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जड़ के निकट प्रवीन की
जड़ के निकट प्रवीन की, नहीं चलै कछु आह।चतुराई ढिग अंध के, करै चितेरो काह॥
दीनदयाल गिरि
सुमिरण साँचो छोड़ के
सुमिरण साँचो छोड़ के, अंतर मन ही होय।पीपा तन सुध बिसरे, प्रेम छलै न कोय॥
संत पीपा
नीच बड़न के संग तें
नीच बड़न के संग तें, पदवी लहत अतोल।परे सीप में जलद जल, मुकुता होत अमोल॥
दीनदयाल गिरि
बड़े बड़न के भार कों
बड़े बड़न के भार कों, सहैं न अधम गँवार।साल तरुन मैं गज बँधै, नहि आँकन की डार॥
दीनदयाल गिरि
बड़े बड़न के भार कों
बड़े बड़न के भार कों, सहैं न अधम गँवार।साल तरुन मैं गज बँधै, नहि आँकन की डार॥
दीनदयाल गिरि
गुरु भक्ति दृढ़ के करो
गुरु भक्ति दृढ़ के करो, पीछे और उपाय।बिन गुरु भक्ति मोह जग, कभी न काटा जाय॥
संत शिवदयाल सिंह
लोभी के चित धन बैठे
लोभी के चित धन बैठे, कामिनि के चित काम।माता के चित पूत बैठे, तुका के मन राम॥
संत तुकाराम
ये समीर तिहुँ लोक के
ये समीर तिहुँ लोक के, तुम हौ जीवन दानि।पिय के हिय में लागि के, कब लगिहौ हिय आनि॥
भूपति
पाँच तत्त्व के भीतरे
पाँच तत्त्व के भीतरे, गुप्त बस्तु अस्थान।बिरला मर्म कोई पाइ हैं, गुरु के शब्द प्रमान॥
कबीर
शुतर गिरयो भहराय के
शुतर गिरयो भहराय के, जब भा पहुँच्यो काल।अल्प मृत्यु कूँ देखि के, जोगी भयो जमाल॥
जमाल
गर्व भुलाने देह के
गर्व भुलाने देह के, रचि-रचि बाँधे पाग।सो देही नित देखि के, चोंच सँवारे काग॥