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इक बाहर इक भीतर
इक बाहर इक भीतर, इक मृद दुहु दिसि पूर।सोहत नर जग त्रिविधि ज्यों, बेर बदाम अँगूर॥
दीनदयाल गिरि
बाहिर भीतरि सारिषौ
बाहिर भीतरि सारिषौ, ब्यापक ब्रह्म अखंड।सुन्दर अपने भाव तें, पूरि रह्यौ ब्रह्मंड॥
सुंदरदास
नवरस नित्य-बिहार में
नवरस नित्य-बिहार में, नागर' जानत नित्त।‘भगवतरसिक' अनन्य वर, सेवा मन बुधि चित्त॥
भगवत रसिक
ऐसे बड़े बिहार सों
ऐसे बड़े बिहार सों, भागनि बचि-बचि जाय।सोभा ही के भार सों, बलि कटि लचि-लचि जाय॥
रामसहाय दास
पंचहँ णायकु वसिकरहु
पंचहँ णायकु वसिकरहु, जेण होंति वसि अण्ण।मूल विणट्ठइ तरुवरहँ, अवसइँ सुक्कहिं पण्णु॥
जोइंदु
रूवि पयंगा सद्दि मय
रूवि पयंगा सद्दि मय, गय फांसहि णासंति।अलि-उल गंधहि मच्छ रसि, किमि अणुराउ करंति॥
जोइंदु
बलि किउ माणुस जम्मडा
बलि किउ माणुस जम्मडा, देक्खंतहँ पर सारु।जइ उट्टब्भइ तो कुहइ, अह डज्झइ तो छारु॥
जोइंदु
उब्बस वसिया जो करइ
उब्बस वसिया जो करइ, वसिया करइ जु सुण्णु।वलि किज्जउँ तसु जोइयहिं, जासु ण पाउ ण पुण्णु॥
जोइंदु
देउल देउ वि सत्थु गुरु
देउल देउ वि सत्थु गुरु, तित्थु वि वेउ वि कब्बु।बच्छु जु दोसै कुसुमियउ, इंधणु होसइ सब्बु॥
जोइंदु
जो जिण सो हउँ, सोजि हउँ
जो जिण सो हउँ, सोजि हउँ, एहउ भाउ णिभंतु।मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु॥
जोइंदु
संता विसय जु परिहरइ
संता विसय जु परिहरइ, बलि किज्जउँ हउँ तासु।सो दइवेण वि मुंडियउ सीसु खडिल्लउ जासु॥
जोइंदु
सो सिउ-संकरु विण्हु सो
सो सिउ-संकरु विण्हु सो, सो रुद्द वि सो बुद्ध।सो जिणु ईसरु बंभु सो, सो-अणंतु सो सिद्ध॥
जोइंदु
नागरी ते आगरी भली
नागरी ते आगरी भली, नागरी सागरी संग।बूँद परा एह सिंधु में, कौन परिखे रंग॥
दरिया (बिहार वाले)
जीव बधन राधन करे
जीव बधन राधन करे, साधन भैरो भूत।जन्म तुम्हारा मृथा है, श्वान सूकर का पूत॥