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हर दम हर दम हक्क तूं
हर दम हर दम हक्क तूं, लेइ धनी का नांव।सुन्दर ऐसी बंदगी, पहुंचावै उस ठांव॥
सुंदरदास
सुन्दर सिरजनहार कौं
सुन्दर सिरजनहार कौं, क्यौं न गहै विस्वास।जीव जंत पोखै सकल, कोउ न रहत निरास॥
सुंदरदास
संतनि की निंदा कियें
संतनि की निंदा कियें, भलौ होइ नहिं मूलि।सुन्दर बार लगै नहीं, तुरत परै मुख धूलि॥
सुंदरदास
सुन्दर क्यौं करि धीजिये
सुन्दर क्यौं करि धीजिये, मन कौ बुरौ सुझाव।आइ बनै गुदरै नहीं, पेलै अपनौ दाव॥
सुंदरदास
सुन्दर भूल्या क्यौं फिरै
सुन्दर भूल्या क्यौं फिरै, सांई है तुझ मांहिं।एक मेक ह्वै मिलि रह्या, दूजा कोई नांहिं॥
सुंदरदास
सुन्दर सद्गुरु क्यौं द्रसै
सुन्दर सद्गुरु क्यौं द्रसै, शिष की दृष्टि मलीन।देखत हैं सब देह कृत, खान पान सौं लीन॥
सुंदरदास
सुंदर गाफिल क्यौं फिरै
सुंदर ग़ाफ़िल क्यौं फिरै, साबधान किन होय।जम जौरा तकि मारि है, घरी पहरि मैं तोय॥
सुंदरदास
ताकी पूरी क्यों परे
ताकी पूरी क्यों परे, जाके गुरु न लाखई बाट।ताके बेड़ा बूड़ि हैं, फिरि-फिरि औघट घाट॥
कबीर
‘लालू’ क्यूँ सूत्याँ सरै
‘लालू’ क्यूँ सूत्याँ सरै, बायर ऊबो काल।जोखो है इण जीव नै, जँवरो घालै जाल॥
लालनाथ
सुंदर बैठा क्यौं अबै
सुंदर बैठा क्यौं अबै, उठि करि मारग चालि।कै कछु सुकृत कीजिये, कै भगवंत संभालि॥
सुंदरदास
कृपन होत क्यों कृपाकर
कृपन होत क्यों कृपाकर, तनक देत नहिं खोट।दीनपात्र हों दिहू दया, दान खांन इक कोट॥
दयाराम
सुन्दर क्यौं टेढौ चलै
सुन्दर क्यौं टेढौ चलै, बात कहै किन मोहि।महा मलीन शरीर यह, लाज न उपजैं तोहि॥
सुंदरदास
लटपटाति पग धरति क्यों
लटपटाति पग धरति क्यों, बिछुरे यह किमि केश।चकित सुनत भइ चातुरी, कहहु जमाल बिसेस॥
जमाल
कमल हार झीने बसन
कमल-हार, झीने बसन, मधुर बेनु अब छाँड़ि।मौलि-माल, बज्जर कवच, तुमुल-संख कवि, माँड़ि॥
वियोगी हरि
दुग्ध नीर निंज सम कियों
दुग्ध नीर निंज सम कियों, आदि बर्यो बन लागि।उछरी पय पावक परी, बुझ यों धनि अनुरागि॥
दयाराम
संगति दोष न होति क्यौं
संगति दोष न होति क्यौं, रहि प्रेतन के पास।शिव! शिव! शिव हूको भयो, चिता भूमि में बास॥
भूपति
केसरि कै सरि क्यौं सकै
केसरि कै सरि क्यौं सकै, चंपकु कितकु अनूपु।गात-रूप लखि जातु दुरि, जातरूप कौ रूपु॥
बिहारी
हरि कौ सुमिरौ हर घरी
हरि कौ सुमिरौ हर घरी, हरि-हरि ठौर जुबान।हरि बिधि हरि के ह्वै रहो, रसनिधि संत सुजान॥