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यह विधि सचु सों रैनु बिहानी
यह विधि सचु सों रैनु बिहानी।बहुत दिनन के बिछुरे प्रीतम, मिले सकल सुखदानी॥
गोस्वामी हरिराय
आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत है
भल न कहल गउरा रउरा प्राजु सु नाचब हे।सदा सोच मोहि होत कबन विधि बाँचब हे ॥
विद्यापति
पिया, जब देखी मैं फुलवरियाँ
धनुष भंगि पितु नेम प्रेम राखि लियो विधि भलियाँ।सो इच्छा इकात बिहरन अब पुरई भुज गर डलियाँ॥
सुधाकर द्विवेदी
कोकिल अब क्यों मौन गही
कोकिल अब क्यों मौन गही?बहु विधि फूल विपिन में फूले मंद समीर बही॥
बालमुकुंद गुप्त
चंद्रबदनी मृगनैनी तारा मध्य तारिका गंग
चंद्रबदनी मृगनैनी तारा मध्य तारिका गंग,पूतरी कालिंदी, इहि विधि डोरे बनाय कीन्हीं तिरबैंनी।
तानसेन
श्री हितहरिवंश गोसाईं जी
विधि निषेध नहिं दास अनन्य उत्कट व्रतधारी॥व्यास सुवन पथ अनुसरै सोई भले पहिचानिहै।
नाभादास
जगमग सिय मंडप में मंगल मचि
सोरह विधि शृंगार मदन मत में कहे।अनायास ते सिय अंगन में सजि रहे॥
हरिहर प्रसाद
आपुन पै आपुन ही सेवा करत
आपुने धरम करम सब आपुने, आपुनिय विधि अनुसरतछीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल, भक्तबछल भयहरन॥
छीतस्वामी
हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास
मंद मुसुकनि, दसन दमकनि दामिनी दुति हरी।‘बृंदावन हित’ रूप स्वामिनी कौन विधि रचि करी॥
चाचा हितवृंदावनदास
अरी हौ रामा रंग रची
विधिना विधि सो निर्मयो अलि मोहन को फंद।लोकवेद की लाज सखी री यद्यपि दुस्तर आहि॥
स्वामी अग्रदास
तनक कनक को दोहनी दे री मैया
सकुचित सब मन हरि लियो हंसि घोख बिहारी॥दुज बुलाय दच्छिना दई बहु विधि मंगल गावै।
परमानंद दास
जय श्री वल्लभ राजकुमार
निज मति सुदृढ़ कृत हरिपद, नव विधि भजन प्रकार।निज मुख कथित कृष्णलीलामृत, सकल जीव निस्तार॥
छीतस्वामी
हरि-दासन के निकट न आवत
ग्रह गत्रेस सुरेस सिवा-सिव डर करि भागत भूत।सिधि-निधि-विधि-निषेध हरिनामहिं डरपत रहत कपूत॥
हरीराम व्यास
सरद ऋतु सुभजानि अनूपम
केसर सौंधी धोरि जननी प्रथम लाल अन्हवायो री।नाना विधि के भूखन अभरन अंग सिंगार बनायो री॥