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केहू विधि नहिं छोड़िये
केहू विधि नहिं छोड़िये, निज स्वभाव रो सोध।जलधर जल बरसो करै, कहा कूर गृह रोध॥
भूपति
विधि विधि कै सब विधि
विधि विधि कै सब विधि जपत, कोऊ लहत न लाल।सो विधि को विधि नंद घर, खेलत आप जमाल॥
जमाल
साधन करहिं अनेक विधि
साधन करहिं अनेक विधि, देहिं देह कौं दंड।सुन्दर मन भाग्यौ फिरै, सप्त दीप नौ खंड॥
सुंदरदास
मलिया सिंची विविध विधि
मलिया सींची विविध विधि, रतनलता करि प्यार।नहिं वसंत आगम भयो, तब लगि पर्यो तुसार॥
रत्नावली
विधि कपोल टिकिया करी
विधि कपोल टिकिया करी, तहँ तिल धरो बनाय।यह मन छधित फकीर ज्यों, रहैं टकटकी लाय॥
मुबारक
यंत्र मंत्र बहु विधि करे
यंत्र मंत्र बहु विधि करै, झाडा बूंटी देत।सुन्दर सब पाखंड है, अंति पडै सिर रेत॥
सुंदरदास
लई सुधा सब छीनि विधि
लई सुधा सब छीनि विधि, तुव मुख रचिवे काज।सो अब याही सोच सखि, छीन होत दुजराज॥
बैरीसाल
सब विधि प्रबल विरोध तें
सब विधि प्रबल विरोध तें, होति निबल की हानि।युद्ध क्रुद्धजुत करि करै, दरै तरुनि की खानि॥
दीनदयाल गिरि
विधि हरिहर जाकहँ जपत
विधि हरिहर जाकहँ जपत, रहत त्यागि सब काम।सो रघुबर मन महँ सदा, सिय को सुमिरत नाम॥
हरिहर प्रसाद
कर-लाघव विधि नै लह्यो
कर-लाघव विधि नै लह्यो, रचि कै प्रथम निसेस।यातैं यह तव बिधु-बदन, बिधु तैं बन्यो बिसेस॥
मोहन
हों न उऋन पिय सों भई
हों न उऋन पिय सों भई, सैवा करि इन हाथ।अब हौं पावहूँ कौन विधि, सद्गति दीनानाथ॥
रत्नावली
लखियत कोऊ वस्तु जग
लखियत कोऊ वस्तु जग, बिना चाह मिलि जाय।अचरज गति विधि की जथा, काकतालिका न्याय॥
दीनदयाल गिरि
सुंदर गुरु सु रसाइनी
सुंदर गुरु सु रसाइनी, बहु विधि करय उपाय।सद्गुरु पारस परसतें, लोह हेम ह्वै जाय॥
सुंदरदास
पूजे नहिं बहु देवता
पूजे नहिं बहु देवता, विधि निषेध नहिं कर्म।सरन भरोसो एक दृढ़, यह सरनागति धर्म॥
रसिक अली
निरखि सहचरी युगल छबि
निरखि सहचरी युगल छबि, बार-बार बलिहार।करत निछावर विविध विधि, गज मोतिन के हार॥