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श्री रघुनंदन नाम नित
श्री रघुनंदन नाम नित, करे जो कोटि उचार।ताते अधिक प्रसन्न पिय, सुनि सिय एकहु बार॥
युगलान्यशरण
‘तुलसी’ श्री रघुवीर तजि
‘तुलसी’ श्री रघुवीर तजि, करौ भरोसौ और।सुख संपति की का चली, नरकहुँ नाहीं ठौर॥
तुलसीदास
बंदौ श्री सुकदेव जी
बंदौ श्री सुकदेव जी, सब बिधि करो सहाय।हरो सकल जग आपदा, प्रेम-सुधा रस प्याय॥
दयाबाई
श्री बृषभानु-कुमारि के
श्री बृषभानु-कुमारि के, पग बंदौ कर जोर।जे निसिबासर उर धरै, ब्रज बसि नंद-किसोर॥
श्री हठी
श्री सरजू तट पुलिन मधि
श्री सरजू तट पुलिन मधि, निसा उजारी माँह।हे सिय कहि कब बिवस ह्वै, रहिहों दुति द्रुम छाँह॥
युगलान्यशरण
तू गृह श्री ही धी रतन
तू गृह श्री ही धी रतन, तू तिय सकति महान।तू अबला सबला वनै, धरि उर सति विधान॥
रत्नावली
श्री यदुपति के भुज युगल
श्री यदुपति के भुज युगल, छाजि रहे छवि भौन।निरखत जिनहिं भुजंगवर, लजि पताल किय गौन॥
रघुराजसिंह
श्री जानकि-पद-कंज सखि
श्री जानकि-पद-कंज सखि, करहि जासु उर ऐन।बिनु प्रयास तेहि पर द्रवहि, रघुपति राजिव नैन॥
भक्त रूपकला
श्री को उद्यम तें बिना
श्री को उद्यम तें बिना, कोऊ पावत नाहि।लिए रतन प्रति जतन सों, सुर असुरन दधि माहि॥
दीनदयाल गिरि
बहुरि त्रिपाद विभूति
बहुरि त्रिपाद विभूति ये, श्री, भू, लीला, धाम।अवलोकहु रमनीक अति, अति विस्तरित ललाम॥
प्रेमलता
श्री गोबिंद के गुनन तेहिं
श्री गोबिंद के गुनन तेहिं, भनत रहौ दिन-रैन।'दया' दया गुरदेव की, जासूँ होय सुबैन॥
दयाबाई
राग द्वेष तें रहित हैं
राग द्वेष तें रहित हैं, रहित मान अपमान।सुन्दर ऐसेै संतजन, सिरजे श्री भगवान॥
सुंदरदास
सोगति दंडक बिपिन
सोगति दंडक बिपिन मुनि, भइ रघुबरहि निकारि।याते अद्भुत रूप श्री, रामहि को निरधारि॥
रसिक अली
मुकुर मांह परछांइ ज्यौं
मुकुर मांह परछांइ ज्यौं, पुहुप मधे ज्यों बास।तैसउ श्री हरि बसै, हिरदै मधे रैदास॥
रैदास
महा मधुर रस धाम श्री
महा मधुर रस धाम श्री, सीता नाम ललाम।झलक सुमन भासत कबहुँ, होत जोत अभिराम॥
युगलान्यशरण
अड़सठ तीरथ में फिरे
अड़सठ तीरथ में फिरे, कोई बधारे बाल।हिरदा शुद्ध किया बिना, मिले न श्री गोपाल॥