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कानन कुक्कट कोक मरालरु
गोप
मोहन गोप के गोहन में बन
मोहन गोप के गाहन में बन जायकै गाय चराय विहारै।बंसी बजाय रिझाय कै ग्वालनि साँझ परे ब्रज ओर पधारै।
हरिचरणदास
मोर चकोरन की धुनि मार
गोप बिना ललना कलना ऋतुराज दिखावत है सुख ऐसे।किंसुक फूल बिना दल कानन श्रोन भरे नख नाहर कैसे॥
गोप
चम्पक कानन मध्य हरीपट में
सो कवि गोप कहै कस जो अनिलालन होय रह्यो अनुकूल्यो।भोर समैं मृदु बल्लभ को मुख पावक पुंज सुपंकज फूल्यो॥
गोप
गोप सबै मिलि गौकुल के
गोप सबै मिलि गौकुल के करतारिन देत उड़ावत रोरी।चाले अनूप सिंगार किये गिरधारन गारी सुनावैं अथोरी।
गिरिधारन
जहाँ उजाले में
जहाँ उजाले में एक बिंदु अँधेरा हो तो वह अँधेरा उजाले के चेहरे का तिल होगा।