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बारबधू हिय की उमग
बारबधू हिय की उमग, चली सु पति के पास।चित उदार, कहँ रसिकमनि, बोली बचन निरास॥
दौलत कवि
उतम पुरुषन की सभा
उतम पुरुषन की सभा, रहिये निसदिन चाहि।मूढ़ नरन संग जो रहै, घटि जैहैं बुधि ताहि॥
जान कवि
श्रवन सु पी गुन रूप की
श्रवन सु पी गुन रूप की, सुनत बात सुख होय।जैसौ बरनै रूप सखि, नैननि राखै गोय॥
दौलत कवि
अंग मोतिन के आभरन
अंग मोतिन के आभरन, सारी पहिरैं स्वेत।चली चाँदनी रैन में, प्रिया प्रानपति हेत॥
दौलत कवि
रिसु कै बस ना हूजिए
रिसु कै बस ना हूजिए, कीजै बात बिचार।पुनि पछिताये ह्वै कहा, जो ह्वै जाइ बिगार॥
जान कवि
तीन भाँति के द्रुजन हैं
तीन भाँति के द्रुजन हैं पंडित कहत बिचित्र।अप बैरी, बैरी सजन, पुनि द्रुजनन कौ नित्र॥
जान कवि
हँसि हँसि परिहै आपुही
हँसि हँसि परिहै आपुही, बिनु हाँसी की ठौर।ताते रोवन है भलौ कहत गुनी सिरिमौर॥
जान कवि
पति आयौ सुनि बाल तन
पति आयौ सुनि बाल तन, हरष बढ़्यौ सु अलेख।घूँघट पट की ओट मुख, रही इक टकैं देख॥
दौलत कवि
जा दिन तैं चरचा भई
जा दिन तैं चरचा भई, तुमहि चलन की लाल।बिसरि गई बोलनि हसनि, ता दिन तैं वह बाल॥
दौलत कवि
दुष दै को न रुसाइये
दुष दै को न रुसाइये, कहत जान सुन मित्त।ये ते फूटे ना जुरैं, सीसा मुकता चित्त॥
जान कवि
रचत रहैं भूषन बसन
रचत रहैं भूषन बसन, मो मुख लखै सुहाय।ज्यौं-ज्यौं सब कै बस भये, त्यौं-त्यौं रहौं लजाय॥
दौलत कवि
ताकौं ढील न कीजिए
ताकौं ढील न कीजिए ह्वै जु धरम को काजु।को जानैं कल ह्वै कहा करिबो सो करि आजु॥
जान कवि
क्यौं नहिं आयौ, बारबधु
क्यौं नहिं आयौ, बारबधु, कहि अंगरात जँभात।राग अलापैं धन मिलै, नैन पुलैं पछितात॥