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तो कारन गृह-सुख तजे
तो कारन गृह-सुख तजे, सह्यो जगत कौ बैर।हमसों तोसों मुरलिया, कौन जनम कौ घैर॥
नागरीदास
मोहन मन द्वें हें अजित
मोहन मन द्वें हें अजित, सब कहि साँची बात।सोऊ सदबस प्रेम के, सहज अती ह्वेँ जात॥
दयाराम
बाघ करें नह कोट बन
बाघ करें नह कोट बन, बाघ करे नह बाड़।बाघा रा बघवार सूं, झिले अंगजी झाड़॥
कविराजा बाँकीदास
करें भक्ति भगवंत की
करें भक्ति भगवंत की, कबहुं करै नहिं चूक।हरि रस में राचो रहै, साँची भक्ति मलूक॥
मलूकदास
पीछे निन्दा जो करें
पीछे निन्दा जो करें, अरु मुख पैं सनमान।तजिए ऐसे मीत को, जैसे ठग-पकवान॥
दीनदयाल गिरि
परे कालमुख नर करें
परे कालमुख नर करें, भोग विषै सुख चाव।ज्यों दादुर अहिदन दषि, करत मसन पर घाव॥
दीनदयाल गिरि
ढपें दोष गुन फुट करें
ढपें दोष गुन फुट करें, पर हरिजन यह चाल।लखि शिव दुहु दधि तें लहे, गरल गिल्यो शशिभाल॥
दयाराम
संत दिवाली नित करें
संत दिवाली नित करें, सतलोक के माहिं।और मते सब काल के, योहिं धूल उड़ाहिं॥
संत शिवदयाल सिंह
हौं तो करि विनती दियो
हौं तो करि विनती दियो, कंचन काँच बताई।इनमें जाको मन रुचै, सोई लेहु उठाइ॥
ध्रुवदास
जइ ससणेही तो मुइअ
जइ ससणेही तो मुइअ अह जीवइ निन्नेह।विहिं वि पयारेंहिं गइअ धण किं गज्जहिं खल मेह॥