेदी
सरस्वती वंदना
बिधु सकल कल संजुत्त बदनी चिबुक गाड़ सु-चाहियै।बिद्रुम कि बधूजीव वर्णों सहज अधर सराहियै॥
मान कवि
भ्रमरदूत
सुधि-बुधि तजि, माथौ पकरि, करि-करि सोच अपार।दृगजल मिस मानहुँ निकरि, बही बिरह की धार॥
सत्यनारायण कविरत्न
बारहमासा
नहिं लागु सासुर संक हे सखि, रंक जनु राजा भयो।निज नाह मिलियो बाँह ग्रिव दै, सकल कलमख दुरि गयो॥
धरनीदास
भंवरगीत (कृष्ण-प्रति उपालंभ)
मन में कहि रज पायं को लै माथै निज धारि।परम कृतारथ है रहौं त्रिभुवन-आनंद बारि॥
नंददास
जगमग सिय मंडप में मंगल मचि
दोउ परस्पर अमिय से बनि रहे गर के हार।सुमनन की वरषा भई गरजन की बलिहार॥
हरिहर प्रसाद
भरत-राम का प्रेम (एन.सी. ई.आर.टी)
राघौ! एक बार फिरि आवौ।ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ॥
तुलसीदास
कवितावली (उत्तर कांड से) (एन.सी. ई.आर.टी)
तुलसीदास
ओं आप ही आप आप उपन्ना
गोरखनाथै हितकर सिरजी, भव भव री आहूल।बडा बडी हूं धरती कुहाय, कोड़ निन्नाणवै भोपतराय औरां दस अर बीस।
जसनाथ
श्री सरस्वती वंदना
‘प्रीतम’ सुकवि रस रसना रसैगी जब,आय निबसैगी हिय-हँस की सबारी पै।