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लोक की अभिरुचि
वात्स्यायन
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निरखत अंक स्यामसुंदर के
निरखत अंक स्यामसुंदर के बारबार लावति छाती।लोचन-जल कागद-मसि मिलि कै ह्वै गई स्याम स्याम की पाती॥
सूरदास
नहिं मृगंक भू अंक यह
नहिं मृगंक भू अंक यह, नहिं कलंक रजनीस।तुव मुख लखि हारो कियो, घसि घसि कारो सीस॥
रसलीन
कुछ रंग अपने
कुछ रंग अपने अंक में एक दूसरे को समेट लेते हैं, वहीं कुछ सिर्फ़ एक दूसरे से हमेशा बैर-भाव रखते हैं।
चारि के अंक-सी लंक बिराजति
श्रीपति
कोमल कपोल निवि ढंकन के अंक देषो
कोमल कपोल निवि ढंकन के अंक देषो,शीश कंज बिंद को शशंक वारि दीजियै।
गिरिधर पुरोहित
देखे अनदेखे हरि तजत न अंक तेरो
देखे अनदेखे हरि तजत न अंक तेरो,विमल मयंकमुखी मोहे कटि निखलौ।